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दास्तान-गो : जमशेतजी… कहते थे, ‘ज़िंदगी कभी-कभी ख़तरनाक तरीके से भी जीनी चाहिए’

जमशेत नाम दो लब्ज़ों को मिलाकर बना है. पहला ‘जम’ जिसका एक मायना है, ‘कुल, खानदान’. और दूसरा ‘शेत’, जिसका मतलब हुआ ‘यश, कीर्ति या प्रकाश’

जमशेत नाम दो लब्ज़ों को मिलाकर बना है. पहला ‘जम’ जिसका एक मायना है, ‘कुल, खानदान’. और दूसरा ‘शेत’, जिसका मतलब हुआ ‘यश, कीर्ति या प्रकाश’

Daastaan-Go ; Jamset ji Tata, life and work : अलबत्ता, जमशेतजी का यह तरीका दो साल के भीतर ही, वाक़ई ख़तरनाक साबित हुआ. पैसे बचाने के लिए वे इंग्लैंड से सस्ती मशीनें ले आए थे. इससे सूत की कताई और बनकर निकला उत्पाद दोनों खराब हो रहे थे. और तभी एक मशीन दग़ा दे गई. उससे निकली चिंगारी ने कारख़ाने को ख़ाक कर दिया.

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज…  


यह बात है 1870 के आसपास की. उन दिनों बंबई के एक मंझोले दर्ज़े के पारसी कारोबारी का जवान बेटा नागपुर (वर्तमान महाराष्ट्र का महानगर) की गलियों में घूम रहा था. यहां-वहां ज़मीनें देखा करता था. ख़रीदने के लिए. ज़ेहन में उसके कोई बड़ा मंसूबा पल रहा था. उसे अमलीज़ामा पहनाने के लिए ज़मीन की ज़रूरत थी. इस सिलसिले में कुछ वक़्त बाद उस युवक की तलाश शहर के बाहरी इलाके में एक बड़े से दलदल पर जाकर ख़त्म हुई. कीमत बहुत कम थी उसकी. सो, तुरंत ख़रीद लिया और उसे भरवाकर उस पर एक इमारत तामीर करानी शुरू कर दी. लोग उसके काम करने के इस तरीके पर हंसा करते. पर उसकी जेब में अपने बड़े मंसूबे के लिहाज़ से रकम कुछ कम थी. महज 1.5 लाख रुपए. तो वह करता भी क्या? पैसे बचा-बचाकर खर्चने थे.

कारोबार में तब मारवाड़ी, महाजनों का ठीक-ठाक बोल-बाला होता था. उस युवक ने उनसे माली मदद लेने की कोशिश की. पर कई महाजन हिम्मत न दिखा पाए. बल्कि, एक महाजन तो यहां कह गए, ‘ज़मीन में सोना (पैसा) डालकर मिट्‌टी कौन निकालता है भाई?.’ मगर 33-34 बरस के आसपास का वह युवक इरादे का पक्का था. उसने न सिर्फ उस ज़मीन पर इमारत तामीर कराई, बल्कि उसके दायरे में समुंदर पार से मंगवाकर बड़े-बड़े मशीनी चरखे भी लगवा दिए. सूत कातने और कपड़े बनवाने के लिए. सस्ते कामग़ार जुटाए और उस कपड़ा कारखाने को चलाकर दिखा दिया. यह साल हुआ 1874 का, जब हिंदुस्तान में पहली बार किसी हिंदुस्तानी ने अपना कारखाना खड़ा किया था. क्योंकि इससे पहले तो उद्योग धंधों पर अंग्रेजों का राज था.लोग उस युवक की कामयाबी पर भौंचक्के हुए जाते थे. और वह युवक हंसकर अक्सर अपने साथियों से कहा करता, ‘ज़िंदगी कभी-कभी ख़तरनाक तरीके से भी जीनी चाहिए.’ इस युवक का नाम था, जमशेतजी नुशेरवांजी टाटा. हिंदुस्तानी उद्योगों का ही नहीं, दुनिया में तमाम लोगों की ज़िंदगी में आज नमक की तरह घुल चुके टाटा समूह का भी पितामह. अलबत्ता, जमशेतजी का यह तरीका दो साल के भीतर ही, वाक़ई ख़तरनाक साबित हुआ. पैसे बचाने के लिए वे इंग्लैंड से सस्ती मशीनें ले आए थे. इससे सूत की कताई और बनकर निकला उत्पाद दोनों खराब हो रहे थे. और तभी एक मशीन दग़ा दे गई. उससे निकली चिंगारी ने कारख़ाने को ख़ाक कर दिया. सब तबाह-ओ-बर्बाद हो गया. लेकिन वह जमशेत ही क्या, जो ऐसे हादसे से हौसला हार जाए.

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ग़ौर फरमाएं… जमशेत नाम दो लब्ज़ों को मिलाकर बना है. पहला ‘जम’ जिसका एक मायना है, ‘कुल, खानदान’. और दूसरा ‘शेत’, जिसका मतलब हुआ ‘यश, कीर्ति या प्रकाश’. इस तरह ‘जमशेत’ यानी ‘कुल की कीर्ति’, ‘कुल का प्रकाश’, जो सच में वह थे ही. उस कारखानाई प्रयोग में जमशेतजी के साथ एक तकनीकी विशेषज्ञ होते थे जेम्स ब्रूक्सबी. वे उस हादसे के कुछ समय बाद ही अमेरिका गए थे. वहां उन्होंने देखा कि कपड़े की मिलों में ‘रिंग फ्रेम’ के ज़रिए सूत काता जा रहा है. यह तकनीक तो अभी ब्रिटेन के लंकाशायर में भी इस्तेमाल नहीं होती थी, जहां दुनिया की सबसे ज़्यादाद कपड़ा मिलें थीं. बड़ी बात थी. सो, तुरंत उन्होंने तार के ज़रिए जमशेतजी को सूचना, संदेश भिजवाया. उन्होंने भी तुरंत ज़वाव लिखा, ‘रिंग फ्रेम भिजवाइए. कारखाने में इस्तेमाल करेंगे.’

इसके बाद ब्रूक्सबी ने जमशेतजी के कहे मुताबिक अमेरिका से सूत कातने वाले रिंग फ्रेम नागपुर भिजवाए. यहां जमशेतजी ने अपने कामग़ारों की मदद से उनकी आज़ामाईश की, जो कामयाब रही. जमशेतजी की ‘सेंट्रल इंडिया स्पिनिंग, वीविंग एंड मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी’ के इस कारखाने के मशीनी चरखे फिर घूमने लगे. कंपनी का मुनाफ़ा चंद महीनों में ही 16 फ़ीसद तक बढ़ गया. इस वक्त 1876 का साल गुज़र रहा था. फिर तारीख़ आई एक जनवरी 1877 की. हिंदुस्तानी ब्रितानिया हुक़ूमत की मुखिया उस रोज ‘महारानी’ विक्टोरिया तय पाई गईं थीं. इधर, जमशेतजी जी तब तक 38 बरस (तीन मार्च 1839 को जन्म) के हो चले थे. मुक़म्मल कारोबारी तो वे हो ही चुके थे. जान चुके थे कि कारोबार की तरक्की के लिए सरकार को ख़ुश रखना ज़रूरी है.

लिहाज़ा नागपुर के कारख़ाने का नाम बदल दिया गया. अब यह पहचाना गया, ‘एम्प्रेस मिल’ के नाम से. इस तरह हिंदुस्तान के पहले सफल औद्योगिक प्रयोग की नींव रखी जा चुकी थी. हालांकि इसकी गंध जमशेतजी ने क़रीब 10 साल पहले सूंघ ली थी. पारसी पुरोहितों के घराने में पिता नुशेरवांजी पहले शख़्स थे, जिन्होंने परंपरागत पुरोहिताई का काम बीच में ही छोड़ दिया था. नवसारी, गुजरात से बंबई जा बसे थे और वहां विदेश में सामान भेजने और वहां से दूसरा बुलवाने (आयात-निर्यात) का कारोबार शुरू किया था. इक़लौते बेटे जमशेतजी को उन्होंने जब हिसाब-किताब में पक्का पाया तो उसे भी बंबई बुला भेजा. वहीं एलफिंस्टन कॉलेज से ऊंची तालीम दिलवाई और अपने साथ कारोबार में लगा लिया. जमशेतजी को भी कारोबार सुहाता था, सो वे भी लग लिए.

यही कोई 20-21 साल की उम्र रही होगी तब जमशेतजी की. देश में अभी कुछ वक्त पहले ही अंग्रेजों ने 1857 के विद्रोहियों को बुरी तरह कुचला था. इससे तमाम मुल्क में निराशा चरम पर थी. लेकिन जमशेतजी की उम्मीद और हौसला उतना ही ठांठें मार रहा था. उन्हें लगता था कि वे अगर कारोबार में क़ामयाब हुए तो यह क़ामयाबी हिंदुस्तान का मुस्तकबिल बदलने वाली साबित हो सकती है. लिहाज़ा खूब मेहनत की. पिता का कारोबार दूसरे मुल्कों में फैलाया और ख़ुद भी काम-कारोबार सीखने चीन, जापान, इंग्लैंड जैसे तमाम मुल्कों में गए. इस तरह 1858 में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद क़रीब 10 साल गुज़र गए. साल 1868 का आ गया. अब तक वे कपास और सूत के कारोबार से मुनाफ़ा कमाया जा सकता है, यह चीन से समझकर आ चुके थे.इंग्लैंड से यह भी देख आए थे कि सूत से कपड़े कैसे बनते हैं. इसके बाद अपनी इस समझ की आज़माइश करने का मंसूबा बांधा. बंबई में डिफाल्टटर तेल कारखाने को उन्होंने सस्ते दामों में ख़रीद लिया. चिंचपोकली में था वह. उसे उन्होंने कपास के कारखाने में तब्दील किया और नाम दिया ‘एलेक्जेंड्रा मिल’. यह बात है 1869 की. महज दो साल के भीतर यह कारखाना मुनाफ़ा उगलने लगा. आजमाइश सफल रही. लेकिन जमशेतजी को इससे बड़ा कुछ करना था. लिहाज़ा वह कारख़ाना उन्होंने लागत से ऊपर मुनाफ़ा लेकर बेच दिया. इसके बाद रुख़ किया नागपुर का. लोगों को उनका ये क़दम ज़ोख़िम भरा लगा. क्योंकि हर तरह के कारखाने के लिए तब बंबई जैसे महानगरों को ही कारोबारी सबसे अव्वल चुना करते थे. लेकिन जमशेतजी ने चुना नागपुर.

क्यों? इसलिए कि नागपुर के इलाके में कपास की खेती अधिक थी. पानी भरपूर था. ज़मीन, कामग़ार सस्ते थे. रेल थी और ईंधन का इंतज़ाम भी पर्याप्त. कारोबार को फलने-फूलने के लिए इससे ज़्यादा क्या चाहिए, भला. हालांकि ये बात दीगर है कि फिरंगी कारोबारी इस हिसाब-किताब को समझ नहीं सके थे, तब तक. पर, उन्हें हिंदुस्तान से मतलब ही कितना था, जो समझते. लेकिन मां जीवनबाई की कोख़ से जन्मे जमशेतजी तो हिंदुस्तानी उद्योग को ही जन्म और जीवन देने वाले थे. यही वज़ह कि वे इसके लिए ज़रूरी हिसाब-किताब को न सिर्फ जल्दी समझे बल्कि उसे ठीक तरह से, सही वक़्त पर बिठाकर इतिहास में अपना नाम भी दर्ज़ करा गए.
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अगली कड़ी में पढ़िए 

* दास्तान-गो : जमशेतजी, जिन्होंने तीन ख़्वाब उतारे, एक ‘ताज़’ तामीर किया

Tags: Hindi news, News18 Hindi Originals, Tata

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