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दास्तान-गो: वो ‘बड़ा दिन’ जब कपिल देव ने एक को छोड़ पूरी वेस्टइंडीज़ टीम पवेलियन भेज दी थी

कपिल देव ने अहमदाबाद में नौ विकेट लेने का यह कारनामा किया था.

कपिल देव ने अहमदाबाद में नौ विकेट लेने का यह कारनामा किया था.

Daastaan-Go ; A day of Captain Kapil Dev With Nine Wicket Haul : इसके अलावा एक और चीज़ जो मैंने क्रिकेट के अपने सफ़र के द ...अधिक पढ़ें

दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़… 

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जनाब, पहले तो उस शख़्सियत से ही कुछ बातें सुन लेते हैं, जिनकी ज़िंदगी के महज़ ‘एक बड़े दिन’ के बारे में यह दास्तान लिखी जा रही है. जी जनाब, हिन्दुस्तान को पहली मर्तबा क्रिकेट का विश्व चैंपियन बनाने वाले कप्तान कपिल देव साहब के जैसी शख़्सियतें होती ही ऐसी हैं कि उनके हर दिन, हर कारनामे पर दास्तानें लिखी जा सकती हैं. तो ये दास्तान भी बस वैसी ही एक है. लेकिन पहले कपिल देव साहब को सुन लेते हैं थोड़ा…, ‘मैं स्कूल में था तो पढ़ाई में मन नहीं लगता था. खेलने में ज़्यादा मज़ा आता था. तो फुटबॉल खेला करता था. लेकिन फुटबॉल का खेल ज़्यादा से ज़्यादा से दो घंटे में ख़त्म हो जाता. उसके बाद फिर स्कूल जाना पड़ता. लिहाज़ा मैंने क्रिकेट का खेल चुना. क्योंकि इसमें दिन-दिन भर स्कूल से बाहर रहने का मौका मिलता था. कई बार चार-पांच दिनों तक या उससे ज़्यादा भी. तो इस तरह मैं फुटबॉलर से क्रिकेटर बन गया’.

‘बाद में मुझे याद है, क्रिकेट के एक टूर्नामेंट के दौरान किसी अख़बार ने मेरी गेंदबाज़ी की वज़ह से मुझे ‘हरियाणा हरिकेन’ का तमगा दे दिया. यानी ‘हरियाणा का तूफ़ान’ इससे मुझे जितनी ख़ुशी हुई, उससे भी कहीं ज़्यादा ये एहसास आया कि मुझे इस आदमी (जिसने ख़िताब दिया) को सही साबित करना है. तो मैंने और ज़्यादा मेहनत की फिर… खेल आगे बढ़ता रहा और फिर एक दिन मुझे कप्तान बना दिया गया. उस वक़्त टीम में करीब सात खिलाड़ी मुझसे सीनियर थे. मैं उनमें से किसी को यह नहीं सिखा सकता था कि खेल के दौरान क्या करना, क्या नहीं. कैसे करना है, कैसे नहीं. और मैंने ऐसा कुछ किया भी नहीं. मैं टीम के सभी खिलाड़ियों से सिर्फ़ एक ही चीज़ मांगता था. वह है कमिटमेंट. यानी प्रतिबद्धता. क्योंकि मैं हमेशा से मानता रहा हूं कि जो टेलेंटेड यानी प्रतिभाशाली है, वह एक बार ग़लत कर सकता है. लेकिन कमिटेड नहीं’.

‘अगर आप अपने खेल या जिस क्षेत्र में भी आप हैं, उसके प्रति कमिटेड हैं तो आप कभी ख़ुद को ग़लती करने की इजाज़त नहीं देंगे. वे लोग, जिन्होंने आप पर भरोसा किया है, उन्हें कभी ग़लत साबित नहीं करेंगे. अपने काम के लिए जो कमिटेड होगा, वह नींद में भी जागता रहेगा. हमेशा अपने काम, अपनी ज़िम्मेदारी की तरफ़ चौकन्ना रहेगा. इसीलिए मैंने टीम में आगे भी उन्हीं लोगों को तरज़ीह दी जो टेलेंटेड भले थोड़े कम हों, पर उनके कमिटमेंट पर कोई सवालिया निशान न हो… इसी तरह, वर्ल्ड कप के लिए भी जब टीम चुनी गई तो उसके सामने भी मैंने बस यही बात दोहराई. यही कमिटमेंट याद दिलाया. साथी खिलाड़ियों से यह भी कहा कि आप प्रतिद्वंद्वी टीम की इज़्ज़त कीजिए, लेकिन मैच से पहले और बाद में. मैच के दौरान नहीं. मैच के वक़्त तो आप बस एक चीज़ सोचिए कि आप से बेहतर कोई नहीं. और आप किसी को भी हरा सकते हैं’.

‘मुझे याद है, जब विश्व कप (1983) के लिए टीम गई तो हमारी टीम के साथियों को भी भरोसा नहीं था कि हम चैंपियन बन सकते हैं. किसी को नहीं था. लेकिन मुझे था. ख़ुद पर और टीम पर भी. और फिर धीरे-धीरे जब विश्व कप टूर्नामेंट लगभग आधा बीत गया, तब कहीं टीम के खिलाड़ियों को यह एहसास हुआ कि वे ख़िताब जीत सकते हैं. इसके बाद जो हुआ वह तो सब को पता है… मैं हमेशा मानता रहा हूं कि ख़ुद पर भरोसा बहुत बड़ी चीज़ है. वही आपको ज़िंदगी में आगे ले जाती है. मुझे ध्यान है, जब मैं कप्तान बना तो मुझे अंग्रेजी नहीं आती थी. जबकि तब क्रिकेट तो मानो अंग्रेज़ी में ही खेली जाती थी. जैसे-तैसे मैं टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोलता तो, टीम के खिलाड़ी मेरा मज़ाक बनाते थे. वे कल्चर्ड बैकग्राउंड से थे और मैं एग्रीकल्चर बैकग्राउंड से. मेरा बैकग्राउंड मेरे बात-व्यवहार में भी झलकता था. लेकिन मुझे इस सब से कभी परेशानी नहीं हुई’.

Kapil Dev

‘मैं हमेशा से जानता और मानता भी था कि अंग्रेज़ी में बात-व्यवहार एक बात है, क्रिकेट खेलना दूसरी. और क्रिकेट मैं बेहतर खेल सकता हूं. तो, मैं साथी खिलाड़ियों से अक्सर कहता भी था- तुम लोग अंग्रेज़ी बोलने के लिए किसी को ऑक्सफोर्ड (लंदन की यूनिवर्सिटी) से बुला लो, मैं क्रिकेट खेल लेता हूं. इस तरह ख़ुद पर भरोसा और क्रिकेट के प्रति मेरा कमिटमेंट ही मुझे आगे लेकर गया… इसके अलावा एक चीज़ और जो मैंने क्रिकेट के अपने सफ़र के दौरान सीखी, ख़ुद पर एप्लाई की वह ये कि ज़िंदगी में आपके सामने ‘प्लान-बी’ नहीं होना चाहिए. ये ‘प्लान-बी’ हमेशा आपको कमज़ोर ही बनाता है. ‘प्लान-ए’ की तरफ़ से आपका ध्यान हटाता है. कभी-कभी तो उसकी तरफ़ बे-परवाह भी करता है. और बे-परवाही आपको आपके ‘प्लान-ए’ से दूर ले जाती है. इसीलिए ‘प्लान-बी’ जैसा कुछ नहीं होना चाहिए. सिर्फ़ ‘प्लान-ए’ हो, कि जो करना है, बस वही करना है.’

कपिल देव साहब की ज़ुबानी इन ‘बड़ी बातों’ के बाद जनाब, अब क़िस्सा उस ‘बड़े दिन’ का, जिसकी तारीख़ यही होती है, 16 नवंबर की. साल वह 1983 का ही था, जब हिन्दुस्तान ने एकदिवसीय क्रिकेट का विश्व कप जीतकर इतिहास रच दिया था. सब को याद होगा कि किस तरह उस टूर्नामेंट के फाइनल में कपिल देव साहब की टीम ने बड़े-बड़े नामी दिग्गजों से सजी दो बार की विश्व चैंपियन वेस्टइंडीज़ को धूल चटाई थी. उस हार से बौखलाई वेस्टइंडीज़ टीम विश्व कप टूर्नामेंट गुज़र जाने के बाद हिन्दुस्तान के दौरे पर आई थी. अक्टूबर-नवंबर के महीनों में. वेस्टइंडीज दौरे की शुरुआत धमाकेदार तरीके से हुई. पहले टेस्ट मैच में उसने एक पारी और 83 रनों के अंतर से कपिल देव साहब की टीम को धूल चटाई. गोया कि विश्व कप में मिली करारी हार का बदला लिया हो. पर ‘विश्व चैंपियन भारत’ ने भी वापसी की और दूसरा टेस्ट ड्रॉ करा लिया.

इसके बाद बारी तीसरे टेस्ट मैच की आई. अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में वह मैच खेला गया. भारतीय कप्तान कपिल देव ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी करने का फैसला किया. खेल की शुरुआत में उनका फैसला सही साबित होता दिखा. वेस्टइंडीज़ ने सिर्फ 27 रन पर तीन प्रमुख विकेट गंवा दिए. जबकि 124 पर चौथा और 134 पर पांचवां विकेट भी गिर गया. लेकिन क्लाइव लॉयड (68) और जेफ डुजों ने 98 रन बनाकर अपनी टीम को 281 तक पहुंचा दिया. ज़वाब में भारत की ओर से सुनील गावस्कर साहब ने 90 रनों की पारी खेली. लेकिन बाकी खिलाड़ी उनका साथ न दे सके और पूरी टीम 241 ही बना पाई. इस तरह पहली पारी के आधार पर वेस्टइंडीज़ को 40 रनों की बढ़त मिल गई. दूसरी पारी में वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ियों का इरादा यक़ीनन इस बढ़त को और बड़ा करने का रहा होगा. मगर उनके मंसूबों पर पतझड़ फिर गया.

Kapil Dev

और वेस्टइंडीज़ के मंसूबों पर पतझड़ फेरने का काम उस रोज़ किया, कपिल देव साहब ने. वह भी अकेले. हालांकि शुरुआत इसकी बलविंदर सिंह संधू साहब ने की थी. दूसरी पारी में वेस्टइंडीज़ के जब चार ही रन बने थे कि उन्होंने डेसमंड हेंस को संदीप पाटिल के हाथों कैच करा दिया. लेकिन इसके बाद फिर कपिल देव साहब ने एक के बाद बाकी पूरी वेस्टइंडीज़ टीम को पैवेलियन भेज दिया. उस पारी में पूरे नौ विकेट लिए थे कपिल देव साहब ने. यह कारनामा करने वाले वे दुनिया के पहले कप्तान हुए तब. और आज भी उनका ये रिकॉर्ड कोई तोड़ नहीं पाया है. वे बतौर कप्तान, पारी में नौ विकेट लेने वाले इक़लौते खिलाड़ी के तौर पर क्रिकेट की तारीख़ी किताबों में दर्ज़ हैं. अब भी. आने वाले वक़्त में उनका यह रिकॉर्ड कभी टूटेगा ऐसा लगता नहीं है. क्योंकि अब तो क्रिकेट की शक़्ल-ओ-सूरत ही बदलती जा रही है काफ़ी कुछ.

वैसे, जानने वालों की दिलचस्पी यहां इसमें भी हो सकती है कि उस मैच का नतीज़ा आख़िर क्या रहा. तो जनाब, बता दें कि कपिल देव साहब के इस कमाल-कारनामे के बावज़ूद हिन्दुस्तान की टीम वह मैच हार गई. क्योंकि उसके सभी बल्लेबाज़ मिलकर भी दूसरी पारी में जीत के लिए ज़रूरी 242 रन नहीं बना सके. सिर्फ़ मैच ही नहीं, छह मैचों की वह टेस्ट-सीरीज़ भी वेस्टइंडीज़ ने 3-0 से अपने नाम की. इस दौरान पांच एक-दिवसीय मैच भी हुए. वे भी सब वेस्टइंडीज़ ने जीते. आख़िर उस दौर के क्रिकेट की ‘बेताज़-बादशाह’ थी वह. और उसने ‘विश्व-चैंपियन का ताज़ उसके सिर से उतार लेने वाली भारतीय टीम’ को इस बुरी तरह हराकर फिर अपनी बादशाहत साबित कर दी थी. इधर, इस सबके बीच एक बात और. बस याद रखने के लिए. एक पारी में विरोधी टीम के सभी 10 विकेट चटकाने का रिकॉर्ड भी हिन्दुस्तान के ही नाम है. फिरकी गेंदबाज़ अनिल कुंबले ने सात फरवरी 1999 को ये कारनामा दिल्ली में किया था. पाकिस्तान के ख़िलाफ़. याद आया न?

आज के लिए बस इतना ही. ख़ुदा हाफ़िज़.

Tags: Hindi news, Kapil dev, News18 Hindi Originals

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