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दास्तान-गो : आरडी बर्मन यानी संगीत के ज्ञान से विज्ञान खींच लाने वाले संगीत-विज्ञानी

आज संगीतकार आरडी बर्मन की जयंती है.

आज संगीतकार आरडी बर्मन की जयंती है.

Daastaan-Go : RD Burman Birth Anniversary Special : महाभारत के अभिमन्यु की तरह ही राहुल देब ने कोख में नौ महीने पूरे करते-करते ही गीत-संगीत के चारों कोनों को ठीक से जान लिया. समझ लिया कि इस ‘चक्रव्यूह’ कैसे घुसना है और निकलना तो इससे था ही नहीं. सो, उस बारे में सीखने-समझने की ज़रूरत न थी.

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज… 

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किसी विषय की जानकारी होना एक बात है जनाब. मसलन- दुनिया में बड़ी तादाद में लोग जानते हैं कि गणित की गिनती एक से शुरू हुआ करती है. ये 10 पर जाकर पूरी हो जाती है. लेकिन जिन्हें थोड़ा इल्म यानी ज्ञान होता है, वे यह समझने लगते हैं कि गिनती की शुरुआत अस्ल में एक से नहीं, ज़ीरो यानी शून्य से हुआ करती है. ये गिनती नौ पर जाकर पूरी होती है. ज्ञान थोड़ा और बढ़ता है तो ये भी पता चलने लगता है कि ज़ीरो से लेकर नौ तक पूरी दहाई में और भी बहुत कुछ हुआ करता है. जैसे- चौथाई, आधा, पौना, सवा, डेढ़, पौने दो वग़ैरा. जानकारी और ज्ञान का ये बुनियादी पेंच तमाम मुख़्तलिफ़ मज़मूनों (विभिन्न विषयों) में ऐसा ही हुआ करता है.

ज़्यादातर लोग बुनियादी जानकारियों के बीच ही अटके रहा करते हैं क्योंकि रोज़ी-रोटी, कपड़ा-मकान, दिखावा-आलीशान का बंदोबस्त इतने से, बड़े अराम से हो जाता है. लेकिन कुछ चंद होते हैं, जिन्हें इल्म की भूख होती है. तो वे उसे उसकी बारिकियों के साथ हासिल करते हैं. और इनमें भी बहुत चुनिंदा साइंस-दानों (वैज्ञानिकों) की तरह पेश आया करते हैं. वे मोटे तौर पर दिखाई, सुनाई न देने वाली तमाम बारीकियों पर तज़रबे (प्रयोग) करते हैं. आज़माइश करते हैं. ये पुख़्ता करते हैं कि देखिए चीज़ें इस तरह भी हुआ करती हैं. और ये कैसी ख़ूबसूरती से हमारे बीच जगह पाती हैं. हिन्दुस्तान की फिल्म-मूसीक़ी (संगीत) में राहुल देब बर्मन, ऐसे साइंस-दान हुए.

दुनिया जानती है कि राहुल देब यानी कि आरडी बर्मन को मूसीक़ी की बुनियादी जानकारी तो उसी वक़्त हो चुकी थी, जब उन्होंने अपनी मां मीरा देब की कोख में सांसें लेना शुरू कीं. वालिद सचिन देब बर्मन बहुत बड़े मूसीक़ार (संगीतकार) हुआ करते थे और मां भी ठहरी नग़्मा-निगार (गीतकार). सो, महाभारत के अभिमन्यु की तरह ही राहुल देब ने कोख में नौ महीने पूरे करते-करते ही गीत-संगीत के चारों कोनों को ठीक से जान लिया. समझ लिया कि इस ‘चक्रव्यूह’ कैसे घुसना है और निकलना तो इससे था ही नहीं. सो, उस बारे में सीखने-समझने की ज़रूरत न थी. लिहाज़ा, बुनियादी जानकारी के साथ जब राहुल देब ने 27 जून 1939 को पैदाइश पाई तो बताते हैं, पहली मर्तबा जनाब रोए भी तो ‘पंचम सुर’ (प) में. सो, वहीं से नाम पड़ गया ‘पंचम’.

सोचिए ज़रा, अपने पसंदीदा मज़मून की बुनियादी जानकारियों के साथ अगर कोई पैदा ही हो तो उसे उसके इल्म की बारीकियां सीखने समझने में कितना वक़्त लगेगा? राहुल देब को भी ज़्यादा वक़्त न लगा. महज़ 15-16 बरस में ही मज़मून से जुड़े इल्म की बारीकियों से भी वाबस्ता हो गए वे. ज़रिया बने इसका, अली अकबर खां (सरोद-नवाज़) और समता प्रसाद (तबला-नवाज़) जैसे उस्ताद. साथ ही वालिद सचिन देब के अलावा सलिल चौधरी जैसे बड़े नामी फिल्म-मूसीक़ार. राहुल देब चाहते तो यहां ठहर सकते थे. क्योंकि काम चलाने से भी बहुत आगे का मक़ाम उन्होंने हासिल कर लिया था. इसके ज़रिए दुनियावी दस्तूर के मुताबिक कमाने-खाने, ऐश-ओ-आराम का बंदोस्त बहुत आसानी से हो सकता था. लेकिन नहीं, उन्हें तो अलहदा क़तार में खड़ा होना था.

उनके वालिद अगर ‘स’ (संगीत का पहला सुर, जिससे सचिन देब का नाम शुरू होता है) हुए तो राहुल देब ठहरे ‘प’ यानी ‘पंचम’, जिसकी अपनी अलग पहचान हुआ करती है. लिहाज़ा, उन्होंने भी अपनी पहचान गढ़ने के लिए रास्ता चुना साइंस का. अब तक इल्म की जितनी भी बारीकियों से वे वाक़िफ़ हुए थे, जिनसे होते जाते थे या आगे होने वाले थे, उन सभी पर उन्होंने तज़रबे करने शुरू कर दिए. आज़माइश करनी शुरू कर दीं और इस सिलसिले से ऐसे-ऐसे नतीज़े हासिल किए कि आज तक दुनिया बस, सोचती ही रह जाती है कि अरे, यूं मुमकिन है क्या! यही वज़ा रही कि उन्हें उनके साथी मूसीक़ार केरसी लॉर्ड ने एक मर्तबा ‘संगीत-विज्ञानी’ कह दिया था.

संगीत विज्ञानी, जो ज्ञान से विज्ञान खींच लाए. मिसालें देखिए. जब पंचम अपने वालिद के साथ फिल्मों की मूसीक़ी के तज़रबे ले रहे थे तभी उन्होंने पहली मर्तबा एक फिल्मी नग़्मे का संगीत रचा, ‘ऐ मेरी टोपी पलट के आ’. उसमें उन्होंने एक तज़रबा कर डाला- लाला जी का ‘मोटा पेट बजाने’ का. ये अलग क़िस्म की आवाज़ थी. तोंद बजाने की आवाज़ से मिलती हुई. उनके वालिद को पसंद आया ये काम और उन्होंने 1956 की फिल्म ‘फंटूस’ में इस गाने को जगह दी. इसी तरह लड़कपन में ही पंचम ने 1957 की ‘प्यासा’ फिल्म के एक नग़्मे की धुन बनाई, ‘सर जो तेरा चकराए, या दिल डूबा जाए.’ इस नग़्मे की धुन ने बहुतों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा.

इस नग़्मे में एक जगह चंपी वाले की अंगुलियों की थपड़ी की आवाज़ सुनाई देती है. कभी नग़्मा सुनें तो ग़ौर कीजिएगा इस पर. अस्ल-सी महसूस होगी. बताते हैं, जनाब ने अस्ल में ही किसी के सिर पर थपड़ियां बजवाकर रिकॉर्ड किया था इस आवाज़ को. इस तरह वालिद के साथ तज़रबे लेने के दौरान ख़ुद की आज़माइशों की शुरुआत हो चुकी थी. सचिन देब लगातार पंचम को इस तरह के मौके भी देने लगे थे. हालांकि पंचम को अपने तईं कुछ करने का मौका मिला 1960-61 में. उस रोज़ मशहूर अदाकार महमूद उनके घर आए थे. वे फिल्म बना रहे थे. चाहते थे कि सचिन देब उसमें मूसीक़ी करें. लेकिन उन्होंने मसरूफ़ियत (व्यस्तता) के हवाले से मना कर दिया.

तभी महमूद की नज़र घर में तबले की रियाज़ कर रहे पंचम पर पड़ी. उन्होंने सचिन-दा से पूछा, ‘आप अगर वक़्त नहीं दे पा रहे हैं तो पंचम को ले लूं? अगर आपकी इजाज़त हो तो?’ राजी हो गए सचिन-दा. इस तरह पंचम की मूसीक़ी से सजी पहली फिल्म आई 1961 में ‘छोटे नवाब’. इसके एक नग़्मे का ख़ास ज़िक्र किया जा सकता है, ‘आम छुम, ताम छुम, ता ला ला बादाम छुम.’ इसमें ये जो ‘ता, ला, ला’ है न. ये बच्चों की तोतली ज़बान है. नग़्मा छोटे-छोटे बच्चे गा रहे हैं, जिनकी ज़बान इस उम्र में ऐसी ही होती है. मतलब ये कि आवाज़ों को लेकर इतनी बारीक़ी तक पहुंच चुके थे पंचम अब तक, छोटी उम्र में ही. इस दौरान 22 बरस के ही तो थे वे.

फिर जैसे-जैसे वे बड़े होते गए ये बारीक़ियत बड़ी होती गई. या यूं कह लें कि बारीक़ से बारीक़ चीजें उन्हें बड़ी होकर दिखाई, सुनाई देने लगीं. इन पर वे तज़रबे और आज़माइश करने लगे. लोगों को बड़ा कर के दिखाने और सुनाने लगे. मसलन- महमूद की फिल्म ‘भूत बंगला’ (1965). इसमें एक नग़्मा है, ‘प्यार करता जा, दिल कहता है.’ इसकी शुरुआत में ही वादियों से आने वाली आवाज़ की गूंज को महसूस कीजिए. एक शख़्स की आवाज़ अलग-अलग तरफ़ से आती सुनाई देगी. और पंचम ने सच में ऐसा किया भी था. कहते हैं, स्टूडियो में उन्होंने अलग-अलग कोनों पर चार-पांच गुलू-कारों (गायकों) को रख छोड़ा था, जो ज़रूरी जगह पर गूंज का असर दे रहे थे.

उनकी कुछ आज़माइशों, तज़रबों का तो बार-बार ज़िक्र होता है. मसलन- ‘शोले’ (1975) के नग़्मे ‘महबूबा महबूबा’ में खाली बोतल से फूंक मारकर आवाज़ निकालना. जैसे बच्चे घर के भीतर या गली, नुक्कड़ों पर अक्सर निकाला करते हैं. ऐसे ही, सुबह घरों में बड़े-बुज़ुर्ग जैसे ग़रारा करते हैं, गला साफ़ कराने को. वैसे ही गुलू-कार एनेट पिंटो से ग़रारे करवा लेना. उसे ‘सत्ते-पे-सत्ता’ (1982) फिल्म की मूसीक़ी में इस्तेमाल कर लेना. रेगमाल (सैंड पेपर) को घिसकर चलती ट्रेन की छुक-छुक की आवाज़ निकालकर उसे संगीत (होगा तुमसे प्यारा कौन, फिल्म- ‘जमाने को दिखाना है’, 1981) का हिस्सा बना लेना. या फिर कंघी को एक ख़ास तरह के लोहे के खोखले पाइप पर घिसने की आवाज़ से लय (मेरे सामने वाली खिड़की, फिल्म- ‘पड़ोसन’, 1968) ले लेना.

साल 1972 की ‘अपना देश’ का नग़्मा ‘दुनिया में लोगों को धोखा कभी हो जाता है’. बिल्कुल अनोखा बन पड़ता है ये, जब बीच-बीच में सांसों की आवाज़ एक लय में इस्तेमाल की हुई सुनाई देती है. और 1984 की ‘मंज़िल-मंज़िल’ का गीत ‘ये नैना याद है’, जिसमें आशा भोसले (पंचम-दा की पत्नी) के हंसने की आवाज़ ही मूसीक़ी में ख़ूबसूरत मोड़ देती है. साल 1977 की फिल्म ‘डार्लिंग, डार्लिंग’ का नग़्मा ‘एक मुलाकात, एक रात की बात, रात गई, बात गई.’ कहते हैं, इसमें पंचम ने अपनी ऑर्केस्ट्रा के साथी मारुति राव की पीठ पर थपकियां दिलवाकर उस आवाज़ को संगीत का हिस्सा बनाया. बारिश के मौसम में घंटों खिड़की पर बैठे रहना और बूंदों, बादलों की आवाज़ें रिकॉर्ड करना. फिर उन्हें अपनी मूसीक़ी का हिस्सा बनाना. ऐसे शग़ल भी हुए उनके.

गिटार, सैक्सोफोन जैसे पश्चिमी साजों की आवाज़ें हिन्दुस्तानी साज़- सितार और बांसुरी के साथ मिला देना. भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ पश्चिम के साज़ों का इस्तेमाल (रैना बीती जाए, फिल्म- ‘अमर प्रेम’, 1977) कर लेना. पक्षियों की आवाज़ को जस का तस संगीत में उतार लेना (एक मैं और एक तू, फिल्म- ‘खेल-खेल में’, 1975). यहां तक कि अपनी आवाज़, जिसे वे बहुत सुरीला न कहते थे, उसे भी सुरों में ख़ूबसूरती (पिया तू अब तो आजा, फिल्म- ‘कारवां’, 1971) से पिरो देना. ऐसा इतना कुछ कर गए आरडी बर्मन कि कोई उनके नज़दीक भी न पहुंच सका, आगे निकलने की बात तो दूर. और फिर चार जनवरी 1994 को सात सुरों के बीच ही जा समाए, ‘पंचम’ की तरह.

Tags: Birth anniversary, Daastaan Go, Hindi news, News18 Hindi Originals

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