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दास्तान-गो : दिलीप कुमार के लफ़्ज़ों को पढ़िए, यूसुफ़ खान के आवाज़ी रास्ते से

दिलीप कुमार की आज पहली पुण्यतिथि है.

दिलीप कुमार की आज पहली पुण्यतिथि है.

Daastaan-Go ; Dilip Kumar First Death Anniversary : लोग ट्रेजिडियंस होते हैं बड़ी उम्र में. जैसे यहां लॉरेंस ओलिवियर (ब्रिटिश अभिनेता) वग़ैरा हैं, लेकिन छोटी उमर ये चीज़ बहुत ही असर-अंदाज़ होती है तबी’अत (स्वभाव) के ऊपर. और इसके लिए मैं यहां (लंदन) भी आया था. कई मैंने ड्रामा के कोच थे, जिनसे बात की और जिनसे मशवरा किया. कुछ सायकाइट्रिस्ट थे, उनसे मशवरा किया.

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज… 

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हक़ीक़त बताऊं, पिटाई के डर से मैंने ये नाम (दिलीप कुमार) रक्खा. हां, मेरे वालिद क़िबला (पूजनीय) मरहूम (स्वर्गीय ग़ुलाम सरवर खान) अल्लाह उनको (जन्नत) बख़्शे. वो फिल्मों के सख़्त मुख़ालिफ़ (विरोधी) थे. उनके अज़ीज़ दोस्त लाला बशेशरनाथ थे, जिनके साहबज़ादे पृथ्वीराज कपूर भी फिल्म एक्टिंग किया करते थे. वो अक्सर बशेशरनाथ जी से बड़ी शिकायत करते थे कि तुमने ये क्या कर रक्खा है कि तुम्हारा इतना नौजवान और सेहतमंद लड़का, देखो ये क्या काम करता है. तो मैं जब फिल्म में आया तो मुझे वो तनक़ीद (आलोचनात्मक राय) और वो पठान आदमी थे, मुशर्रफ़ तर्बियत (प्रतिष्ठित व्यक्तित्त्व) थी इनकी और ख़ौफ़ भी था कि ये जब इनको मालूम होगा तो नाराज़ बहुत होंगे. और उस वक़्त दो-तीन नाम सामने रक्खे गए कि यूसुफ़ खान नाम रक्खा जाए, दिलीप कुमार रक्खा जाए या वासुदेव रक्खा जाए. तो मैंने अपनी ज़ाती तौर से (मशहूर अदाकारा देविका रानी, जिन्होंने यूसुफ़ साहब को नया नाम दिया) कहा कि यूसुफ़ खान मत रखिए. और जो आपके दिल में आए आप नाम रख दीजिए.

तो बाद में कुछ कोई दो-तीन महीने के बाद जब मैंने अपना ख़ुद इश्तिहार में नाम देखा तो मुझे मालूम हुआ कि मेरा नाम दिलीप कुमार तज्वीज़ (तय करना) किया गया… पठान लोग आम तौर पे, फ़ुनून-ए-लतीफ़ा (संगीत, नृत्य जैसी ललित कलाएं) से उनकी इतनी वाबस्तगी (संबंध) नहीं, जितनी कि जफ़ाकशी (परिश्रम) या जवां-मर्दी (बहादुरी) से उनका नाम मुताल्लिक़ (संबंध जोड़ना) किया जाता है. लेकिन मैं ख़ुद भी इस बात को समझ नहीं पाया. अक्सर मैं सोचता हूं कि सू-ए-इत्तिफ़ाक़ (दुर्योग) से मैं फिल्म-एक्टर बन गया. और कुछ शायद मेरे बचपन के वाक़ि’आत (घटनाएं) और जो हादसात (दुर्घटनाएं) थे, उनकी कुछ नौ’इय्यत (विशेषता) इस क़िस्म की थी कि अंदरूनी तौर से मुझमें एक जज़्बाती कैफ़ियत (विशेष लक्षण) जो थी, वो ज़्यादा शरीक थी… वो यूं है मैं आपको बताऊं, ट्रेजडी यानी अलमिया क़िस्म की कहानी का असर ज़्यादा होता है. जैसे लैला-मजनूं की दास्तान या शीरीं-फ़रहाद का वो क़िस्सा. आप समझ लीजिए कि जहां एक अलमिया (दुखद) उसका, यानी जहां उसका अंजाम अलमिया होगा जो ट्रेजडी, ट्रेजिक कहानी होगी, उसका असर और ग़म का, तकलीफ़ का या रंज का असर जो होता है वो देर-पा (देर तक) होता है. खुशी या मुसर्रत जो है, वो जल्दी गुज़र जाती है. मेरे ख़्याल से जहां तक कि ये अलमिया अदाकारी का जो इंप्रेशन ज़्यादा देर तक क़ायम रहा है वो इसीलिए है कि अलमिया कहानी जो है, वो ब-ज़ात-ए-ख़ुद (अपने आप में) देर-पा असर रखती है.

यक़ीनन पड़ता है (दिमाग़ पर असर) कि हर कहानी में समझिए न कि रंज और तकलीफ़ और रोज़ सुबह उठिए तो नहा-धो के, कपड़े बदल के आप स्टूडियो में पहुंचिए तो कोई रोने-मरने का सीन या कोई तकलीफ़ का. इस क़िस्म की चीज़ जो है वो इंसान के, उसकी ज़ेहनी नशो-ओ-नुमा (विकसित होना) पर असर-अंदाज़ होती है. और छोटी उमर में, लोग ट्रेजिडियंस होते हैं बड़ी उम्र में. जैसे यहां लॉरेंस ओलिवियर (ब्रिटिश अभिनेता) वग़ैरा हैं, लेकिन छोटी उमर ये चीज़ बहुत ही असर-अंदाज़ होती है तबी’अत (स्वभाव) के ऊपर. और इसके लिए मैं यहां (लंदन) भी आया था. कई मैंने ड्रामा के कोच थे, जिनसे बात की और जिनसे मशवरा किया. कुछ सायकाइट्रिस्ट थे, उनसे मशवरा किया. उन्होंने ये कहा कि इस चीज़ से, इससे छुटकारा पाने की, क्योंकि ये इंसान के नुक़्ता-ए-निगाह (देखने-सोचने का ढंग) को एक अज़ीब क़िस्म का अलमिया-सा या ट्रेजिक रंग दे देती है. या इसे ऐसे यूं समझ लीजिए, कि भई बदनसीबी की एक मोहर लग गई हम पर…

तो उन लोगों ने कहा कि आप ज़रूर कॉमेडी ट्राइ कीजिए. कोशिश कीजिए कॉमेडी करने की. एक्शन का फ़िल्म करने की. या किरदार को अपने जो है, एक शरीफ़ क़िस्म की तब्दीली अपने किरदार में लाइए, काम करने का जहां तक त’अल्लुक़ है. उससे वो… फ़ायदा होगा. और मैंने कोशिश की. मैंने बहुत सी उसके बाद कॉमेडीज़ की हैं. जैसे- ‘शबनम’ किया, और ‘आज़ाद’, और ‘कोहिनूर’, और ‘राम और श्याम’, इस क़िस्म की कॉमेडीज़ हैं, ये भी कीं. उससे क्या होता है कि इंसान की पर्सनैलिटी जो है, वो एक तरह से माऊफ़ (बिगड़ा हुआ) नहीं हो जाती. ये एक एक्टर के लिए शदीद (गंभीर) मसला है. और ख़ास तौर से उस वक़्त जबकि हम अपने काम से ज़ाती तौर से बड़े मुतअस्सिर (प्रभावित) होते हैं. कोई कहता है ये आपकी मां है और ये मर गई है. हमको मालूम है कि ये मां नहीं है, ये मरी हुई नहीं है. ये ज़िंदा है, इनका नाम ललिता पवार है. ये जाग रही थीं, अभी इन्होंने पेट भर के खाना खाया था, दोपहर में. लेकिन अपने ऊपर वो एक, हावी करना एक जज़्बे को. एक क़िस्म की शदीद (कठिन) यानी सज़ा है अपने नर्वस इक्विपमेंट को. इसको यानी रोज़-रोज़, हर साल अगर आदमी करता है तो वो इसका अशीर (हिस्सा) हो जाता है…

जहां तक मैं कहूं कि दोनों ही पहलू हैं. इंसान की जो पर्सनैलिटी होती है, या शख़्सियत होती है, उसमें तज़ाद (विरोधाभास) होता है, उसमें मुख़्तलिफ़ (विभिन्न) पहलू होते हैं. हंसी-खेल का एक पहलू होता है. लुत्फ़ लेने का पहलू होता है. फिर संज़ीदगी (गंभीरता) का होता है. मतानत (शालीनता) का होता है. फ़िक्र-मंदी भी होती है. लेकिन मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि ग़ुरूर या घमंड जो है, वो इंसान की शख़्सियत में एक बीमारी है, एक मर्ज़ है, उससे बचने का. अब कितने लोग, जो लोग मुझे ज़ाती (निजी) तौर से जानते हैं, वो तो जानते हैं. अब जो लोग मुझे ज़ाती तौर से नहीं जानते, वो नहीं जानते. तो जो जानते हैं, उनकी राय तो मुस्तक़िल (स्थिर) है. जो नहीं जानते, उसकी क़यास-आराई (अटकलें लगाना) जो है, वो मेरी दस्तरस (पहुंच) से बाहर है. मैं अब किसी को, हरेक को जा के ये नहीं समझा सकता. और इस पोज़ीशन में ऐसे होता है कि आप ज़्यादातर जा के लोगों से मिलकर बात करें या अपने किसी मसले की वज़ाहत (स्पष्टता) करें, ये एक नामुमकिन सी बात है. वैसे, आर्टिस्ट की पर्सनैलिटी में ये तज़ाद जो है, वो रहता है. लेकिन ग़ुरूर घमंड का अगर मुझ पर कोई इलज़ाम लगाए तो उस बात का वाक़ई सदमा होगा…

शोहरत और नाम जो है, इससे एक अच्छे आर्टिस्ट को या किसी भी आदमी को हमेशा ग़ैर-मुताल्लिक (असंबद्ध) रहना चाहिए. शोहरत तो मेरी है, अगर मैं ये समझने लगूं तो मेरी सेहत के ख़िलाफ़ बात होगी, ज़ेहनी सेहत के ख़िलाफ़. अल्लाह की कुदरत है, उसने मुझे तख़लीक़ (रचना) दी. मैं पैदा हुआ जिस घर में, उसमें मेरा इरादा नहीं था. मैं अपने इरादे से आया नहीं. मैं अपने इरादे से यहां नहीं पहुंचा. मैंने कुछ उस वक़्त ये नहीं तज्वीज़ (बंदोबस्त करना) किया था कि बर्मिंघम में इंटरव्यू होगा. कौल साहब बैठेंगे और सवाल पूछेंगे. और जिस दिन इस दुनिया से जाना है, उसका मैंने कोई इंतज़ाम नहीं किया, न मुझे उसके मुताल्लिक़ कुछ मालूम है. तो शोहरत हो या बदनामी हो, रुसवाई हो, वो दी हुई, मैं ये समझता हूं कि अल्लाह की तरफ़ से है. कोशिश अपने तईं, हां, मेरा फ़र्ज़ है मैं कोशिश करता रहा हूं. मैं अपने आप को ग़ैर-मुताल्लिक़ रखना चाहता हूं. चाहे मैं इसमें कभी-कभी नाकाम भी रहूं. ये कोशिश, ये शोहरत (एक तमाशबीन की तरह), हां, ये ही हां, ये काम, और एक मेहनत और एक ख़ुलूस (सच्चा लगाव) का नतीज़ा है. तो आप अपने काम और मेहनत और ख़ुलूस से ज़्यादा वाबस्त रहिए. और अपने काम के जो नताएज़ (नतीज़े) हैं, या उसकी जो शोहरत है, उससे ग़ैर-वाबस्ता रहना अच्छा है. ये बेहतर बात है.

जहां आपने ये कहा कि ज़िंदगी का, यानी इंसान का हासिल क्या है कि वो समझता है कि मैं क्या करूं. मैं यही चाहूंगा कि मैं एक बेहतर इंसान बन सकूं. बेहतर काम कर सकूं. समाज़ी-ख़लफ़िशार (समाज का माहौल) है. इसमें अगर थोड़ा-बहुत सुकून भी मेरी वज़ा से या किसी को खुशी या थोड़ा सा इक अंदरूनी क़िस्म का एहसास, किसी भले क़िस्म का अगर हो जाए, तो मैं समझूंगा कि ये बेहतर है. और कोशिश मेरी यही रहेगी…

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(जनाब, ‘दास्तान-गो’ आज फिर आप और आपके अज़ीज़ फ़नकार के बीच नहीं आया. हिन्दी सिनेमा के ‘एक, इक़लौते, अलहदा यूसुफ़ भाई उर्फ़ दिलीप साहब’ की आज पहली बरसी (सात जुलाई 2021 को इंतिक़ाल हुआ) है. इस मौके पर आपके लिए उनके जानिब (तरफ़) से कुछ दीगर तलाशते हुए उनका यह एक इंटरव्यू हाथ लग गया. साल 1970 में बीबीसी के लिए बर्मिंघम (इंग्लैंड) में एक बड़े ख़बरनवीस महेंद्रनाथ कौल ने लिया था इसे. इसमें दिलीप साहब ने जो जैसा कहा, उसे लफ्ज़-दर-लफ़्ज़ यहां पेश कर दिया. यक़ीनन, इसे पढ़ते हुए उनकी शख़्सियत के कई पहलू आपके सामने उभरकर आए होंगे. हालांकि जहां इस सिलसिले को रोका गया है, वहां से दिलीप साहब की शख़्सियत का ऐसा पहलू सामने आता है, जिसे लफ़्ज़ों में बयां करना मुमकिन न हुआ. क्योंकि वहां से आगे उन्होंने अपनी आवाज़ में एक ग़ज़ल गाकर सुनाई है. ‘सुकून-ए-दिल के लिए कुछ तो एहतिमाम करूं’. जी हां, दिलीप साहब गाते भी बहुत अच्छा थे. सुनना चाहें तो लता मंगेशकर के साथ उनका गाया एक नग़्मा सुन लीजिए. यू-ट्यूब पर मौज़ूद है. ये उन्होंने साल 1957 की फिल्म ‘मुसाफ़िर’ के लिए गाया है. नग़्मे के बोल हैं, ‘लागी नाहीं छूटे, चाहे जीया जाए.’ सुनकर आप उन्हें पेशेवर गुलू-कार न मान बैठें तो शर्त. इसीलिए तो आज भी कह जाता है कि हिन्दी सिनेमा में दिलीप साहब जैसा न कोई हुआ है पहले और न शायद होगा आगे कभी.)

Tags: Death anniversary special, Dilip Kumar, Hindi news, News18 Hindi Originals

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