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दास्तान-गो : ‘कामराज योजना’, जो कांग्रेस को ‘भारतीय राष्ट्रीय’ से ‘परिवारवादी’ की राह ले गई

कामराज 1957 में जब दोबारा मद्रास के मुख्यमंत्री बने, तब तक वे ‘व्यक्तिपूजा वाली राजनीति’ की गहराई अच्छी तरह नाप चुके थे.

कामराज 1957 में जब दोबारा मद्रास के मुख्यमंत्री बने, तब तक वे ‘व्यक्तिपूजा वाली राजनीति’ की गहराई अच्छी तरह नाप चुके थे.

इंदिरा के ऐसे कामों ने तमाम नेताओं ही नहीं, आम-जनमानस पर भी असर छोड़ा था. इसे कामराज भांप गए थे. इंदिरा के व्यक्तित्त्व की चमत्कारी शक्ति को भी वे महसूस कर चुके थे. लिहाज़ा इंदिरा को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए अपना पूरा कौशल लगा दिया उन्होंने.

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज…
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हिंदुस्तान की सियासत में परिवारवाद का ज़िक्र खूब हुआ करता है. और इसमें सबसे पहले निशाने पर आती है कांग्रेस. सबसे पुरानी पार्टी जो ठहरी. अभी उदयपुर, राजस्थान में कांग्रेस जब ‘चिंतन’ के लिए जब जुटी तो ये मसला फिर सुर्खियों में आया. क्योंकि कांग्रेस ने इस दौरान अपने ढांचे में कुछ बदलावों का मंसूबा बांधा. हालांकि, बदलाव के मंसूबों के साथ शर्तें इस तरह जोड़ दी गईं कि मामला घूम-फिरकर वहीं ‘परिवार’ के इर्द-गिर्द आ सिमटा. सो, इस जारी मसले की कहानी को यहीं इसके हाल पर छोड़ते हैं. क्योंकि इसके मुकाबिल उस दौर को देखना अधिक दिलचस्प हो सकता है, जब ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ महज चंद सालों में ‘कांग्रेस-परिवारवादी’ में आ तब्दील हुई.
वह 1962 से कुछ बाद की बात है. चीन के साथ युद्ध में हिंदुस्तान को मिली शिकस्त से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू टूट चुके थे. देश के भीतर ही नहीं, दुनिया में भी उनकी साख पर इस शिकस्त ने तगड़ी चोट की थी. इसी वक्त दक्षिण के राज्य मद्रास में कांग्रेस का एक बड़ा सितारा उभर रहा था. कुमारस्वामी कामराजार, यानी के. कामराज. मद्रास के पहले चुनाव (1952 में) कांग्रेस को मिली जीत के बाद हालांकि पार्टी ने अपने कद्दावर नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजा जी) को मुख्यमंत्री चुना था. लेकिन कामराज का उदय इतना तेज था कि महज दो साल के भीतर ‘राजा जी’ को उनके लिए ‘सिंहासन खाली करना’ पड़ा. साल 1954 था, जब कामराज मद्रास के मुख्यमंत्री बने.

kamraj
लगभग इसी दौर में दो और नेता थे, जो कांग्रेस से इतर अपनी राह बना चुके थे. इनमें एक- इरोड वेंकटप्पा रामासामी यानी ईवी रामासामी. ये दलितों और मज़लूमों के हित में, उनके आत्मसम्मान के लिए आंदोलन (द्रविड़) की अगुवाई किया करते थे. हिन्दी के मुकाबिल तमिल भाषा की श्रेष्ठता के लिए संघर्ष करते थे. इस सबसे लोग उनके पीछे पागल हुए जाते थे. इस हद तक कि उन्हें ‘पेरियार’ का दर्जा मिल गया था. मतलब बेहद सम्मानित व्यक्ति. आज़ादी से पहले रामासामी भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ही रहे. मद्रास राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष बने, 1922 में. लेकिन तीन साल बाद ही पार्टी छोड़ दी. या शायद छोड़नी पड़ी. अलग रास्ता ले लिया पेरियार ने.
बताते हैं कि ‘पेरियार’ चाहते थे कि दलितों, आदिवासियों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की कांग्रेस वकालत करे. लेकिन जब उनकी यह बात नहीं सुनी गई तो उन्होंने कांग्रेस से कन्नी काट ली. सत्याग्रह आंदोलन आदि के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई और 1938 में अपनी अलग ‘जस्टिस पार्टी’ बना ली. यह 1944 में द्रविड़ कड़गम (DK) कहलाने लगी. हालांकि पांच साल के भीतर ही 1949 में ‘पेरियार’ के खास कांजीवरम नटराजन अन्नादुरई दूसरे चमत्कारिक व्यक्तित्त्व की तरह सामने आए. उन्होंने ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (DMK) के नाम से अलग पार्टी बनाकर वे तमाम मुद्दे अपने पाले में खींच लिए, जिन्हें पेरियार उठाया करते थे.
उधर, कामराज इन तमाम घटनाक्रमों को नजदीक से देख रहे थे. बल्कि ऐसा कहा जाए कि वे इस तरह के विपक्षी घटनाक्रमों और नेताओं को ही देख रहे थे, तो कोई गलत नहीं होगा. क्योंकि उनका एक सिद्धांत तो बहुत चर्चित हुआ करता था, ‘अपने दोस्तों को तो नज़दीक रखिए लेकिन दुश्मनों को उससे भी ज़्यादा.’ इस तरह, कामराज 1957 में जब दोबारा मद्रास के मुख्यमंत्री बने, तब तक वे ‘व्यक्तिपूजा वाली राजनीति’ की गहराई अच्छे से नाप चुके थे. चमत्कारिक व्यक्तित्त्वों के इर्द-गिर्द घूमने वाली सियासत को नजदीक से परख चुके थे. लिहाज़ा, ख़ुद उन्होंने अपने कामों और नीतियों से अपना व्यक्तित्त्व भी ऐसा ही चमत्कारी बना लिया. इसी बलबूते 1962-63 में जब नेहरू और कांग्रेस की प्रतिष्ठा डगमगाती दिखी, कामराज राष्ट्रीय फलक पर उभर आए.
सितंबर-अक्टूबर 1963 में कामराज ने पंडित नेहरू को एक योजना सुझाई. इसके तहत मशविरा ये था कि कांग्रेस के सभी बुजुर्ग अनुभवी नेता सरकारों के प्रमुख पदों से हट जाएं. उनकी जगह युवाओं को लाया जाए. अनुभवी नेता संगठन में अपना योगदान दें. अपनी इस योजना (Kamraj Plan) के अमल में सबसे पहले गांधी जयंती पर उन्होंने खुद ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उनका दांव काम कर गया और केंद्र से मोरारजी देसाई, लालबहादुर शास्त्री, बीजू पटनायक, बाबू जगजीवन राम सहित छह मंत्रियों और राज्यों से छह ही मुख्यमंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा. सब नेता अब संगठन में आ गए. वहीं, पंडित नेहरू जबर्दस्त तरीके से कामराज के प्रभाव में.
पंडित नेहरू आनन-फानन में कामराज को दिल्ली ले आए. उनकी मंशा के मुताबिक कांग्रेस की कमान बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष, कामराज को सौंप दी गई. यह तारीख थी, नौ अक्टूबर 1963. मगर अभी इस सब को एक साल भी नहीं गुजरता है कि 27 मई 1964 को पंडित नेहरू का निधन हो जाता है. पूरा देश अब कामराज की तरफ देख रहा है. देश की इकलौती सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष अब क्या करेंगे. ज़्यादातर को लगा कि शायद वे प्रधानमंत्री पद संभालेंगे. लेकिन उन्होंने रास्ता चुना ‘किंगमेकर’ बनने का. अभी देश की सियासत में उन्हें वक्त भी तो नहीं हुआ था ज़्यादा. लिहाजा, कामराज ने लालबहादुर शास्त्री को चुना. और उन्हें प्रधानमंत्री की गद्दी सौंपी.

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कामराज कहा करते थे, ‘भारत का प्रधानमंत्री बनना है तो हिन्दी, अंग्रेजी की जानकारी जरूरी है. या इनमें से किसी एक की तो बहुत जरूरी है.’ वे दोनों भाषाएं नहीं जानते थे. बहरहाल, जनवरी 1966 में जब लालबहादुर शास्त्री का निधन हुआ, तब तक तीन साल गुजर चुके थे. संगठन और सरकार पर कामराज अब तगड़ी पकड़ बना चुके थे. अब फिर उनके पास प्रधानमंत्री बनने का मौका था. लेकिन उन्होंने चुना पंडित नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को. इंदिरा उस वक्त तक लालबहादुर शास्त्री की सरकार में सूचना-प्रसारण मंत्री हुआ करती थीं. इस दौरान उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध तथा तमिनाडु के हिन्दी-विरोधी आंदोलनों के वक्त प्रभावकारी काम किए थे.
इंदिरा के ऐसे कामों ने तमाम नेताओं ही नहीं, आम-जनमानस पर भी असर छोड़ा था. इसे कामराज भांप गए थे. इंदिरा के व्यक्तित्त्व की चमत्कारी शक्ति को भी वे महसूस कर चुके थे. लिहाज़ा इंदिरा को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए अपना पूरा कौशल लगा दिया उन्होंने. मोरारजी देसाई जैसे बड़े कांग्रेसी दिग्गजों की नाराजगी मोल ली. यक़ीनी तौर पर कुछ सोचकर, किसी उम्मीद से ही उन्होंने ‘नेहरू की बेटी’ के लिए बड़ा दांव खेला होगा. और इस वक्त तक उन्होंने यह तो बिल्कुल भी नहीं सोचा होगा कि यह दांव उन पर ही उल्टा पड़ेगा. कांग्रेस ‘भारतीय राष्ट्रीय’ से ‘परिवारवादी’ की राह पर निकल जाएगी. और इस राह में उनके जैसे तमाम नेता पीछे धकेल दिए जाएंगे.
अगली कड़ी में पढ़िए
* जिसे ‘परिवारवादी’ कहा जाता है, वह तो असल कांग्रेस है ही नहीं!

Tags: Indira Gandhi, Jawahar Lal Nehru, News18 Hindi Originals

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