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दास्तान-गो : जब कुवैत पर इराक़ी हमला हुआ, ‘रेत पर अमेरिकी लक्ष्मण-रेखा’ खिंची

आज ही के दिन पहली बार इराक ने कुवैत पर हमला बोला था.

आज ही के दिन पहली बार इराक ने कुवैत पर हमला बोला था.

Daastaan-Go ; Day when Iraq Attacked on Kuwait : यह थी वह ‘लक्ष्मण रेखा’ जिसका ज़िक्र अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ‘सीनियर’ ने किया था. उस वक़्त जब कुवैत पर इराक़ी हमले के पांच दिन बाद ही उनके मुल्क की अगुवाई में इराक़ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला गया था. अपने साथी मुल्कों को उन्होंने इस मामले में इराक़ से तय दिख रही लड़ाई के लिए जोड़ना शुरू किया था तब. उस वक़्त उन्होंने कहा था कि ‘हम ‘ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म’ के ज़रिए ‘रेत पर लकीर’ खींचने जा रहे हैं’.

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़… 

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जनाब, रामायण में ‘लक्ष्मण रेखा’ वाला एक क़िस्सा है. हिन्दुस्तान के तमाम लोग इससे वाक़िफ़ हैं. इसके इर्द-गिर्द जुड़ी तीन चीज़ों से भी सब वाबस्ता हैं. इनमें से एक- सोने के हिरण का मोह. दूसरा- राक्षसों के हमले का ख़तरा. और तीसरा- उनके हमले से सीता जी को सुरक्षित करने के लिए ‘एक रेखा’ खींचने पर लक्ष्मण जी का मज़बूर होना. यह ‘लक्ष्मण रेखा’ कहलाई, जिसे पार करने के नतीज़े हमेशा ख़तरनाक हुए. जनाब, इन्हीं तीन चीजों को ख़ुद में समेटे एक वाक़ि’आ हमारी आज की दुनियावी सियासत में मौज़ूद है. इसमें तीन किरदार हैं. एक- कुवैत. उसे ‘सोने का हिरण’ समझिए. दूसरा- इराक़, जिसने इस सोने के हिरण के मोह में उस पर हमला किया. और तीसरा- अमेरिका, जिसने इराक़ को उसकी गुस्ताख़ी का नतीज़ा दिया. साथ ही, अरब के रेगिस्तान की ‘रेत पर लक्ष्मण रेखा’ खींच दी. चेतावनी के साथ कि अब कोई और इसे पार न करे.

जनाब साल 1990 की बात है यह. इराक़ में सद्र-ए-मुल्क यानी कि राष्ट्रपति के ओहदे पर उस वक़्त सद्दाम हुसैन हुआ करते थे. तानाशाह तबीयत के आदमी होते थे. वह आज की ही, यानी दो अगस्त की तारीख़ थी कि पता नहीं सद्दाम हुसैन को क्या सूझा, उन्होंने अपनी फ़ौज को कुवैत पर चढ़ाई करने का हुक्म दे दिया. कुवैत छोटा सा मुल्क. जबकि इराक़ के पास दुनिया की चौथी ताक़तवर फ़ौज हुआ करती थी. वहां के सद्र उस वक़्त शेख जबर अल-अहमद अल-सबाह थे. लेकिन वे बस नाम से ही ‘जबर’ साबित हुए. क्योंकि जैसे ही उन्हें ख़बर मिली कि इराक़ी फ़ौज उनके मुल्क की सरहदों के भीतर घुस आई है, उन्होंने अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और ख़ुद सरहद पार उड़ लिए. सऊदी अरब में जा छिपे. इधर, इराक़ी फ़ौज ने महज दो दिनों में कुवैत के फ़ौजियों को घुटनों पर ला दिया और उस मुल्क के क़रीब-क़रीब हर ठिकाने पर अपना परचम फ़हरा दिया.

इराक़ी सद्र सद्दाम हुसैन अब अपनी इस कामयाबी पर सीना ताने थे. उन्हें लगा था कि वे दुनिया के साथ अब अपने हिसाब से सौदेबाज़ी कर सकते हैं. क्योंकि कुवैत छोटा मुल्क होने के बावजूद तेल के कुओं के मामले में बहुत बड़ा था. उन पर भी अब इराक का क़ब्ज़ा हो चुका था. इराक़ पर तब करोड़ों डॉलर का क़र्ज़ा हुआ करता था. और दिलचस्प बात ये थी कि इराक़ के सिर पर रखे इस क़र्ज़ का बड़ा हिस्सा उसे कुवैत से ही हासिल हुआ था. दरअस्ल, 1980 की दहाई के बाद इराक़ के साथ ईरान की बड़ी लड़ाई हुई थी. यह लड़ाई 1988 में ख़त्म हुई. इसमें अमेरिका ने इराक़ का साथ दिया था. क्योंकि वह ईरान को इराक़ के मुक़ाबले बड़ा ख़तरा मानता था. लिहाज़ा, उसने ईरान को ठिकाने लगाने के लिए ख़ुद तो इराक़ की मदद की ही. हर तरह से फ़ौजी और माली (वित्तीय). साथ ही कुवैत जैसे अपने साथी मुल्कों से भी इराक़ को खूब मदद दिलवाई थी.

लेकिन जनाब, जैसे ही ईरान और इराक़ की लड़ाई ख़त्म हुई, ये रिश्ते भी उलट गए. उलट क्या गए, ख़त्म हो गए. ईरान के साथ लड़ते-लड़ते इराक़ की माली हालत ख़स्ता हो चुकी थी. सो, उसने कुवैत से मंशा जताई कि दोस्ती के नाते, वह उसे दिया गया क़र्ज़ माफ़ कर दे. लेकिन कुवैत राज़ी न हुआ. इतने से इराक़ की त्यौरियां चढ़ गईं. अव्वल तो उसके पास पैसे नहीं थे. तिस पर, पड़ोस में हर तरह से मालदार, लेकिन फ़ौजी लिहाज़ से कमज़ोर मुल्क अपनी पर इतरा रहा था. ऐसे में इराक़ से रहा न गया. कुवैत पर हमला कर उसने एक साथ तीन निशाने साधने का मंसूबा बांध लिया. एक तो ये कि कुवैत पर क़ब्ज़े के बाद उस पर चढ़े क़र्ज़ का बड़ा हिस्सा अपने आप ही माफ़ हो जाना था. दूसरा- कुवैती तेल पर हक़ जमा लेने के बाद वह उसके जरिए दूसरे क़र्ज़े उतार सकता था. तीसरा- इसी दम पर दुनिया के दीगर मुल्कों से अपनी शर्तें मनवा सकता था.

अब तेल की ज़रूरत तो दुनिया के हर मुल्क को हुआ करती है. सो, इसी ज़रूरत ने दुनिया के सबसे ताक़तवर मुल्क अमेरिका को मज़बूर किया कि वह ऐसे बंदोबस्त करे कि फिर कोई इराक़ के जैसी गुस्ताख़ी न कर सके. दुनिया-भर को अपनी शर्तों पर नचाने के बारे में सोच भी न सके. लिहाज़ा, छह अगस्त को अमेरिका की अगुवाई में यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल ने इराक़ के नाम चेतावनी दी. उससे कहा कि वह ‘बिना शर्त अपनी फ़ौज कुवैत से हटा ले. उसे आज़ाद करे. वर्ना उसे ख़तरनाक नतीज़े भुगतने होंगे’. इसके साथ ही इराक़ पर तमाम तरह के प्रतिबंध भी लगा दिए. ताकि उस पर दबाव बने. इसके असर से ही वह कुवैत से हटने की बात मान ले. लड़ाई न करनी पड़े. लेकिन इराक़ी सद्र ने चेतावनी और दबाव सिरे से ख़ारिज़ कर दिया. मुमकिन है, उन्हें लगा हो कि दुनिया उनकी बात मानेगी. उन्हें किसी की सुनने या मानने की ज़रूरत नहीं.

लेकिन सद्दाम हुसैन ग़लत साबित हुए जनाब. उन्होंने नवंबर तक जब कुवैत नहीं छोड़ा तो यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल ने एक प्रस्ताव पारित किया. इसमें अमेरिका को ये हक़ दिया कि इराक़ को सबक सिखाने के लिए जो बन पड़े, करे. अमेरिका ने भी अपनी तरफ़ से चेतावनी जारी कर दी कि 15 जनवरी तक अगर इराक़ी फ़ौजें कुवैत से नहीं हटीं तो इराक़ के ख़िलाफ़ फ़ौजी कार्रवाई की जाएगी. इराक़ ने इस चेतावनी को भी नज़रअंदाज़ किया. लिहाज़ा, 17 जनवरी 1991 को अमेरिका की अगुवाई में 34 मुल्कों की फ़ौज ने इराक़ पर धावा बोल दिया. इससे पूरी दुनिया में सक्ते का ‘आलम पसर गया. डर था कि कहीं तीसरा विश्व युद्ध न शुरू हो जाए. क्योंकि एक या दो मुल्क भी अगर इराक़ के साथ खड़े होते तो नतीज़ा यही होना था. अलबत्ता, सद्दाम के साथ कोई खड़ा न हुआ. अगले 43 दिनों तक अरब के रेगिस्तान में खून की धारा बही.

आख़िरकार 27 फरवरी को सद्दाम हुसैन ने घुटने टेक दिए. इससे पहले अमेरिका की अगुवाई वाली फ़ौज ने क़रीब 100 घंटे तक इराक़ और उसके क़ब्ज़े वाले कुवैती ठिकानों पर धुआंधार ज़मीनी हमले किए थे. क्योंकि उसके पहले हवाई और मिसाइल हमलों से कोई ख़ास नतीज़ा नहीं निकला था. इराक़ी फ़ौज उन हमलों से ख़ुद को लगातार बचाए रख रही थी. लेकिन ज़मीनी फ़ौजी कार्रवाई के बाद उसके पास कोई रास्ता न रहा फिर. इराक़ी फ़ौज को उल्टे पैर कुवैत से लौटना पड़ा. इसके बाद कुवैत के सद्र शेख जबर अल-अहमद अल-सबाह भी अपने मुल्क लौट आए और वहां आहिस्ता-आहिस्ता हालात ठीक होने लगे. इधर, अमेरिका की दख़लंदाज़ी के बाद इराक़ से सद्दाम हुसैन को भी गद्दी से हटा दिया गया. अलबत्ता, कहानी इतने पर ख़त्म न हुई. साल 1982 के दुजैल नरसंहार मामले में इराक़ी अदालत में सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया गया.

अस्ल में, जब सद्दाम इराक़ी सद्र थे, तो दुजैल क़स्बे में 148 शिया मुस्लिमों को क़त्ल कर दिया गया था. इसी मामले में उनको दोषी पाया गया और उन्हें फ़ांसी की सज़ा सुना दी गई. साल 2003 में दिसंबर की 13 तारीख़ को तिकरित शहर के एक घर से सद्दाम हुसैन को गिरफ़्तार किया गया. इसके तीन साल बाद 30 दिसंबर 2006 को उन्हें फ़ांसी पर चढ़ा दिया गया. सही मायनों में यह थी वह ‘लक्ष्मण रेखा’ जिसका ज़िक्र अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ‘सीनियर’ ने किया था. उस वक़्त जब कुवैत पर इराक़ी हमले के पांच दिन बाद ही उनके मुल्क की अगुवाई में इराक़ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला गया था. अपने साथी मुल्कों को उन्होंने इस मामले में इराक़ से तय दिख रही लड़ाई के लिए जोड़ना शुरू किया था तब. उस वक़्त उन्होंने कहा था कि ‘हम ‘ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म’ के ज़रिए ‘रेत पर लकीर’ खींचने जा रहे हैं’.

दिलचस्प बात ये कि साल 1991 बुश ‘सीनियर’ ने ‘रेत पर जो लकीर’ खींचनी शुरू की, वह अंज़ाम तक तब पहुंची, जब उनके बेटे बुश ‘जूनियर’ अमेरिका के राष्ट्रपति बने. यानी साल 2003 में. जनाब, उस तारीख़ी वाक़ि’अे को आज भी इराक़ी लोग किसी बुरे सपने की तरह याद किया करते हैं. अरब मुल्कों का एक बड़ा मीडिया घराना है अल-जज़ीरा. उसके नुमांइदे से बातचीत करते हुए अभी दो साल पहले इराक़ी फ़ौज के एक बड़े पुराने अफ़सर सुभी तॉफ़ीक़ ने कहा था, ‘जब मैंने कुवैत पर इराक़ के हमले की ख़बर सुनी, तो मैं एकदम सन्न रह गया था. खाड़ी के दोनों मुल्कों (इराक़ और कुवैत) के लिए यह भयानक हादसा था. तमाम जानकारों को अंदेशा हो चला था कि इस हिमाक़त के बाद अब कुछ पहले से जैसा नहीं रहने वाला है. इराक़ के तो अंत की शुरुआत ही हो गई थी गोया, उस हमले के बाद से’. जी जनाब, सही सुना आपने ‘मुल्क का अंत’, ‘तानाशाह का अंत’. अमेरिका ने ‘रेत पर जो रेखा’ खींची, उसमें तमाम मुल्कों के लिए यही पैगाम था.

Tags: Hindi news, Iraq, Kuwait, News18 Hindi Originals

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