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दास्तान-गो : रामकृष्ण परमहंस हर किसी में भगवान देखते थे और लोग उनमें!

दास्तान-गो : रामकृष्ण परमहंस हर किसी में भगवान देखते थे और लोग उनमें!

श्रीराम कृष्ण आश्रम से एक किताब आई है, ‘श्रीरामकृष्ण और श्रीमां’. स्वामी अपूर्वानंद ने लिखी है ये किताब.

श्रीराम कृष्ण आश्रम से एक किताब आई है, ‘श्रीरामकृष्ण और श्रीमां’. स्वामी अपूर्वानंद ने लिखी है ये किताब.

Daastaan-Go ; Swami Ramkrishn Paramhans : फिर जनाब, एक वक़्त वह भी आया जब स्वामी रामकृष्ण परमहंस से शरीर का बंधन भी छूट गया. साल 1885 की बात ये है. कहते हैं, स्वामी जी को गले में कैंसर हो गया था. उनके नाम पर बने ‘बेलूर मठ’ की वेबसाइट है जनाब. उसी में स्वामी जी के बारे में जो ज़िक्र है, वहां ऐसी जानकारी दर्ज़ है. उसके मुताबिक, स्वामी जी की बीमारी सामने आने के बाद शहर के बाहरी इलाके में मौज़ूद एक घर में उन्हें रखा गया. वहीं उनके शिष्य 24 घंटे उनकी तीमारदारी किया करते थे. इलाज़ भी हुआ. लेकिन...

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक़्ती तौर पर मौज़ूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों, तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज़…

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जनाब, ये साल 1842-43 की बात होगी. हिन्दी कलेंडर के जेठ या आषाढ़ का महीना था. बंगाल के हुगली जिले में कामारपुकुर गांव के एक ब्रा़ह्मण परिवार का छह-सात साल का बच्चा छोटी डलिया में मुरमरे लेकर खाते हुए खेत की मेड़ पर चला जा रहा था. तभी उसे आसमान में काले-काले बादल दिखे. अभी उन पर उस बच्चे की नज़र पड़ी ही थी कि उसने देखा कि बादलों ने आंखों के सामने का सारा आकाश ढंक लिया है. उसी वक़्त दूध जैसे सफ़ेद बगुलों का झुंड उन काले बादलों के नीचे से गुज़रता दिखाई दिया. यूं तो आम बात थी, लेकिन उस नज़ारे को देखकर बच्चे के मन में न जाने कैसा एहसास हुआ कि वह देखते-देखते वहीं अपने होश-ओ-हवास खो बैठा. गिर गया. कुछ देर उसी हाल में पड़ा रहा कि तभी किसी राहग़ीर की उस पर नज़र पड़ी. वह उसे पहचान गया और उसने उस बच्चे को उठाकर उसके घर, मां-बाप के पास पहुंचाया.

घर में माता-पिता लड़के को इस हाल में देखकर हैरान हो गए. उन्हें लगा कि किसी ऊपरी ताक़त ने तो बच्चे को जकड़ नहीं लिया? या मिरगी-विरगी का दौरा आया हो? सो, हक़ीम, वैद्य बुलाए गए. कि तभी, बच्चे को होश आया. उसने पूरा माज़रा बताया कि काले बादलों के नीचे से सफ़ेद बगुलों को उड़ते देखकर वह सुध-बुध खो बैठा था. क्योंकि उस नज़ारे में उसे ईश्वर-सा अनुभव हुआ. लेकिन मां-बाप कहां मानने चले. उन्होंने बच्चे की बात पर कान न दिए और जो ज़रूरी हो सकता था, उसकी दुरुस्तगी के लिए, वह सब किया उन्होंने. हालांकि जनाब, वह बच्चा फिर उस तरह कभी दुरुस्त न हो सका, जैसा कि उसे मां-बाप चाहते थे. क्योंकि कुदरत में, इंसानों में, मूर्तियों में, अमूर्त में ‘ईश्वर को साक्षात् देखने की उसकी बीमारी’ कम या ठीक होने की जगह बढ़ती ही गई. और इतनी बढ़ी कि आगे चलकर आम लोग उसी में ईश्वर को देखने लगे फिर.

इस बच्चे का नाम जानते हैं क्या हुआ? रामकृष्ण परमहंस. स्वामी रामकृष्ण. जनाब, धंतोली (नागपुर) के श्रीराम कृष्ण आश्रम से एक किताब आई है, ‘श्रीरामकृष्ण और श्रीमां’. स्वामी अपूर्वानंद ने लिखी है ये किताब. उसी में श्रीरामकृष्ण की ज़िंदगी से जुड़े वाक़ि’ओं का, किस्से-कहानियों का, सिलसिलेवार ज़िक्र है. उस किताब के मुताबिक, स्वामी रामकृष्ण ने अपने बचपन का ये क़िस्सा ख़ुद ही आगे चलकर लोगों को बताया था. झूठ वे बोलते नहीं थे. ग़लत कोई काम करते नहीं थे. ऐसा उनसे अगर कोई बैर रखता होगा, तो वह भी मानता रहा. लिहाज़ा, उनकी बताई बातों, क़िस्सों को ग़लत मानने की वज़ह भी किसी को कभी मिली नहीं. तो जनाब, रामकृष्ण की जि़ंदगी से जुड़ी बातें, फिर वे चाहे उनकी कही हों या की हुई, ऐसे ही क़िस्से-कहानियों में मिलती हैं. उन्हीं के सिरे पकड़-पकड़कर आगे बढ़ने की, उनके बारे में जानने-समझने की कोशिश करते हैं.

स्वामी रामकृष्ण के बचपन का नाम गदाधर होता था. भगवान विष्णु को गदाधर भी कहा करते हैं. आगे चलकर कई लोगों ने स्वामी जी को भी ‘विष्णु का अवतार’ कहा तो सुनकर वे बस, हंस देते थे. उनकी पैदाइश की तारीख़ 17 फरवरी 1836 की बताई जाती है. पिता का नाम क्षुदिराम और मां का चंद्रादेवी कहा जाता है. क़स्बे में पूजा-पाठ से क्षुदिराम परिवार की आजीविका चलाते थे. लेकिन इस पर तब मुश्किल आई, जब क्षुदिराम ख़ुद भगवान के धाम चले गए. गदाधर अभी साढ़े सात-आठ साल के थे. उनके बड़े भाई थे रामकुमार. अब उन पर परिवार का ज़िम्मा आ गया. सो, वे कलकत्ते चले गए. ताकि वहां पूजा-पाठ वग़ैरा से कुछ पैसे कमा सकें. इधर, पिता जी के दुनिया छोड़ देने के बाद गदाधर का मन उचाट हो गया. वे अब हर कहीं उस अनंत शक्ति को ढूंढ़ने लगे, जो जब चाहे किसी को धरती पर लाती और जब मर्ज़ी उठा ले जाती है.

गदाधर का मन पढने-लिखने में भी नहीं लगा. बल्कि उन क़िताबों में लगा, जिनमें अनंत-शक्ति यानी कि ईश्वर से जुड़े सवालों के ज़वाब रहा करते हैं. इस तरह, उम्र के साथ-साथ उनका ‘विराग’ बढ़ता जाता था और राग छूटता जाता था. भाई को जब इस बात एहसास हुआ तो उन्होंने गदाधर को कलकत्ते बुलवा लिया. यहां पर रामकुमार अब तक दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी हो गए थे. एक संस्कृत पाठशाला भी चलाया करते थे. इन्हीं सब कामों में मदद के लिए उन्हें किसी की ज़रूरत थी, तो भाई को बुला भेजा. अभी यहीं बताते चलें कि दक्षिणेश्वर काली का मंदिर साल 1855 में कलकत्ते की एक ज़मींदार कारोबारी रानी रासमणि ने बनवाया था. वे धर्म-कर्म के काम भी ख़ूब किया करती थीं. उसी सिलसिले में मंदिर ता’मीर करवाया. मगर उसके लिए पुजारी नहीं मिल रहा था. क्योंकि रासमणि छोटी जात की थीं. इससे कोई तैयार न होता था.swami2

तभी एक परिचित ने उन्हें रामकुमार से मिलवाया. उन्होंने उनकी भावना को समझा और काली मंदिर में पूजा करना मंज़ूर किया. अब तक गदाधर भी 20-22 बरस के हो चुके थे और भाई के बुलाने पर वे भी कलकत्ते आ गए थे. यहां उन्हें लाने का रामकुमार का एक और मक़सद था. उन्हें लगातार पता लग रहा था कि गदाधर दीन-दुनिया से दूर होते जाते हैं. लिहाज़ा, उन्होंने कुछ वक़्त पहले उनकी शादी भी कर दी थी. साथ ही काम-काज में लगाने की कोशिश की थी. पर गदाधर के कलकत्ते आने के बाद तो मसला कुछ और ही हो गया. यहां आने के कुछ वक़्त बाद ही रामकुमार ख़ुद दुनिया छोड़ गए और परिवार सहित मंदिर की पूजा का ज़िम्मा भी गदाधर पर आ गया. और गदाधर ने यहां पूजा-पाठ क्या शुरू की मानो उनकी बरसों की कोई साध पूरी होने लगी. जिस अनंत-शक्ति को वे अब तक ढूंढ़ रहे थे, वह उन्हें मां-काली के रूप में सामने दिखने लगी.

बताते हैं कि पूजा करते-करते गदाधर मां-काली में ऐसे खो जाते कि दोनों आपस में बात करने लगते थे. बेटे की तरह वे उस मां के आंचल में सिमट जाया करते. उन्हें अपने हाथों से भोजन कराते. उनका सोलह-श्रृंगार करते. इस क्रम में कभी कोई व्यवधान आ जाता और उनकी मां उनके ध्यान से कुछ पलों के लिए ओझल हो जाती, तो बच्चों की तरह रोने लगते. कहते हैं, गदाधर की इसी तरह की भाव-पूजा देखकर उन्हें रामकृष्ण नाम दिया था. यहां से अब वे स्वामी रामकृष्ण हो गए. इसी बीच, उनकी पत्नी सारदा देवी जब 16 बरस की हुईं तो अपने पति के साथ रहने कलकत्ते आ गईं. बताते हैं कि तब रामकृष्ण ने उनसे पूछा, ‘यहां क्यों आई हो मां? क्या मुझे दीन-दुनिया में वापस धकेलने के लिए?’ जी जनाब, रामकृष्ण जी अपनी विवाहिता पत्नी को भी मां-काली के ही रूप में देखा करते थे. उनकी भी ‘सोलह-श्रृंगार पूजा’ किया करते थे.

तो जनाब, जब स्वामी रामकृष्ण ने सवाल किया तो शारदा देवी ने उनसे कहा, ‘नहीं, मैं आपको ले जाने के यहां नहीं आई हूं. बल्कि आपने जो रास्ता चुना है. जो लक्ष्य तय किया है, उस तक आप पहुंच सकें, उसमें मदद के लिए आई हूं’. यूं स्वामी रामकृष्ण का आगे का सफ़र अब मां-सारदा के साथ और मां-काली के पीछे-पीछे शुरू हो गया. इस सफ़र में आगे भैरवी ब्राह्मणी भी शामिल हुईं. गुरु की हैसियत से. उन्होंने स्वामी रामकृष्ण को सभी तरह तंत्र-विद्याएं सिखाईं. ये साल 1861 के आस-पास की बात है. स्वामी जी ने आगे और भी तमाम गुरु बनाए. इस्लाम, ईसाइयत, सिख, बौद्ध, हर पंथ से. सबकी क़िताबें पढ़ीं और कहते हैं कि हर मज़हब के ईश्वर, अल्लाह, मसीह को उन्होंने अपने सामने साक्षात् देखा. और समझा सिर्फ इतना, ‘यातो मत, तातो पथ’. यानी ‘जितने मत, उतने पंथ’. मगर लक्ष्य उन्हें हर पंथ का, हर मत का एक दिखा था.

इसके बाद अंत में जैसा कि बताते हैं, स्वामी रामकृष्ण की ज़िंदगी में आए महंत तोतापरी. ये उस दौर के बड़े आध्यात्मिक गुरु हुआ करते थे. उन्होंने रामकृष्ण के बारे में ख़ूब सुन रखा था तो ख़ुद ही उन्हें ‘परमहंस’ बनाने चले आए. इसका एक दिलचस्प क़िस्सा ईशा फाउंडेशन वाले जग्गी वासुदेव बताया करते हैं. उनके मुताबिक, ‘एक रोज रामकृष्ण हुगली नदी के किनारे बैठे हुए थे. अपनी मां (काली) के ध्यान में लीन थे. तभी वहां से गुज़र रहे महंत तोतापरी ने उन्हें देखा. उन्हें देखते ही वे समझ गए कि यही वह शख़्सियत है, जिसे वे परमहंस के स्तर तक ऊपर ले जा सकते हैं. लेकिन दिक़्क़त ये थी कि स्वामी रामकृष्ण अपनी मां (काली) के मोह से बंधे हुए थे. वे बच्चे की तरह हर वक़्त अपनी मां के साथ रहना चाहते थे. जबकि महंत तोतापरी जानते थे कि जब तक यह मोह नहीं छूटता, रामकृष्ण इससे आगे जाकर परमहंस नहीं हो सकते’. swami3

‘तब महंत तोतापरी ने स्वामी जी को समझाया कि तुम्हें अगर अपनी मां चाहिए तो भावों से मुक्त होना पड़ेगा. भले वह भाव भक्ति का, वात्सल्य का ही क्यों न हो. तब बड़ी मुश्किल से स्वामी जी तैयार हुए. इसके बाद महंत तोतापरी ने उन्हें अपनी साधना, अपने सामर्थ्य से भाव-मुक्त कर परमहंस के स्तर तक पहुंचने में सक्षम बनाया’. जनाब, हिन्दू संस्कृति में परमहंस उसे कहा जाता है जो हर चीज से निरपेक्ष हो जाता है. अछूता हो जाता है. किसी से उसका राग नहीं होता. किसी से द्वेष नहीं होता. किसी से संबंध नहीं होता. किसी तरह का बंध नहीं होता. और स्वामी जी भी अब अपने जीवन के इक़लौते बंधन (मां काली की भाव-भक्ति के) से मुक्त हो गए थे. इसके बाद तो उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी बस, आम लोगों के बंध खोलने का ही काम किया. और जिनके खोल सके उनमें सबसे अव्वल नाम हुआ स्वामी विवेकानंद का.

फिर जनाब, एक वक़्त वह भी आया जब स्वामी रामकृष्ण परमहंस से शरीर का बंधन भी छूट गया. साल 1885 की बात ये है. कहते हैं, स्वामी जी को गले में कैंसर हो गया था. उनके नाम पर बने ‘बेलूर मठ’ की वेबसाइट है जनाब. उसी में स्वामी जी के बारे में जो ज़िक्र है, वहां ऐसी जानकारी दर्ज़ है. उसके मुताबिक, स्वामी जी की बीमारी सामने आने के बाद शहर के बाहरी इलाके में मौज़ूद एक घर में उन्हें रखा गया. वहीं उनके शिष्य 24 घंटे उनकी तीमारदारी किया करते थे. इलाज़ भी हुआ. लेकिन इस मेहनत-मशक़्क़त के बावज़ूद उन्हें अधिक दिनों तक दुनिया में रोककर रखा नहीं जा सका. साल 1886 के 16 अगस्त की तारीख़ थी वह. यानी आज की ही, जब स्वामी जी सफ़ेद हंसों की तरह उड़कर कहीं अनंत-आकाश में विलीन हो गए. जिस मां की भाव-भक्ति के बंधन से वे शरीर के रहते बंधे हुए थे. शरीर के छूटते ही, उसी मां (प्रकृति) के आंचल में हमेशा के लिए जाकर ठहर गए. उसी के साथ एक, अनेक, अनेकानेक हो गए रामकृष्ण.

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