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daastaan go story of tomato when it considered as poisonous apple

दास्तान-गो : टम टमाटर टम, टमाटर खाएं हम…, जो कभी ‘ज़हरीला सेब’ भी कहलाता था!

टमाटर की कहानी में 28 जून की तारीख़ बड़ी अहमियत रखती है.

टमाटर की कहानी में 28 जून की तारीख़ बड़ी अहमियत रखती है.

Daastaan-Go ; Story of Tomato : सामने आया कि यूरोप के रईसों के घरों में कांसे या गन-मैटल (वह धातु जिससे तोपें, बंदूकें आदि बनती हैं) से बने बर्तन खाने-पीने में इस्तेमाल किए जा रहे थे. टमाटर में मौज़ूद ‘टोमैटाइन’ या एसिड का इस धातु के साथ घाल-मेल ख़तरनाक साबित हो रहा था. इससे लोग बीमार पड़ जाते थे. और कभी-कभी उनकी मौत भी हो जाया करती थी.

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज… 

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स्कूल के दिनों की एक कविता याद है क्या जनाब? ‘टम टमाटर टम टमाटर खाएं हम, अंग्रेज के बच्चे क्या जानें अंग्रेजी जानें हम.’ इस कविता में अंग्रेज और अंग्रेजी से भी ज़्यादा अगर कुछ नज़र आता है, तो वो टमाटर. ये दुनियाभर की खान-पानी सफ़ाक़त (संस्कृति) में इस तरह घुल-मिल चुका है कि इसके बिना स्वाद पूरा नहीं होता. अधूरा सा लगता है. मसालेदार तड़का लगाना हो तो चाहिए टमाटर. सादा साग-सलाद खानी हो तो चाहिए टमाटर. आज दुनियाभर में इसकी अहमियत इतनी है कि अगर आन-ओ-शान में गुस्ताख़ी होने पर ये लाल-पीला हो जाए (कीमतें ज़्यादा-कम हों) तो मुल्कों की सरकारें हिल जाया करती हैं. मगर जनाब हमेशा से ये ऐसा न था. बल्कि सदियों पहले कुछेक बरस तो ऐसे भी आए, जब टमाटर को ‘ज़हरीला’ मान लिया गया था. लोग इसे ‘ज़हरीला सेब’ कहा करते थे. इसे अपने घरों में जगह देने से क़तराया करते थे.

ये बात है साल 1597 के आस-पास की. ब्रिटेन के प्रकृतिवादी सर्जन हुआ करते थे, जॉन गेरार्ड. एक किताब लिखी उन्होंने. उसे नाम दिया, ‘जनरल हिस्ट्री ऑफ प्लांट्स’. इसमें उन्होंने बताया कि टमाटर, जो उस वक़्त वहां ‘टोमैटल’ कहा जाता है, एक जहरीला फल है. बावज़ूद इसके कि उस वक़्त स्पेन, इटली, फ्रांस जैसे यूरोप के तमाम मुल्कों में टमाटर खान-पान में अच्छी तरह से इस्तेमाल किया जाने लगा था. लेकिन जॉन गेरार्ड ने जब इसे ‘ज़हरीला’ बताया तो उसके पीछे ख़ास तौर पर दो वज़ा बताईं गईं. पहली- टमाटर के बारे में कहा जाता है कि यह धतूरे के खानदान का फल है. और दूसरी- इसे खाने पर तब कई यूरोपीय रईस बीमार पड़ जाया करते थे. यहां तक कि कई बार तो उनकी मौत भी हो जाती थी. इससे टमाटर के बाबत उनके मन में शक तो पहले से ही था. सो, जैसे ही जॉन गेरार्ड की किताब लोगों के हाथ में पहुंची, शक को पुख़्तगी मिल गई.

जॉन गेरार्ड ने ये भी बताया था कि टमाटर में ‘टोमैटाइन’ नाम का एक रसायन होता है. यह सेहत के लिए ठीक नहीं है. उनकी बातें काफ़ी हद तक सही भी थीं. क्योंकि टमाटर में एसिड की मात्रा तो ज़्यादा होती ही है. लेकिन इससे यूरोप के रईसों को ही ख़ास तौर पर नुक़सान क्यों हो रहा था, ये बहुत बाद में पता चला. सामने आया कि यूरोप के रईसों के घरों में कांसे या गन-मैटल (वह धातु जिससे तोपें, बंदूकें आदि बनती हैं) से बने बर्तन खाने-पीने में इस्तेमाल किए जा रहे थे. टमाटर में मौज़ूद ‘टोमैटाइन’ या एसिड का इस धातु के साथ घाल-मेल ख़तरनाक साबित हो रहा था. इससे लोग बीमार पड़ जाते थे. और कभी-कभी उनकी मौत भी हो जाया करती थी. बहरहाल, जैसे ही गेरार्ड और उनके जैसे कुछ जानकारों की पुख़्तगी मिली टमाटर से यूरोप के लोग घबराने लगे. गोया कि ये कोई बम है, जो उनके मुंह या पेट में पहुंचते ही फटने वाला है.

और जनाब, टमाटर से जुड़ा ये डर ब्रिटेन, अमेरिका व दुनिया के कई मुल्कों में लंबे समय तक बना रहा. इन मुल्कों के लोग इसका इस्तेमाल बहुत कम और डरते-डरते किया करते थे. ख़ास तौर पर चटनी वग़ैरा बनाने में. इसे सीधे नहीं खाते थे. हालांकि इसके बावज़ूद इटली, फ्रांस, स्पेन जैसे मुल्कों में इसका इस्तेमाल खूब हो रहा था और टमाटर अन्य मुल्कों में अपने पांव पसारता जाता था. लेकिन डर बना हुआ था और वह करीब दो सदी तक बना रहा. आख़िर में ये डर ख़त्म हुआ 28 जून 1820 की तारीख़ पर जाकर. अमेरिका के सालेम शहर का वाक़्या है. वहां एक हुआ करते थे कर्नल रॉबर्ट गिब्बन जॉनसन. वे भी ठहरे प्रकृतिवादी. ब्रिटेन के जॉन गेरार्ड ने अगर टमाटर में पाई जाने वालीं कुछ नुक़सानदेह चीजों का पता लगाया तो कर्नल रॉबर्ट गिब्बन ने उसमें पाई जाने वाली फ़ायदेमंद चीजें ढूंढ निकालीं. जैसे विटामिन ‘ए’, ‘सी’, ‘ई’ वग़ैरा.

अब कर्नल रॉबर्ट गिब्बन चाहते थे कि लोग डर से मुक्त हों और टमाटर खाकर सेहत बेहतर करें. लिहाज़ा, उन्होंने यह बात लोगों को समझाने का बीड़ा उठाया. टमाटर की नई फसल आई थी उसी दौरान. सो, उन्होंने ताज़ा टमाटरों से भरी टोकनी ली और क़स्बे के कोर्टहाउस (पंचायत के बरामदे जैसा) पर आ जमे. वहीं क़स्बे के लोगों को इकट्‌ठा किया. बताते हैं कि कर्नल के बुलावे पर करीब दो हजार लोग जमा हुए. उनके सामने ही कर्नल ने टमाटर की ख़ूबियां गिनानी शुरू कीं और टोकनी से एक-एक टमाटर उठाकर आराम से खाते भी गए. यह बताने के लिए कि देखो, ‘इसमें कोई ज़ोख़िम नहीं है. इसे खाने से कोई मरता नहीं है’. कहते हैं, कुछ देर बाद टोकनी के टमाटरों के साथ-साथ लोगों के दिमाग़ों का ये भरम भी ख़त्म हो गया कि टमाटर ‘ज़हरीला फल’ है. हां, ‘फल’ ही क्योंकि टमाटर अब तक सब्ज़ियों में शुमार नहीं था.

अलबत्ता टमाटर फल से सब्ज़ियों में कैसे शामिल हुआ, इसका भी एक दिलचस्प वाक़्या है. ये मसला भी अमेरिका में ही पेश आया, साल 1893 में. वहां के कारोबारी निक्स-खानदान (जॉन निक्स, जॉन डब्ल्यू निक्स, जॉर्ज डब्ल्यू निक्स और फ्रैंक डब्ल्यू निक्स) ने 1886 में वेस्टइंडीज से टमाटर मंगवाए थे. ये न्यू यॉर्क के बंदरगाह पहुंचे तो वहां के कलेक्टर एडवर्ड एल हैडेन ने ‘टैरिफ एक्ट-1883’ के मुताबिक टमाटर को सब्जी मानते हुए इस पर सीमा-शुल्क लगा दिया और निक्स-खानदान से इसे वसूल भी लिया. इससे ख़फ़ा निक्स-ख़ानदान ने हाईकोर्ट में मुक़दमा दायर कर दिया. इस दलील के साथ कि टमाटर दरअस्ल फल है और कानूनन फलों के आयात पर सीमा शुल्क नहीं लगता. इसलिए उनका पैसा उन्हें वापस दिलाया जाए. सुनवाई हुई और अदालत ने निक्स-ख़ानदान की दलीलें ख़ारिज़ कर दीं. साफ कर दिया कि टमाटर वास्तव में सब्जी है, न कि फल.

अदालत का कहना था कि ‘टमाटर भले ही लताओं में फलों की तरह उगाया जाता हो, लेकिन उसका इस्तेमाल आलू, गोभी जैसी सब्ज़ियों की तरह होता है. ज़्यादातर लोग इसे सब्ज़ी ही मानते हैं. कहते हैं. इसलिए यह सब्ज़ी है’. इस तरह टमाटर फिर आगे से हमेशा के लिए सब्ज़ी का हिस्सा हो गया. हालांकि टमाटर की दास्तान में अभी एक और अहम पड़ाव का ज़िक्र लाज़िमी है. यह पड़ाव आया इटली में, साल 1889 के दौरान. बताते हैं कि उस साल इटली की रानी मार्गरीटा नेपल्स शहर आई थीं. उनके स्वागत के लिए नेपल्स में एक बेकरी चलाने वाले रॉफेल एस्पिओसिटो ने कुछ नया करने की सोची. उन्होंने एक बड़ी सी मोटी गोल रोटी (ब्रेड) पर इटली का तिरंगा झंडा सजाकर रानी और राजा के सामने भोजन की तरह परोसने का मंसूबा बांधा. तो इसमें पनीर की कतरनों से बना झंडे का सफ़ेद रंग. तुलसी की पत्तियों से हरा. और टमाटर से झंडे का लाल रंग.

इस तरह जो व्यंजन बना और उसे नाम दिया गया ‘पिज़्ज़ा’. रानी ख़ुश हो जाएं इसलिए उनके सामने पेश करते हुए उसे कहा गया ‘मार्गरीटा पिज़्ज़ा’. और जनाब, पिज़्ज़ा के इस आविष्कार से रानी तो ख़ुश हुईं ही, दुनिया आज तक इस व्यंजन की दिवानी हुई पड़ी है. कहते हैं, आविष्कार के बाद पिज़्ज़ा ने ख़ुद जितनी तेजी से तमाम मुल्कों में जगह बनाई, उससे भी कहीं तेज रफ़्तार से टमाटर को लोगों के घरों, उनकी रसोई तक पहुंचाया. अलबत्ता, टमाटर के किस्से में अभी दो सवाल रह जाते हैं. पहला- इसकी पैदाइश कहां हुई और दूसरा- ये हिन्दुस्तान कैसे पहुंचा. तो इसमें से दूसरे का ज़वाब तो ये बताया जाता है कि पुर्तगाली नाविक वास्को डि गामा जब 1498 में हिन्दुस्तान आए, तभी वे अपने साथ आलू, टमाटर, लाल मिर्च जैसी फ़सलों की जानकारी भी लाए. जबकि पहले सवाल का ज़वाब पुख़्ता तौर पर किसी को पता नहीं है. फिर भी माना जाता है कि 700 ईस्वी के आस-पास दक्षिण या मध्य अमेरिका के किसी इलाके में पहली बार टमाटर उगाया गया था.

Tags: Daastaan Go, Hindi news, News18 Hindi Originals, Tomato

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