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daastaan go world bee day story of a painter turned apiarist

दास्तान-गो : एक ‘पेंटर’ को ‘कारपेंटर’ (मक्खी) से प्यार हो गया और फिर…

आज विश्व मधुमक्खी दिवस है.

आज विश्व मधुमक्खी दिवस है.

Daastaan-Go ; World Bee Day : ‘पेंटर एंटन’ कहना इसलिए क्योंकि जब ये वाक़या हुआ, तब तक पेंटिंग के हुनर को वे ठीक-ठाक चमका चुके थे. लेकिन जब उन्होंने उस ‘कारपेंटर’ का हुनर देखा तो अपना भूल गए. चमकदार नीली आभा लिए काला बदन, भन्नाती आवाज़ और बला की तन्मयता. वह एक ‘रानी मक्खी’ थी. पेड़ में छोटी सी खोह बना रही थी.

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज… 


करीब 300 साल पहले की कहानी है ये. तारीख़ें तो ठीक-ठीक दस्तावेज़ में है नहीं. पुराना मामला है न, शायद इसलिए. लेकिन एक तारीख़ फिर भी दर्ज़ पाई जाती है, 20 मई 1734, जब उस बच्चे का बपतिस्मा हुआ था. रस्म के दौरान ईसाई धर्मगुरु ने पवित्र जल में स्नान कराने के बाद उसे ईसाइयत के अनुयायी के रूप में धर्म-दीक्षा दी थी, उस रोज. इसी के कुछ पीछे उसकी पैदाइश भी हुई कही जाती है. मध्य यूरोप के देश स्लोवेनिया के एक किसान परिवार में. माता-पिता ने नाम रखा एंटन. एंटन जानसा, पूरा नाम. दो बड़े भाई थे उसके, जिन्हें चित्रकारी का शौक बेहद था. यूरोप में वह कला, साहित्य के उत्थान का दौर था. सो, बड़े होते एंटन ने भी कूची थाम ली.

हालांकि पढ़ने-लिखने के लिए स्कूल कभी नहीं गए तीनों भाई, लेकिन चित्रकारी को अगले मुक़ाम पर ले जाने की ख़्वाहिश ज़रूर रखते थे. यह देख किसी जानकार ने उन्हें बताया, ‘पड़ोसी मुल्क ऑस्ट्रिया है न. सुना है, वहां चित्रकारों का कोई स्कूल है. अच्छी चित्रकारी सिखाते हैं. चाहो तो, वहां जा सकते हो.’ एंटन भाईयों में एक थे लोवरो. उन्हें ख़ास तौर पर, मशविरा जंच गया. लिहाज़ा उन्होंने ही माता-पिता को मनाने का जिम्मा उठाया और जब वे मान गए तो तीनों भाई विएना चले गए. ऑस्ट्रिया की राजधानी. वहां पेंटिंग स्कूल में दाख़िला ले लिया. अभी यहां वे पेंटिंग के अपने हुनर को निखार ही रहे थे कि एक रोज ‘पेंटर एंटन’ की नज़र एक ‘कारपेंटर’ पर जा टिकी.

Honey Bee

‘पेंटर एंटन’ कहना इसलिए क्योंकि जब ये वाक़या हुआ, तब तक पेंटिंग के हुनर को वे ठीक-ठाक चमका चुके थे. लेकिन जब उन्होंने उस ‘कारपेंटर’ का हुनर देखा तो अपना भूल गए. चमकदार नीली आभा लिए काला बदन, भन्नाती आवाज़ और बला की तन्मयता. वह एक ‘रानी मक्खी’ थी. पेड़ में छोटी सी खोह बना रही थी, परिवार सहित अपने रहने के लिए. एंटन की मौज़ूदगी से लगभग बेख़बर या बेपरवाह. उसकी ये खोह जब बन गई तो एंटन ने देखा कि इस ख़ूबसूरती से उसने इसे बनाया है कि क्या ही कहने. इस क़ुदरती कलाकार के सामने इंसानी हुनर कमतर रह जाए एक बार तो. एंटन ने उसी वक़्त तय कर लिया, ‘मुझे इसके बारे में अब और जानना है.’

एंटन के लिए वैसे, मक्खियों से वाक़फ़ियत यह पहली नहीं थी. पिता के खेत में तमाम छत्ते देखे थे, बचपन में. पिता तो मधुमक्खियां पालते भी थे. इस तरह कि आस-पड़ोस के किसान भी उनसे इस बारे में मशविरा लेने अक़्सर आ जाया करते थे. मग़र इसके बावज़ूद पहली दफ़ा एंटन का सामना इस ‘कारपेंटर मक्खी’ से हुआ था. इसने सोचने पर मज़बूर किया था कि ऐसे तो मक्खियां बहुत होती होंगी? उनके काम, उनका हुनर, रंग-रूप सब अलग होता होगा? इंसानी ज़िंदगी में उनका योगदान भी ज़ुदा होता होगा? और ये सिर्फ़ शहद बनाने तक तो नहीं ही होगा? बस, इन्हीं सवालों ने एंटन को मक्खियों के बारे में और ज़्यादा जानने, समझने की तरफ़ धकेल दिया.

और फिर वह इस क़दर मशरूफ़ हुए इसमें कि पेंटिंग पीछे रह गई. मक्खियों के बारे में आगे दो किताबें लिख डालीं उन्होंने. पहली, ‘डिस्कशन ऑन बीकीपिंग’ (1771) और दूसरी, ‘ए फुल गाइड टु बीकीपिंग’ (1775). मक्खी, मधुमक्खी पालन में इतने मशहूर हो गए कि ऑस्ट्रिया और उसके आसपास के तमाम मुल्कों में लोग इस मसले पर उन्हें सुनने के लिए बुलाने लगे. यहां तक कि उनके निधन के बाद ऑस्ट्रिया की महारानी मारिया थेरेसा ने एक फ़रमान जारी किया. इसमें मक्खी, मधुमक्खी पालन में लगे उन तमाम लोगों को वे किताबें पढ़ने के लिए कहा गया, जो एंटन ने लिखी थीं. यूगोस्लाविया ने उन पर डाक टिकट जारी किया, वह अलग.

Honey Bee

यही नहीं, क़रीब 250 बरस बाद दिसंबर-2017 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने जब ‘विश्व मधुमक्खी दिवस’ मनाने का फ़ैसला किया तो तारीख़ अगले साल की वह चुनी, जब एंटन का बपतिस्मा हुआ था. एंटन कहते थे, ‘ईश्वर ने इंसानों की ज़िंदगी में शहद घोलने के लिए मधुमक्खियों की सूरत में कमाल का जीव बनाया है. तमाम जाने-पहचाने जीवों में ये सबसे ज़्यादा मेहनती हैं. मेहनत भी ये अपने लिए कम, इंसानों के लिए ज़्यादा करती हैं. लेकिन इंसान ही इन पर ध्यान नहीं देता. अनदेखा करता है. जबकि ज़रूरत है कि इन्हें देखा जाए, समझा जाए. इनकी अहमियत को तवज्ज़ो दी जाए.’ सही ही कहते थे एंटन. मधुमक्खियों से जुड़े तथ्य भी आज यही कहते हैं.

ग़ौर कीजिए. धरती पर मौज़ूद हर जीव-जंतु का जो भी भोजन हो, उसकी शुरुआत पेड़-पौधों से होती है. ये वनस्पति फले-फूले, बढ़ती रहे, इसके लिए परागकणों को एक से दूसरी जगह ले जाए जाने की ज़रूरत होती है. यह काम रानी मक्खी, मधुमक्खी, भौंरे (सब एक परिवार के) वग़ैरह पतंगे करते हैं. बताते हैं, धरती पर इनकी क़रीब 16,000 प्रजातियां हैं. दिन-रात अपने काम में लगी रहती हैं. इनके इस काम और मेहनत से ही इंसानों को उनके कुल भोजन का लगभग 70 फीसद हिस्सा हासिल होता है. कल्पना कीजिए, इस छोटे से जीव की हमारी ज़िंदगी में कितनी बड़ी हिस्सेदारी है ये. कम से कम इसीलिए सही, इन्हें इनके हक़ की अहमियत तो दी जा सकती है.

Tags: Hindi news, News18 Hindi Originals

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