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दास्तान-गो : वह बेगम अख़्तर हैं, जिनकी कर्ज़दार उर्दू ग़ज़ल भी हुआ करती है

मशहूर ग़ज़ल गायिका बेगम अख़्तर की आज जयंती है.

मशहूर ग़ज़ल गायिका बेगम अख़्तर की आज जयंती है.

Daastaan-Go ; Begum Akhtar Birth Anniversary : एक रोज एंजेलिना योवर्ड (यही गौहर जान के नाम से मशहूर हुईं), फ़ैज़ाबाद आईं. ...अधिक पढ़ें

दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़… 

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जनाब, मशहूरियत, मक़बूलियत के अपने मायने हुआ करते हैं. अपनी अहमियत होती है. भले कोई माने, न माने. लेकिन तारीख़ ग़वाह है कि तयशुदा दायरे तोड़कर हर ख़ास-ओ-आम के बीच जो चीज़ या शख़्सियत पहुंची, वही बरसों-बरस, पीढ़ियां गुज़र जाने के बावजूद लोगों के ज़ेहन में ठहरी रही. उनकी रूह पर असर डालती रही. सच्चाई यही है. और इसकी बड़ी मिसाल हैं बेगम अख़्तर, जिनका नाम लीजिए आज भी, तो उनकी गाई हुई कोई न कोई ग़ज़ल ज़बान पर आ ठहरती है. कानों में कोई ठुमरी ठुमकती जान पड़ती है. क्योंकि वह हिन्दुस्तान हो पाकिस्तान या कोई दीगर मुल्क. ग़ज़ल को सुनने-समझने और उसके बारे में जानने वाला शायद ही कोई निकले, जिसने बेगम अख़्तर को सुना न हो. क्योंकि वही तो हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को उसके महदूद (सीमित) दायरे से निकालकर दुनिया के सामने लाया. उसे मक़बूल-ए-आम किया. इसीलिए उर्दू ग़ज़ल आज तक, उनकी कर्ज़दार कही जाती है. और जिसके लिए वह ख़ुद ‘मल्लिका-ए-ग़ज़ल’ के ख़िताब से नवाज़ी जाती हैं.

अलबत्ता जनाब, सिर्फ़ उर्दू ग़ज़ल ही नहीं. हिन्दुस्तान के उप-शास्त्रीय संगीत की ठुमरी, दादरा, ख़्याल जैसी क़िस्में भी बेगम अख़्तर की आवाज़ से नई पहचान पाती हैं. सो, बेगम का कुछ कर्ज़ तो इन पर भी बनता ही है. यही वज़ह है कि ग़ज़ल हो या ठुमरी, दादरा. इनके चाहने वाले आज भी लखनऊ में ठाकुरगंज के पसंदबाग़ (इंतिक़ाल के बाद 30 अक्टूबर 1974 से बेगम यहीं आराम फ़रमा रही हैं) से गुज़रते वक़्त, चलते-चलते ठिठक जाया करते हैं. आंख बंद कर वहां की आब-ओ-हवा को महसूसने की कोशिश किया करते हैं. कभी वहां के पत्थरों पर भी कान धर दिया करते हैं. इस उम्मीद में कि क्या पता कहीं से वह आवाज़ फिर सुनाई दे जाए, जो कहा करती थी, ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंज़ाम पे रोना आया’. या ‘हमरी अटरिया पे आ जा रे सांवरिया’. या फिर ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे’. और ऐसे कई मशहूर कलाम, जिन्हें सुनकर लोग जहां के तहां ठहर जाते थे.

इसकी मिसाल के तौर पर एक बड़ा मशहूर वाक़ि’आ है, साल 1936-37 के आस-पास का. आजकल जो तेलंगाना की राजधानी है न हैदराबाद, वहां एक स्कूल होता है ‘विवेक वर्धिनी’. वहां पढ़ने के लिए जाने को एक बच्चा नज़दीक की ही रिहाइश से पैदल-पैदल घर से निकलता. लेकिन रास्ते में रोज ही अटक जाया करता. क्योंकि स्कूल की राह में एक रेस्टोरेंट पड़ता था. नाम था उसका ‘याक़ूबिया’. वहां उस रेस्टोरेंट में इस बच्चे को सुर-संगीत की ख़ुराक़ मिलती थी. और इस ख़ुराक़ में जो पकवान उसे वहां परोसा हुआ मिलता, वह जानते हैं क्या था? बेगम अख़्तर की आवाज़ और उनकी गाई हुई ग़ज़ल ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे, वरना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे’. उस रेस्टोरेंट के मालिक के पास यही इक़लौता रिकॉर्ड होता था तब. और इस बच्चे के पास यही एक काम- रेस्टोरेंट के पास खड़े होकर उसे सुनते रहना. इस चक्कर में वह स्कूल पहुंच ही न पाता था.

Begum Akhtar

ज़ाहिर है, जल्द ही पोल खुल गई. स्कूलवालों ने घरवालों को बताया, तो घर में हंगामा मचा. सवाल उठे कि लड़का आख़िर जाता तो जाता कहां है? घर से तो स्कूल जाने का कहकर निकलता है? पता लगवाया तो मालूम हुआ कि ये साहब तो ‘याक़ूबिया’ में अटके हुए हैं. बेगम अख़्तर को सुन रहे हैं. रेस्टोरेंट वालों को भी इससे दिक़्क़त नहीं लग रही है. बल्कि उन्होंने तो इसके लिए आराम से बैठकर सुनने का बंदोबस्त ही कर दिया है. पता यह भी चला कि कभी तो इस बच्चे को नाश्ता-पानी भी दे दिया जाता है वहां. यानी सिलसिला पुराना है. लिहाज़ा, घरवालों ने तय किया कि अब इस बच्चे को संगीत ही सिखाया जाएगा. ख़ानदानी संगीतकार हुए वे लोग. तो यह कोई बड़ी बात भी न थी उनके लिए. सो, बच्चे के बड़े भाई ने ही उसे अपना शागिर्द बना लिया. शुरू में तबला सिखाया. फिर गायकी, जिसके बलबूते वह बच्चा ‘संगीत मार्तंड’ हुआ. ‘संगीत मार्तंड’, पंडित जसराज.

हालांकि, बेगम अख्तर के सुरों के जादू से इस क़िस्म का वाक़ि’आ सिर्फ़ पंडित जसराज के साथ घटा, ऐसा बिल्कुल नहीं है. बल्कि किस्सा तो एक यूं भी कहा जाता है कि बेगम अख़्तर की ग़ज़ल ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे’ के रिकॉर्ड्स जब बाज़ार में आए तो हाथों-हाथ इतने बिके कि एचएमवी (हिज मास्टर्स वॉइस) के लिए डिमांड के मुताबिक सप्लाई ही मुश्किल हो गई. इसके बाद कंपनी को इंग्लैंड से नया रिकॉर्ड प्रॉसेसिंग प्लांट मंगवाना पड़ा. और जनाब, उनकी दीवानगी सुनने वालों के सिर पर कोई बहुत बड़ी उम्र के बाद जाकर चढ़ी हो, ये भी कोई बात नहीं है. वाक़ि’आ 1934 के आस-पास का है. इस वक़्त बेगम साहिबा की उमर कोई 20-21 साल (7 अक्टूबर 1914 की पैदाइश) होगी. मां के साथ वे कलकत्ते में रहती थीं. उन दिनों नेपाल-बिहार के इलाकों में बड़ा भूकंप आया था. क़रीब 10,000 से ऊपर लोग मारे गए. लाखों बेघर हुए, जिनको मदद चाहिए थी.

एक किताब है जनाब, ‘अख्तरी : सोज और साज का अफ़साना’. इक़बाल रिजवी ने उसमें ये वाक़ि’आ लिखा है. ‘कलकत्ते में भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए एक जलसा हुआ था. उसमें पटियाला घराने के गवैये उस्ताद मोहम्मद अता खान थे. ये अख़्तरी बाई (बेगम अख़्तर को अख़्तरी बाई फ़ैजाबादी भी कहते थे) के उस्ताद होते थे. साथ में अख़्तरी भी थीं. दूसरे बड़े फ़नकारों का आना भी तय रहा था. लेकिन उनमें से कुछ नहीं आए. इससे जलसा करने वाले हैरान-परेशान होने लगे. सामने बैठे लोग भी ख़फ़ा हो रहे थे. तब हालात संभालने के लिए उस्ताद अता खान ने ऊपर वाले का नाम लेकर, अख़्तरी को आगे कर दिया. पहली ही महफ़िल थी अख़्तरी की यह. जाहिर है, धड़कनें बढ़ी थीं. पैर कांप रहे थे. बावजूद सुर नहीं हिले. ता’लीम पक्की थी क्योंकि. अख़्तरी ने शुरुआत की- तूने बुत-ए-हरजाई कुछ ऐसी अदा पाई, तकता है तेरी ओर हर एक तमाशाई. और शमां बंध गया’.

‘जलसे में हर तमाशाई अब अख़्तरी की ओर ही तक रहा था. फ़रमाइशें होने लगीं थीं. इन्हें पूरी करते हुए एक-एक कर चार ग़ज़लें गानी पड़ीं अख़्तरी को. इसके बाद ही जलसा ख़त्म हुआ. लेकिन अख़्तरी की दास्तान यहां से शुरू हुई. अख़्तरी अभी मंच से उतर पातीं कि इस जलसे में ख़ास तौर पर बुलाई गई एक नामचीन हस्ती उनसे वहीं मिलने आ गईं. कहने लगीं- मैं ये तय करके आई थी कि कुछ देर ही इस कार्यक्रम में रुकूंगी. लेकिन तुम्हें सुना तो ठहर गई. अब कल तुम मुझे सुनने आना. इसके बाद उन मोहतरमा ने अख़्तरी को वहीं खादी की साड़ी भी भेंट की. तमाशबीनों की तालियों से पूरा माहौल गूंज गया’. इन मोहतरमा का नाम जानते हैं जनाब क्या था? यह ‘हिन्दुस्तान की स्वर कोकिला’ सरोजिनी नायडू थीं! अब इस वाक़ि’अे से थोड़ा और पहले चलते हैं, बेगम अख़्तर साहिबा के बचपन के दिनों में. यह  वाक़ि’आ फ़ैजाबाद और लखनऊ का है.

Begum Akhtar

बेगम साहिबा की वालिदा मुश्तरीबाई लखनऊ के नवाबों की दरबारी गायिका होती थीं. उनका निकाह लखनऊ के खानदानी बाशिंदे असग़र हुसैन से हुआ. मशहूर वकील थे वे. मुश्तरी से ‘इश्क़ करते थे. बावजूद ये कि उन्हें मुश्तरी का गाना-बजाना पसंद नहीं था. रोक-टोक की तो मुश्तरी नाराज़ हो गईं. अब तक उनकी दो बेटियां ज़ोहरा और बिब्बी (अनवरी और अख़्तरी) पैदा हो चुकी थीं. लेकिन इन औलादें के मासूम चेहरे भी मियां-बीवी के झगड़े ख़त्म न करा सके. मुश्तरी बेटियों को लेकर फ़ैज़ाबाद चली आईं. फ़ैज़ाबाद में मां-बेटियों के हालात और मुश्किल हो गए. लोग उन पर तंज कसने लगे. उन्हें तवाइफ़ तक कहा जाने लगा. ये मुश्किलात और बढ़ीं, जब भूल से हुए एक हादसे में अनवरी का इंतिक़ाल हो गया. बावजूद इसके, मुश्तरी चाहती थीं कि अख़्तरी पढ़े-लिखे. इसलिए उन्होंने उसे स्कूल भेजने का बंदोबस्त किया. मगर अख़्तरी का मन पढ़ाई में न लगा.

अख़्तरी को तो बेगम अख़्तर होना था, ‘मल्लिका-ए-ग़ज़ल’. महज छह-सात साल की उम्र में उस तरफ़ क़दम बढ़ा दिए थे उसने. गाना सीखना शुरू कर दिया था. गाने भी लगी थीं. तभी एक रोज एंजेलिना योवर्ड (यही गौहर जान के नाम से मशहूर हुईं), फ़ैज़ाबाद आईं. इत्तिफ़ाक़ से वह उस कक्षा में भी गईं, जहां अख़्तरी पढ़ने बैठी थीं या कहिए कि बिठाई जाती थीं. बताते हैं, उस रोज अख़्तरी ने गौहर जान के सामने अमीर ख़ुसरो का एक कलाम गाकर सुनाया था, ‘अम्मा मोरे भैया को भेजो सवान आया’. इसे सुनकर गौहर जान अवाक् रह गईं. बोलीं, ‘अगर इस बच्ची को संगीत की सही ता’लीम मिली तो ये एक रोज़ ‘मल्लिका-ए-ग़ज़ल’ बनेगी’. और देख लीजिए जनाब, आगे चलकर कैसी सोलह आने सच साबित हुई गौहर जान की यह बात. हालांकि, इन लफ़्ज़ों के सच होने तक के सफ़र में अख़्तरी को कैसी मुश्किलात झेलनी पड़ीं, ये भी कोई कम ग़ौर करने की बात नहीं.

बेगम साहिबा की एक शागिर्द रहीं हैं रीता गांगुली. उन्होंने भी अपनी उस्ताद के बारे में किताब लिखी है, ‘ए मोहब्बत : बेगम अख़्तर की यादें’ के नाम से. इसमें उन्होंने बेगम साहिबा से जुड़े मुख़्तलिफ़ वाक़’अे दर्ज़ किए हैं. इनमें एक वह भी है, जब बिहार के राजा ने उनसे जबरन ज़िस्मानी रिश्ता बनाया और छोड़ दिया. तब तक उन्होंने जवानी की दहलीज़ पर क़दम भी नहीं रखा था. इस रिश्ते से उन्हें एक बेटी हुई, जिसे वे शर्म-ओ-लिहाज़ की वज़ह से बरसों तक ‘छोटी बहन’ कहती रहीं. फिर एक वाक़ि’आ वह भी, जब उनका निकाह लखनऊ के ही एक वकील इश्तियाक़ अहमद अब्बासी से हुआ. उनके कहने पर उन्होंने गाना भी छोड़ा. क़रीब पांच साल तक नहीं गाया. मगर सुरों से उनका रिश्ता यूं था कि उनकी कमी उन्हें बीमार कर गई. तब वकील साहब से नाता तोड़ना पड़ा. सुरों से ही रिश्ता निभाया. फिर सुर और ‘सुरों की मल्लिका’ ने एक-दूसरे का साथ कभी नहीं छोड़ा, आख़िरी सांस तक.

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