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दास्तान-गो : मध्य प्रदेश का बाघ जब गुजरात तक गया और वहां मरकर भी अपने पुरखों के क़िस्से ज़िंदा कर गया!

भारत सरकार ने बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के बाद बाघों के संरक्षण के लिए एक अप्रैल-1973 से ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ भी चलाया हुआ है.

भारत सरकार ने बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के बाद बाघों के संरक्षण के लिए एक अप्रैल-1973 से ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ भी चलाया हुआ है.

Daastaan-Go ; A Tiger's Tale On The Day When Tiger Declared National Animal Of India : यहां ये भी बताना दिलचस्प होगा कि ...अधिक पढ़ें

दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…

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जनाब, यह कहानी साल 2019 की है, गुजरात की. लेकिन ये शुरू होती है, क़रीब दो-ढाई साल पहले मध्य प्रदेश से. साल 2016 के आख़िरी महीनों का वक़्त रहा होगा. उस वक़्त मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के नज़दीकी रातापानी वन्यजीव अभ्यारण्य (अब टाइगर-रिज़र्व) से एक जवान बाघ लापता हो गया था. काफ़ी ढूंढा गया उसे, लेकिन मिला नहीं. थक-हारकर उसकी तलाश बंद कर दी गई. यह सोच लिया गया कि वह या तो शिकारियों के हत्थे चढ़ गया, या फिर किसी दूसरे इलाके में चला गया. यहां बात आई-गई हो गई. पर वह बाघ जनाब, यक़ीनन आने-जाने वाला नहीं था. वह जंगलों, पहाड़ाें को पार करता हुआ लगातार चला जा रहा था. दिशा उसकी गुजरात की तरफ़ थी और दशा ठीक वैसी, जैसे मध्य प्रदेश से गुजरात की तरफ़ जाते नर्मदा-परिक्रमा के यात्रियों की हुआ करती है. कौन जाने, वह बाघ भी नर्मदा-परिक्रमा करने ही चला हो, उनके संग!

या फिर जनाब, ये भी मुमकिन है कि उस बाघ को अपने उन पुरखों की याद हो आई हो, जो किसी ज़माने में गुजरात में ख़ूब रहा करते थे. ख़ैर. तो जनाब, वह बाघ चलता रहा, चलता रहा, चलता रहा. गांवों, क़स्बों के नज़दीक से गुज़रा. नर्मदा की घाटियों से निकला. सड़कें, रेल-लाइनें, नदियां, पहाड़, झरने, क्या-कुछ नहीं पड़ा उसके रास्ते में. लेकिन उसका सफ़र कहीं थमा नहीं ज़्यादा देर तक. अलबत्ता, छोटे-मोटे ठहराव यक़ीनी तौर पर उसने लिए ही होंगे इस दौरान. मगर इस सब से इतर उसके सफ़र की ख़ास बात ये रही कि कहीं भी इंसानों के साथ उसके टकराव की कोई ख़बर सुर्ख़ी बनकर सामने नहीं आई. और फिर एक रोज़, दो-सवा दो साल बाद वह अपनी मंज़िल तक पहुंच ही गया. पूरब की तरफ़ से वह गुजरात में दाख़िल हुआ और वहां के महिसागर जिले के बाेरिया गांव के आस-पास अपना डेरा जमा लिया. ये बात है फरवरी 2019 की.

उस वक़्त गुजरात में जंगल महकमे वज़ीर थे गनपत सिंह वसावा. उन्हें जैसे ही ख़बर मिली कि कोई बाघ गुजरात में देखा गया है, तो उन्होंने मैदानी अमले को दौड़ाया. चौतरफ़ा कैमरे वग़ैरा लगवाए. पहले तो ये पुख़्तगी कराई कि ख़बर सच्ची है या नहीं. फिर जब बात पुख़्ता हो गई कि हां सच में, गुजरात में बाघ इन दिनों चहल-क़दमी कर रहा है, तो फिर पड़ोसी सूबों के जंगल महकमों के वज़ीरों को टटोला. मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र वग़ैरा के. ये जानने की कोशिश की कि यह बाघ आख़िर आया कहां से है. वैसे तो मध्य प्रदेश से ही उसकी आमद लग रही थी. क्योंकि वह बाघ गुजरात की पूरबी सरहद पर, मध्य प्रदेश से लगने वाले इलाक़ों में ही दिखा था. पर फिर भी, सरकारों के अपने तौर-तरीके हुआ करते हैं, जिनके मुताबिक वे चले और अंत में ये भी पुख़्ता हुआ कि गुजरात में चहल-क़दमी कर रहा बाघ, दरअस्ल मध्य प्रदेश से ही आया है.

Tiger-Lion

इसके बाद जनाब, वसावा-साहब ने बाक़ायदा ख़बर-नवीसों को बुलाया. उन्हें बताया कि सात-आठ बरस की उम्र का एक बाघ इन दिनों महिसागर के जंगलों, ग्रामीण इलाक़ों में दिख रहा है. फिर फ़ख़्र के साथ ए’लान किया कि गुजरात दुनिया का इक़लौता इलाक़ा है, जहां शेरों के ख़ानदान की तीन क़िस्में एक साथ रह रही हैं. एशियाई शेर, बाघ और तेंदुआ. हालांकि वसावा-साहब का ये फ़ख़्र ज़्यादा दिन टिक न सका क्योंकि गुजरात में दाख़िल होने के महज़ दो हफ़्ते के भीतर ही एक रोज़ पता चला कि मध्य प्रदेश से आए उस मेहमान-बाघ ने दम तोड़ दिया. महिसागर जिले के एक गांव की कंटीली झाड़ियों में उसका बे-जान ज़िस्म मिला था. तब बताया गया कि उस बाघ ने भूख से दम तोड़ दिया. कोई और पुख़्ता सबूत था नहीं, तो वही मानना पड़ा जो कहा गया. हालांकि ये बाघ मरकर भी गुजरात में अपने पुरखों के तमाम क़िस्से ज़िंदा कर गया था.

इनमें एक क़िस्सा तो उसी इलाके का है, जहां उसकी मौत हुई थी. महिसागर जिले का. पर जिन्हें याद न हो उन्हें पहले ये बता देना लाज़िम है कि ये महिसागर जिला जनवरी 2013 में गुजरात के नक़्शे पर आया. इसे पंचमहल और खेड़ा जिलों के कुछ हिस्सों को उनसे काटकर सूरत दी गई. लिहाज़ा, जिस इलाके में मध्य प्रदेश के इस ‘मेहमान-बाघ’ ने पांव धरे, दम तोड़ा, उसे पंचमहल और खेड़ा का हिस्सा कहिए, तो ग़लत न होगा. और इन पंचमहल व खेड़ा इलाक़ों में 19वीं सदी के अंत तक बाघों का अच्छा-ख़ासा बसेरा होता था. यहां ये भी बताना दिलचस्प होगा कि गुजरात में बाघ को ‘वाघ’ कहा जाता है और वहां की रियासतों के राजाओं को ‘वाघों’ के शिकार बड़ा ज़ुनून रहा है. इसकी दो वज़हें थीं. पहली- शेरों के कुनबे में बाघ सबसे लंबा और वज़नी होता है. दूसरी बात- ये ख़ूंख़्वार शिकारी समझा जाता है. इसके बारे में ऐसा कहते हैं कि ये अपनी पर आ जाए तो बब्बर शेर को भी मात दे देता है. इसीलिए इसका शिकार करने में राजाओं की शान बढ़ती थी.

तो जनाब, इसी शान के चक्कर में पंचमहल और खेड़ा जिलों से तो क्या पूरे गुजरात से ‘वाघों’ का सफ़ाया होता रहा. सबूत के तौर पर पंचमहल जिले की ही एक मिसाल दी जा सकती है कि जहां साल 1865 में एक साल के भीतर ही 22 ‘वाघों’ को मार गिराया गया था. ऐसे और भी तमाम वाक़ि’अे किताबों में दर्ज़ हैं. इस बाबत जिन्हें दिलचस्पी हो, वे जंगल से जुड़े मसलों की एक किताब पर ग़ौर फ़रमा सकते हैं. ‘चीतल’ नाम है इस किताब (जर्नल) का. ‘द वाइल्ड लाइफ़ प्रिज़र्वेशन सोसायटी ऑफ़ इंडिया’, यह किताब छापा करती थी. इसमें जून-1979 में गुजरात के जंगल महकमे के बड़े नामी अफ़सर एमए राशिद का एक बड़ा-सा लेख छपा था. उसमें वे बताते हैं कि गुजरात में 1960 की दहाई तक क़रीब 50 बाघ हुआ करते थे. मगर 1972 में जब पहली बार गुजरात में बाघों की गिनती हुई तो वहां महज़ आठ बचे थे. ये सब डांग के जंगलों में पाए गए थे.

Tiger

फिर इसके बाद 1979 में जब फिर बाघों की गिनती हुई, तो गुजरात में उनकी तादाद एक और कम, यानी सात बची. और अगले चार साल के भीतर ही यानी 1983 में तो, ‘वाघ’ को गुजरात से ग़ायब ही घोषित कर दिया गया. बताते हैं, उस साल जब गुजरात से बाघों को ग़ायब घोषित किया गया तो वहां डांग के जंगलों में ही एक आख़िरी ‘वाघ’ नज़र आया करता था. लेकिन उसे शिकारियों की नज़र लग गई और ‘वाघई’ नाम के इलाक़े में उसे मार दिया गया. इसके बाद से 2019 तक तो ‘आलम यूं रहा कि गुजरात के लोग ‘वाघों’ को देखने के लिए तरस गए. और अफ़सोस, कि जब मध्य प्रदेश से आए मेहमान-बाघ की सूरत में वह उन्हें दिखा भी तो ज़्यादा दिनों तक दिखता नहीं रह सका. मर गया या मार दिया गया, ऊपर वाला जाने. पर उस वाक़ि’अे के बाद गुजरात एक बार फिर हिन्दुस्तान के उन क़रीब 10 सूबों में शुमार हुआ है, जहां कोई बाघ नहीं है.

बाघों की तादाद के लिहाज़ से हिन्दुस्तान में क़रीब 10 ही सूबे ऐसे भी हैं, जहां दहाई या सैकड़ा के आंकड़ों में बाघ पाए जाते हैं. इनमें मध्य प्रदेश- 526, कर्नाटक- 524, उत्तराखंड- 442, महाराष्ट्र- 312, तमिलनाडु- 264, असम- 190, केरल- 190, उत्तर प्रदेश- 173, पश्चिम बंगाल- 88 और राजस्थान- 69 शुमार होते हैं. वैसे, हिन्दुस्तान के कुल 17 सूबों में सब मिलाकर 2,967 के क़रीब बाघ गिने जाते है. हालांकि ये गिनती भी आज यूं न होती, अगर हिन्दुस्तान की सरकार वक़्त रहते बाघों को बचाने के लिए ज़रूरी क़दम न उठाती. ये सितंबर-अक्टूबर 1972 के आस-पास की बात है, जब हिन्दुस्तान की सरकार को संजीदगी से महसूस हुआ कि अगर मुल्क में बाघों को बचाना है तो बड़े क़दम उठाने होंगे. इसके बाद उसी साल 18 नवंबर को, यानी आज की तारीख़ में, पहले तो बाघ को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित किया गया. इसके बाद एक अप्रैल 1973 से बाघों के बचाने के लिए ख़ास ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ शुरू किया गया. इसके तहत पूरे मुल्क में जहां भी बाघों की ठीक-ठाक आबादी होने लगती है, उन्हें ‘बाघ संरक्षित क्षेत्र’ (टाइगर रिज़र्व) घोषित किया जाता है. और इस सिलसिले में मध्य प्रदेश के उस रातापानी अभ्यारण्य का नाम, इसी साल ‘टाइगर रिज़र्व’ की तरह जुड़ा है, जहां का बाघ गुजरात तक पहुंचा था. अपने पुरखों को याद करने. या शायद हमें बाघों की अहमियत की याद दिलाने.

आज के लिए बस इतना ही. ख़ुदा हाफ़िज़.

Tags: Gujarat, Hindi news, Madhya Praesh, News18 Hindi Originals, Tiger

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