टाउते जैसे चक्रवात आने वाले दशकों में और बढ़ेंगे– रिपोर्ट

टाउते तूफान ने मचाई तबाही (प्रतीकात्मक तस्वीर: AP)

टाउते तूफान ने मचाई तबाही (प्रतीकात्मक तस्वीर: AP)

Cyclone Tauktae: सीईईडब्ल्यू का कहना है कि बीते 50 सालों में चक्रवात की वजह से होने वाले अतिवृष्टि, बाढ़, समुद्री स्तर में इज़ाफा, और तूफान की संख्या में 12 गुना बढ़ोतरी देखने को मिली है.

  • Share this:

जिस तरह टाउते ने देश के तटीय इलाकों में तबाही मचाई है और जिस तरह से लगातार मौसम अपना भयानक रूप दिखा रहा है, वो इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि आने वाले सालों में देशभर में खास कर पश्चिमी तटीय इलाकों में तूफान की और ज्यादा घटनाएं देखने को मिल सकती हैं. पर्यावरण से जुड़े बदलावों पर पैनी नज़र रखने वाली संस्था काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 2005 से अब तक के सालों में भारत के जिले जो चक्रवात से प्रभावित हुए हैं उनकी संख्या तीन गुना हुई है. वहीं चक्रवात आने की संख्या भी दोगुनी हुई है.

सीईईडब्ल्यू का कहना है कि बीते 50 सालों में चक्रवात की वजह से होने वाले अतिवृष्टि, बाढ़, समुद्री स्तर में इज़ाफा और तूफान की संख्या में 12 गुना बढ़ोतरी देखने को मिली है और आने वाले दशकों में इसमें और इज़ाफा देखने को मिलेगा. मसलन गुजरात में करीब 29 जिले मौसम में आए भयानक बदलावों से प्रभावित हुए हैं, इनमें सौराष्ट्र क्षेत्र के अमरेली, गिर, सोमनाथ, जूनागढ़, और पोरबंदर खासतौर पर तीव्र चक्रवात और तूफान की चपेट में आने वाले जिले रहे हैं.

Cyclone Tauktae: बॉम्बे हाई के पास समुद्र में मिले 14 शव, गुजरात में 33 लोगों की मौत

2018 से भारत के पश्चिमी तट पर अरब सागर से उठने वाले चक्रवात की दर औसतन एक प्रति वर्ष रही है, बीते पांच दशकों में चक्रवात को इतना लगातार आते नहीं देखा गया है. मौसम वैज्ञानियों का मानना है कि इन चक्रवातों के विकसित होने के पीछे कहीं ना कहीं, संबंधित क्षेत्र की भूमि में होने वाले माइक्रो-क्लाइमेट वार्मिंग यानि छोटे इलाकों में बढ़ रही गर्मी हो सकती है. जो इलाके बीते सालों में चक्रवात की चपेट मे आते रहे हैं उनका आकलन करने पर पाया गया है कि इन जिलों में मौसम अक्सर गर्म रहता है, ज्यादा गर्मी पड़ती है और सूखा भी लगातार देखने को मिलता है, आमतौर पर तटीय इलाकों में जब ज़मीन गर्म होती है तो वहां का समुद्र उस गर्मी को खींच लेता है. अब अगर ज़मीन की गर्मी लगातार बढ़ती रहती है तो इसकी वजह से वहां मौजूद समुद्र जो गर्मी को खींच रहा है उसके तापमान में इज़ाफा होने लगता है. वैसे ही ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र का तापमान बीते सालों में बढ़ रहा है ऐसे में माइक्रो-क्लाइमेट यानी सूक्ष्म-जलवायु में हो रही बढ़ोतरी समुद्र के तापमान को बढ़ाने में मदद करती है. और ये चक्रवात या तूफान को मजबूती प्रदान करने में मददगार होता है, ये कहना है सीईईडब्ल्यू के प्रोग्राम लीड, अबिनाश मोहंती का.
क्या होती है सूक्ष्म-जलवायु या माइक्रो-क्लाइमेट ?

‘सूक्ष्म जलवायु’ यानी सामान्य जलवायु वाले इलाके में मौजूद छोटा इलाका , जिसकी अपनी विशिष्ट जलवायु होती है, मसलन किसी बाग‌, पार्क, घाटी या पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु. इसी तरह किसी जगह के जल निकाय (Water Body) की जलवायु आसपास के क्षेत्र से अलग होती है, वहीं दलदली इलाकों के आसपास की जलवायु भी उस पूरे क्षेत्र की जलवायु से भिन्न होती है. क्षेत्र विशेष की जलवायु के पीछे कई कारण होते हैं जिसमें क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, जगह की बनावट, वहां पर मौजूद पानी और जंगलों की उपस्थिति, तापमान, वर्षा, हवा या नमी ये सब मिल कर किसी क्षेत्र में ‘सूक्ष्म जलवायु’ का निर्माण करते हैं. इसलिए हम कह सकते हैं कि विस्तृत सामान्य जलवायु क्षेत्रों के तहत छोटे क्षेत्र विशेष की विशिष्ट जलवायु को सूक्ष्म जलवायु कहते हैं. यह जलवायु अपने आस-पास की सामान्य जलवायु से भिन्न होती है.

Cyclone Tauktae की वजह से वेस्ट यूपी में बदला मौसम; मेरठ, मुज़फ्फरनगर और बागपत में शुरू हुई बारिश



सीईईडब्ल्यू के आकलन के अनुसार गुजरात के जिलों में एक बात आमतौर पर देखी गई है, जहां कुछ इलाके भयंकर बाढ़ का सामना कर रहे हैं. वहीं कई इलाकों मे उसी दौरान सूखा देखा गया. ऐसे इलाके जो हमेशा सूखा पीड़ित रहे जैसे जामनगर, राजकोट, सूरत और वलसाड में बीते एक दशक में तूफान और बाढ़ में इज़ाफा देखने को मिला है. ये बदलाव स्थानीय स्तर पर हो रहे सूक्ष्म जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रहे हैं. इनके पीछे की वजह ज़मीन के इस्तेमाल मे हुआ बदलाव, जंगलों की कटाई और दलदली व जलीय ज़मीन पर अतिक्रमण है.

रिपोर्ट बताती है कि महाराष्ट्र सूखे के मामले में बीते 50 सालों में सबसे संवेदनशील राज्य बनकर उभरा है और यहां पड़ने वाले सूखे में सात गुना बढ़ोतरी देखने को मिली है. जिससे यहां के करीब 80 फीसद जिले प्रभावित हुए हैं. बीते एक दशक में औरंगाबाद, मुंबई, नाशिक, पुणे, थाणे जैसे कई जिलों में सूक्ष्म जलवायु की वजह से गर्मी में इज़ाफा हुआ है और जिसकी वजह से यहां पर चक्रवात का असर देखने को मिला है. यही नहीं जहां सूखा पड़ रहा है वहीं साथ ही तूफान की वजह से लगातार होने वाली बारिश में भी इज़ाफा हुआ है जिसकी वजह से महाराष्ट्र में बीते 50 सालों में बाढ़ के आने में भी 6 गुना बढ़ोतरी देखी गई है. बाढ़ आने के मामले में मुंबई, थाणे, रत्नागिरी अव्वल पर रहे हैं, इनमें भी मुंबई में बाढ़ आने के क्रम में तीन गुना इज़ाफा हुआ है.

Cyclone Tauktae: तूफान ‘टाउते’ पड़ा कमजोर, दिल्ली-राजस्थान-उत्तराखंड सहित कई राज्यों में भारी बारिश की आशंका

वहीं अगर गोवा की बात की जाए बीते 50 सालों में यहां आने वाले चक्रवातों और तूफानों में चार गुनी बढ़ोतरी हुई है, वहीं 2005 के बाद से चक्रवातों से जुड़ी घटनाओं में छह गुना इज़ाफा हुआ है. मौसम को लेकर संवेदनशील राज्य जैसे गुजरात को अपनी पर्यावरण संबंधी नीति में लचीलापन लाना होगा, खासतौर पर क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर संरचनात्मक बदलाव लाने की ज़रूरत है.


घोष कहते हैं कि ‘राष्ट्रीय चक्रवात जोखिम शमन परियोजना’ के दूसरे चरण को 2015 में अनुमति मिल गई थी, लेकिन पश्चिमी तटीय क्षेत्र इसके क्रियान्वयन में पिछड़ा रहा. वहीं पूर्वी तटीय क्षेत्र खास तौर पर ओडिशा जैसे राज्यों ने चक्रवात से जुड़े अपने कार्यक्रम को बेहतर अमलीजामा पहनाया जिसमें चक्रवात के दौरान खाली कराए जाने वाले गांव के लिए आश्रय स्थल तैयार करना भी शामिल है. वहीं पश्चिम तटीय इलाका जहां 2019 तक परियोजना पूरी हो जानी चाहिए थी, लेकिन यहां के राज्य समय रहते अपने काम को पूरा नहीं करवा सके और अब परियोजना के पूरा होने की तारीख बढ़ कर 2022 पहुंच गई है.’

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज