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मसूद अजहर पर सख्ती कर क्या ड्रैगन की है भारत को घेरने की तैयारी?

मसूद अजहर (फ़ाइल फोटो)
मसूद अजहर (फ़ाइल फोटो)

मोदी सरकार ने जहां इसे 'कूटनीतिक जीत' कहा है तो वहीं कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि आखिर चीन के साथ 'डील' क्या हुई है?

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(जबिन टी जैकब)

यूनाइटेड नेशंस (यूएन) के मसूद अज़हर को 'ग्लोबल टेरेरिस्ट' घोषित किए जाने को भारत की बड़ी डिप्लोमेटिक जीत के तौर पर देखा जा रहा है. मोदी सरकार ने जहां इसे 'कूटनीतिक जीत' कहा है तो वहीं कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि आखिर चीन के साथ 'डील' क्या हुई है? अब चीन से हुई कथित डील से भारत को होने जा रहे दूरगामी नुकसान की भी चर्चा होने लगी है. सवाल उठ रहे हैं कि अजहर को 'ग्लोबल टेरेरिस्ट' घोषित करने से बीजेपी को तो फायदा होता नज़र आ रहा है लेकिन क्या ये देश के आर्थिक-सामरिक हितों के लिए भी मुफ़ीद साबित होने जा रहा है?

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मसूद अजहर के ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित होने का एलान यूएन में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने ट्विटर के जरिए किया था. इसके बाद वित्त मंत्री अरूण जेटली ने प्रेस कांफ्रेंस के जरिए मसूद के ग्लोबल टेरेरिस्ट लिस्ट में शामिल होने की घोषणा की थी. हालांकि जेटली ने कांग्रेस की तरफ से 'डील' को लेकर उठाए जा रहे सवालों की आलोचना भी की. अरुण जेटली के शब्दों में ये सरकार की 'बड़ी कूटनीतिक' जीत है.
ऐसा हो सकता है कि मसूद को ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित करने पर चीन के ऐतराज के वापस लिए जाने के पीछे अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस जैसे देशों की तरफ से बढ़ता दबाव हो. इन तीनों ही देशों ने भारत की अपील के बाद मामले पर गंभीरता से विचार करने की बात कही थी. इन देशों ने वादा किया था कि यूएन सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक में इस मामले को सार्वजानिक रूप से उठाया जाएगा. इस स्थिति में चीन की ज्यादा भद्द पिटती जबकि 1267 समिति की बैठक फिर भी दीवारों के पीछे हो रही थीं.

भारत की राजनीति पर चीन रखता है नजर
ऐसा माना जा रहा है कि चीन ने भारत में चल रहे आम चुनावों को देखकर बड़े ही कूटनीतिक तरीके से अजहर को लेकर जारी अपनी मेहरबानी ख़त्म कर दी है. ये याद रखा जाना चाहिए कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना (CPC) दुनिया की सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ बातचीत करती रहती है. सीपीसी न सिर्फ सत्ता में मौजूद पार्टियों के साथ बातचीत करती है बल्कि विपक्ष से भी उनकी बातचीत जारी रहती है. सीनियर सीपीसी लीडर लगातार भारत का दौरा करते हैं और बीजेपी-कांग्रेस के नेताओं से मिलते रहते हैं.

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भारत के विरोध न करने के पीछे क्या है मंशा?
चीन में मौजूद भारतीय मामलों के जानकार भी ये मान रहे हैं कि भले ही कम सीटों के साथ लेकिन मोदी चुनकर वापस आ रहे हैं. अगर मोदी नहीं भी आए तो किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं होने जा रहा है. ऐसी चर्चाएं हैं कि चीन बीते कई सालों से सीमा पर सड़क बिछाने का काम कर रहा है जिसका भारत लगातार विरोध करता रहा है. हो सकता है अजहर के बदले अब भारत उस विरोध को छोड़कर इस प्रोजेक्ट में हिस्सेदार बन जाए.

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चाइना के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव फोरम-2017 (BRI) में भारत ने इन सड़कों के निर्माण पर कड़ा एतराज जताया था. बता दें कि अप्रैल 2019 में हुई इसकी दूसरी फोरम में भारत ने इस विरोध को दर्ज नहीं कराया था. भारत की इस चुप्पी के कई मायने निकाले जा रहे हैं और माना जा रहा है कि BRI में हिस्सा लेने के पीछे भारत के आर्थिक और सामरिक महत्त्व से जुड़ी वजह हैं. इसके अलावा ऐसी भी चर्चाएं हैं कि जॉइंट एंटी टेरेरिस्ट एक्सरसाइज़ के नाम पर भी चीन अब भारत के सहारे अपनी छवि सुधारना चाहता है. अजहर के लिए हुए मोलभाव में उसने इस संयुक्त अभ्यास का भी इस्तेमाल किया हो ऐसा हो सकता है.

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दस साल तक चीन बना रहा रोड़ा?
बता दें कि चीन बीते 10 सालों से लगातार अजहर के ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित होने की राह में रोड़ा बना हुआ था. ये विरोध भारत के न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (NSG) का मेंबर होने से भी ज्यादा मुखर था. अजहर के ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित होने के बाद अब भारत के सामने सबसे यही सबसे बड़ी चेतावनी है कि कैसे NSG और यूएन सिक्योरिटी काउंसिल की सदस्यता के लिए चीन को मनाया जाए. हालांकि इसके लिए भी ज़रूरी यही है कि भारत के पास इस डील में ऑफर करने के लिए क्या है?

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