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दास्तान-गो : गुंचे लगे हैं कहने, फूलों से भी सुना है तराना… शैलेंद्र सिंह का

4 अक्‍टूबर को मशहूर गायक शैलेंद्र का जन्‍मदिन है. (न्‍यूज 18 हिन्‍दी ग्राफिक्‍स)

4 अक्‍टूबर को मशहूर गायक शैलेंद्र का जन्‍मदिन है. (न्‍यूज 18 हिन्‍दी ग्राफिक्‍स)

Daastaan-Go ; Playback Singer Shailendra Singh Birth Anniversary : पार्टी में फिल्मी दुनिया के तमाम लोग आए हुए थे. ऋषि, ...अधिक पढ़ें

दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…

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जनाब, आंधी की तरह आना और तूफ़ान की तरह चले जाना. ये कहावत तो तमाम लोगों ने सुनी होगी. मतलब भी सब को पता ही होगा. लेकिन क्या कभी कोई किसी ऐसी मिसाल वे वाबस्ता हुआ है, जिस पर यह कहावत लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ सटीक बैठती हो? कोई बात नहीं. अगर वाबस्ता नहीं भी हुए हैं तो इधर हिन्दी फिल्मों की दुनिया में एक इसी तरह की मिसाल हैं, गुलूकार यानी गायक शैलेंद्र सिंह. उनका आज की ही तारीख़ में, यानी 4 अक्टूबर को जन्मदिन होता है. उनका नाम याद आते ही गाना याद आता है, ‘मैं शा’इर तो नहीं, मगर ऐ हसीं, जब से देखा, मैंने तुझको, मुझको शा’इरी आ गई’. या ‘हम तुम एक कमरे बंद हों और चाबी खो जाए’. या ‘होगा तुमसे प्यारा कौन हमको तो तुमसे है, ऐ कांची… प्यार’. या ‘हमने तुमको देखा, तुमने हमको देखा, ऐसे’. या ‘गुंचे लगे हैं कहने, फूलों से भी सुना है तराना प्यार का’. या फिर इसे थोड़ा बदलें तो- तराना शैलेंद्र सिंह का ही.

जी हां जनाब, क्योंकि इस तरह के तमाम नग़्मे हैं, जो शैलेंद्र साहब का नाम ज़ेहन में आते ही कानों में गूंजते हैं. ऐसे, जिन्हें उन्होंने अपनी बलंदियों के दिनों में गाकर अमर कर दिया. और उनका यह दौर भी कब रहा? जब मोहम्मद रफ़ी साहब, किशोर कुमार साहब, मन्ना डे साहब, मुकेश साहब, महेंद्र कपूर साहब, जैसे नामचीन गायक फिल्मों में शबाब पर होते थे. बाद के दौर में भी तलत अज़ीज़, मोहम्मद अज़ीज़, नितिन मुकेश, कुमार सानू, उदित नारायण, जैसे गायक आए. ख़ूब बलंदी हासिल की. लेकिन शैलेंद्र सिंह की अलहदा आवाज़ अपनी जगह क़ायम रही. साल 1993 तक. उस साल एक फिल्म आई ‘गुरुदेव’. उसमें श्रीदेवी के साथ ऋषि कपूर ही गाते हुए नज़र आए, ‘जयपुर से निकली गाड़ी दिल्ली चले हल्ले हल्ले’. यह आवाज़ शैलेंद्र साहब की ही थी क्योंकि ‘बॉबी’ के दिनों से फिल्मी गानों में ज़्यादातर वही ऋषि साहब की आवाज़ बने हुए थे अब तक.

ऐसे में सवाल हो सकता है, अचानक ऐसा क्या हुआ कि शैलेंद्र साहब का अच्छा-ख़ासा चलता करियर थम गया? जबकि ‘गुरुदेव’ फिल्म के रिलीज़ होने तक न तो उनकी आवाज़ में कोई ख़राश थी, न ही सेहत पर कोई ख़ास असर. उम्र भी तब 41 साल (1952 में पैदाइश) ही थी उनकी. कोई ज़्यादा नहीं. वे 10-15 साल और उसी तरह गा सकते थे अभी. फिर भी उनकी गाड़ी अटक गई, तो क्यों? इसका जवाब ख़ुद शैलेंद्र साहब ने ही अपने कई इंटरव्यू के दौरान दिया है. या यूं कहें कि कुछ अंदाज़ लगाया है. क्योंकि सही-सही ज़वाब का तो उन्हें भी पता नहीं था कि आख़िर क्या हुआ, जो फिल्म बनाने वालों, मूसीक़ारों ने उनसे गाने गवाने बंद कर दिए? ख़ैर. तो शैलेंद्र साहब के मुताबिक, ‘साल 1994 की बात है. उस वक़्त तक मुझे डायबिटीज़ ने जकड़ लिया था. तभी एक रोज़ मेरा शुगर लेवल ज़्यादा बढ़ गया. इससे मुझे क़रीब एक हफ़्ते अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा.’

‘…उसी दौर में किसी ने पहले तो यह अफ़वाह उड़ाई कि मेरा इंतिक़ाल हो गया है. फिर बाद में जब सच सामने आया कि नहीं, मैं तो ठीक हूं एकदम, तो फिर यह कहा जाने लगा कि अब मैं गा नहीं सकता. मेरा गला ख़राब हो चुका है. हालांकि यह भी ग़लत था, लेकिन मैं किस-किस को बताने जाता. तो इस तरह लोगों ने गाने देने बंद कर दिए और मेरी गायकी का सिलसिला ठहर गया. ये अफ़वाह किसने और क्यों उड़ाई, यह मैं आज तक नहीं जानता’. वैसे जनाब, ‘गुरुदेव’ के बाद भी शैलेंद्र साहब ने साल 2008 की भोजपुरी फिल्म ‘भोले शंकर’ के लिए गाया था. उसमें गाना है, ‘जय हो छठी मइया’, जिसमें मिथुन चक्रवर्ती के लिए शैलेंद्र साहब ने आवाज़ दी थी. तो उनका आख़िरी गाना यही हुआ. फिर बाद में टेलीविज़न पर आने वाले कुछ धारावाहिकों में नज़र आए. जैसे- ‘रिश्ते- द लव स्टोरीज़’, ‘रात होने को है’ और ‘कसम से’ क्योंकि वे गायक के साथ अदाकार भी रहे हैं.

हालांकि धारावाहिकों का यह सिलसिला भी 2009 में थम गया. मगर, जैसा कि शुरू में कहा, इनके सिलसिले की शुरुआत किसी आंधी की तरह ही हुई थी. वाक़ि’आ 1972 के आस-पास का है. तब हिन्दी फिल्मों की दुनिया के मशहूर शो-मैन राज कपूर अपने बेटे ऋषि कपूर को बतौर अदाकार लॉन्च कर रहे थे. उन्हें लेकर ‘बॉबी’ फिल्म बना रहे थे राज साहब. उसमें उन्होंने सभी चीज़ें तर-ओ-ताज़ा लाने का मंसूबा बांधा था. उसी के मुताबिक, ऋषि कपूर साहब के साथ काम करने वालीं अदाकारा भी एक-दम नई, डिंपल कपाड़िया जी. सो, ऋषि साहब के लिए राज कपूर साहब गायक की आवाज़ भी नई ही ढूंढ रहे थे. आगे का क़िस्सा शैलेंद्र साहब की ज़ुबानी, ‘मैं तब पूना के फिल्म एवं टेलीविज़न इंस्टीट्यूट में अदाकारी सीख रहा था. दो साल का कोर्स था. उसका दूसरा साल था. बॉम्बे में कॉलेज की पढ़ाई (बीए-थर्ड इयर) बीच में ही छोड़कर मैं इस संस्थान में आ गया था’.

‘उधर, मुंबई में मेरे वालिद साहब (जोगेंदर सिंह जी) के अच्छे दोस्त होते थे वीपी साठे. वे ख़्वाजा अहमद अब्बास के साथ फिल्मों की कहानियां लिखा करते थे. मेरे वालिद भी फिल्मों में ही काम किया करते थे. वे फिल्मकार व्ही शांताराम के चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर हुआ करते थे. फिर वे राजश्री प्रोडक्शन में पब्लिशिटी ऑफिसर भी रहे. इसी नाते उनकी साठे साहब से अच्छी दोस्ती रही. तो साठे साहब ने उन्हें बताया कि राज कपूर साहब ‘बॉबी’ (1973 की फिल्म) के लिए नई आवाज़ तलाश रहे हैं. मैं तब यूं ही शौक़िया गाया करता था, ज़्यादातर ग़ज़लें. लेकिन यह कभी नहीं सोचा था कि गायक बनूंगा. गाने का शौक़ मुझे बचपन से था, वैसे. गाना सीखता भी था. यह बात साठे साहब को पता थी. तो उन्होंने मेरे पिता जी से कहा- तुम शैलेंद्र को पूना से बंबई बुलवा लो. मैं उसे राज कपूर साहब के पास लेकर जाता हूं. क्या पता शायद उन्हें उसकी आवाज़ पसंद आ जाए’.

‘मेरे पिता जी ने साठे साहब की बात मानकर मुझे बंबई बुलवा लिया. इसके बाद साठे साहब मुझे राज कपूर साहब के पास लेकर गए. वहां उन्होंने मुझसे कुछ गाने सुने तो उन्हें मेरी आवाज़ अच्छी लगी. इसके बाद उन्होंने मुझसे मेरा नाम पूछा तो मैंने बताया- सर, शैलेंद्र सिंह नाम है मेरा. सुनकर बड़े ख़ुश हुए वे. कहने लगे- अरे वाह, वाह, तुमने मुझे मेरे दोस्त (गीतकार शैलेंद्र) की याद दिला दी. फिर वहां से राज कपूर साहब मुझे ‘बॉबी’ के संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी से मिलवाने उनके घर ले गए. उन्होंने भी मेरे गाने सुने. अपनी ऑर्केस्ट्रा के चार-पांच अन्य साथियों के साथ मुझसे वह गाना भी गवाया- मैं शा’इर तो नहीं. उनकी ऑर्केस्ट्रा में उस वक़्त राजेश रोशन (मशहूर संगीतकार) कोंगो बजाया करते थे. वह भी थे उस वक़्त. तो, ये सब हुआ. इसके बाद मुझसे कहा गया कि चार-पांच दिन बाद बताते हैं कि तुमसे गाना गवाना है या नहीं. मैंने कहा- ठीक है’.

‘इसके बाद ठीक चार-पांच दिनों के अंतराल में मेरे घर फोन आया. मुझे बताया गया कि तुम्हें चुन लिया गया है, तुरंत स्टूडियो आ जाओ. मैं गया तो वहां मुझे गाना दिया गया. कहा गया कि रिहर्सल कर लो, अगले दो-तीन दिनों में रिकॉर्डिंग करेंगे. इस तरह, मेरा पहला गाना, पहली फिल्म मुझे मिली. बिना किसी ज़्यादा संघर्ष के ही. इसके लिए मैं हमेशा साठे साहब और राज कपूर साहब का ऋणी रहूंगा. क्योंकि इससे आगे भी जिस तरह मेरी राह आसान हुई, वह भी कम दिलचस्प नहीं है’. उससे जुड़े वाक़ि’अे भी शैलेंद्र साहब बताते हैं, ‘राज कपूर साहब हमेशा गानों से ही अपनी फिल्मों का मुहूर्त किया करते थे. इसके बाद शानदार पार्टी हुआ करती थी. ‘बॉबी’ के समय भी यही हुआ. ‘मैं शा’इर तो नहीं’ गाने से फिल्म का मुहूर्त हुआ. इसके बाद पार्टी हुई. उसमें ऋषि कपूर, डिंपल कपाड़िया और मेरा, लोगों से उन्होंने त’आरुफ़ कराया गया. उस दौरान बड़ा मज़ेदार वाक़ि’आ घटा’.

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शैलेंद्र ने कई लोकप्रिय गीतों को अपना स्‍वर दिया है. (न्‍यूज 18 हिन्‍दी ग्राफिक्‍स)

‘पार्टी में फिल्मी दुनिया के तमाम लोग आए हुए थे. ऋषि, डिंपल और मैं, मंच पर राज कपूर साहब के साथ नुमूदार थे. पहले ऋषि का त’आरुफ़ कराया गया. फिर डिंपल का चल ही रहा था कि सामने से एक आवाज़ बलंद हुई- इंट्रोड्यूस द सिंगर, इंट्रोड्यूस द सिंगर. सबकी नज़र उस तरफ़ उठी तो पता चला कि वह आरडी बर्मन (पंचम) थे. इस तरह, वहीं मेरी पंचम से मुलाक़ात हुई, जो आगे दोस्ती में बदल गई. जल्द ही उन्होंने भी मुझे अपनी फिल्मों में गाना दिया. उनके साथ पहला गाना था- ‘खेल-खेल में’ पिक्चर के लिए ‘हमने तुमको देखा, तुमने हमको देखा ऐसे’. यह गाना भी ऋषि कपूर के लिए ही गाया था. तो इस तरह पंचम के साथ भी मेरी शुरुआत जल्द ही हो गई. वह, जिनकी फिल्मों में गाने के लिए लोग तरसा करते थे. यही नहीं, मोहम्मद रफ़ी साहब के साथ भी शुरुआत आसानी से हो गई मेरी. रफ़ी साहब, जो मेरे जैसे न जाने कितने गायकों के आदर्श थे’.

‘बात ‘बॉबी’ के गानों की रिकॉर्डिंग के वक़्त की ही है. मनमोहन देसाई साहब उसी समय  राज कपूर के बड़े साहबज़ादे रणधीर को लेकर ‘चाचा-भतीजा’ फिल्म बना रहे थे. उन्होंने रणधीर कपूर के लिए मेरी आवाज़ लेने का मन बनाया. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी से कहा, पर वे तैयार नहीं हुए. तब उन्होंने राज कपूर साहब से इसरार किया. उन्होंने भी तब ही मेरी आवाज़ इस्तेमाल करने की देसाई साहब को इजाज़त दी जब उन्होंने भरोसा दिया कि ‘बॉबी’ के रिलीज़ होने के बाद ही वे ‘चाचा-भतीजा’ का गीत-संगीत सार्वजनिक होने देंगे. इस तरह ‘बॉबी’ के साथ-साथ ही लगभग ‘चाचा-भतीजा’ के लिए भी मेरे गानों की रिकॉर्डिंग हुई. उसमें मुझे रफ़ी साहब के साथ गाने का मौका मिला- बुरे काम का बुरा नतीज़ा, क्यूं भाई चाचा… फिर रफ़ी साहब कहते.. हां भतीजा. इस तरह बहुत आसानी से मुझे सब मिलता गया. बिना किसी संघर्ष के. हालांकि करियर के आख़िरी दौर में ज़रूर संघर्ष करना पड़ा. अब कोई पहले संघर्ष कर ले, या बाद में.’ ये शैलेंद्र साहब ने 1993 से बाद का इशारा किया है.

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तो जनाब, यूं रहा शैलेंद्र साहब की गायकी का सफ़र. आंधी, तूफ़ान की तरह. ऐसे सफ़र के बाद किसी के मन में क्यूं ही अफ़सोस बच रहेगा कोई. सो, शैलेंद्र साहब के मन में नहीं है. सिवाय दो चीज़ों के. उन्हीं से जानते हैं, ‘मुझे बस, ये अफ़सोस रहा कि मैं पंजाबी परिवार से होने के बावजूद रफ़ी साहब से इस ज़बान में बात नहीं कर पाया. क्योंकि मुझे पंजाबी नहीं आती थी. मैंने सीखने की कोशिश भी की पर बात बनी नहीं. जबकि रफ़ी साहब हमेशा पंजाबी में ही बात किया करते थे. दूसरा इस बात कर मलाल रहा कि किशोर-दा की ज़िंदगी में कभी उनके घर खंडवा नहीं जा सका. किशोर-दा हमेशा यह ख़्वाहिश जताते रहे कि वे, मैं और अमित (किशोर कुमार के बेटे) एक साथ खंडवा जाकर वहां कार्यक्रम करें. मेरा खंडवा जाना हुआ भी, अमित के साथ. लेकिन तब जबकि किशोर-दा इस दुनिया में नहीं रहे. बस, यही मलाल रहे मन में’. अब कुछ न कुछ तो रह ही जाता है, जनाब.

Tags: Birth anniversary, Hindi news, News18 Hindi Originals

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