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दास्तान-गो : संगीत से सेहत बिगाड़ने की ‘साज़िश’! कितनी हक़ीक़त, कितना फ़साना?

दुनियाभर में आज के दिन "वर्ल्ड म्यूजिक डे" मनाने की शुरुआत हुई थी.

दुनियाभर में आज के दिन "वर्ल्ड म्यूजिक डे" मनाने की शुरुआत हुई थी.

Daastaan-Go ; World Music Day Special : इस दलील में भी बात वही रही कि अलग दरजे (440 और 432 हर्ट्ज़) की आवाज़ों के माहौल में टकराने से इंसानों के भीतर बेचैनी पैदा होगी. इसके असर में आकर वे तरह-तरह की बीमारियों के शिकार होंगे. इससे दवा कारोबारियों के लिए मोटा मुनाफ़ा कमाने का इंतज़ाम हो जाएगा. हालांकि गुज़रते वक़्त के साथ ऐसी तमाम दलीलों को जानकारों ने सिलसिलेवार तरीके से ख़ारिज़ कर दिया.

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दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज… 

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दुनिया आज 21 जून के दिन ‘योग दिवस’ मनाती है. सेहत के लिए सही समझे जाने वाली तमाम कसरतें किया करती है. लेकिन संगीत-बिरादरी के लोग इसी दिन गलियों, नुक्कड़ों, बाग, बाग़ीचों में पहुंचकर लोगों को सुरों की सौग़ात बांटा करते हैं. क्योंकि आज ही ‘संगीत दिवस’ भी हुआ करता है. कम लोग जानते हैं, इस बारे में लेकिन ये बहुतों को पता है कि सेहत के लिए जितना योग ज़रूरी है, उतना ही संगीत भी. यही वज़ा है कि कसरत करते वक़्त वर्ज़िश-गाह (जिम, अखाड़ा) वग़ैरा में अक़्सर कहीं तेज, कहीं मद्धम ‘संगीत का योग’ भी हुआ करता है.

इतना ही नहीं, दूर कहीं जब गाड़ियों से घूमने निकलते हैं तो संगीत राहें आसान कर देता है. दिल पर चोट लगती है तो दिलासा देता है. दिमाग परेशान हो तो उसके सुकून का ज़रिया बनता है. कहीं, कभी तो डॉक्टर साहब मरीज़ के मर्ज़ को तेजी से ठीक करने के लिए भी संगीत का सहारा लिया करते हैं. और बड़ी हद तक कामयाब भी होते हैं. लेकिन अगर यहीं कोई कहे कि इसी संगीत से आम इंसानों की सेहत बिगाड़ने की साज़िश भी हुई है कभी, तो किसी को यक़ीन होगा क्या? यक़ीनी तौर पर नहीं. मगर अफ़साने हैं इसके फिर भी, जो ऐसे मौकों पर अक्सर सामने आ जाया करते हैं. और साथ में हक़ीक़त भी उभर आती है. सो, आज जब मौका है तो क्यों न अपने इल्म (ज्ञान) के लिए ही सही, संगीत से जुड़े इस पहलू का जाइज़ा भी ले लिया जाए.

तो जनाब, बुनियादी तौर पर पहले इतना समझ लीजिए कि पूरी काइनात (यूनिवर्स) में जितनी भी आवाज़ें वे सब मुसीक़ी (संगीत) के सात सुरों के दायरे में आती हैं. और ये सातों सुर एक तरह की गुरूप-बंदी (समूह) में हुआ करते हैं. जिस तरह आसमान पर सात-तारे (सप्तर्षि) हैं न, वैसे. इसीलिए हिन्दी ज़बान में इनकी गुरूप-बंदी को ‘सप्तक’ भी कहा जाता है. इनके बीच दूरियां होती हैं, लेकिन तयशुदा और वह भी इस तरह कि गोया, एक सुर को दूसरे से आपस में बुन दिया हो किसी ने. यही वज़ा है कि इन्हें किसी तरफ़ भी खिसकाइए, सब एक साथ खिसकते हैं. मसलन- इनके पहले सुर को गिनती में अगर ‘एक’ मान लिया जाए तो आगे बाकी सुरों का आंकड़ा ‘दो’, ‘तीन’, ‘चार’ से होते हुए ‘सात’ तक होगा. वहीं, पहले वाले को गिनती में ‘डेढ़’ समझ लिया तो बाकी सुर उतने आगे सरक कर ‘ढाई’, ‘साढ़े तीन’, ‘साढ़े चार’ से होते हुए ‘साढ़े सात’ हो जाएंगे.

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हालांकि तबीइयात-दां (फिजिसिस्ट) सुरों या आवाज़ों को इस तरह ‘एक’, ‘दो’ की मोटी गिनती से नहीं गिनते. वे इसे अपनी ज़बान में, बारीक़ी से ‘हर्ट्ज़’ में गिना करते हैं. ‘हर्टज़’ यानी एक सेकेंड के भीतर किसी आवाज़ से माहौल में कितनी जुंबिश (कंपन) हुई. एक, दो, सौ, पांच सौ बार, कितनी. जर्मनी के एक तबीइयात-दां हुए हीनरिच हर्ट्ज़. उन्हीं के काम और नाम से आवाज़ को यूं मापने का सिलसिला शुरू हुआ, साल 1935 से. उससे पहले ‘साइकिल-पर-सेकेंड’ में आवाज़ों को मापा जाता था. तो, इस तरह जब आवाज़ों को मापा जाने लगा, तभी ये सामने आया कि संगीत का पहला सुर तो हर गाने-बजाने वाले का अपना अलहदा है. उसमें कोई यकसानी (यूनिफॉर्मिटी) नहीं है. इससे फ़नकारों को तो नहीं, मगर उनके लिए साज़ बनाने वालों को दिक़्क़त पेश आती है.

लिहाज़ा, 1859 में पहली मर्तबा फ्रांस में तय हुआ कि 435 ‘साइकिल-पर-सेकेंड’ वाले सुर को मुसीक़ी का पहला सुर माना जाए. उसे बुनियाद मानकर सभी साज़ों पर धुन साधी जाए. उन्हें ट्यून किया जाए. हालांकि ब्रिटेन ने 1896 में अलग इंतज़ाम कर लिया और 439 ‘साइकिल-पर-सेकेंड’ वाले सुर को संगीत का पहला सुर माना. इस बीच, कई मुल्कों में 422, 423, 432, 450 ‘साइकिल-पर-सेकेंड’ वाले सुरों को पहला सुर मानने का सिलसिला भी जारी रहा. फिर आया साल 1939 का, जब लंदन में बड़ा जमावड़ा हुआ और वहां ये तय किया गया कि 440 हर्ट्ज़ (अब हर्टज़ का इस्तेमाल होने लगा था) वाले सुर को संगीत का पहला सुर माना जाए. इसके बाद दुनियाभर की मुसीक़ी के लिए यह पैमाना बन गया. सभी साज़ इसी बुनियाद पर ट्यून किए जाने लगे. बल्कि दूसरे सामानों में भी जब-जहां आवाज़ को शुरुआती दरजा देने की ज़रूरत हुई, यही पैमाना तय रहा.

अलबत्ता यही वह मोड़ भी साबित हुआ, जहां से ‘संगीत के सुर-साज़ में साज़िश’ के अफ़साने चल पड़े. दरअस्ल, 1939 के उस जमावड़े में तब के एक नामी-गिरामी शख़्स भी शामिल हुए थे. डॉक्टर जोसेफ गोएबल्स नाम हुआ उनका. जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर के अव्वल सलाहकार. उनके बेहद ख़ास मंत्री. लंदन के उस जमावड़े में गोएबल्स की मौज़ूदगी भर से ऐसा कहा जाने लगा कि उन्होंने साज़िश के तहत अपने असर का इस्तेमाल करते हुए 440 हर्ट्ज़ वाला ये पैमाना तय कराया है. दलील ये दी गई कि तमाम बुनियादी काइनाती आवाज़ें (नेचुरल साउंड) अस्ल में 432 हर्ट्ज़ के दरजे से पहली शुरुआत पाती हैं. ऐसे में इंसान के बनाए साज़ जब 440 हर्ट्ज़ के सुर से शुरू होकर बजेंगे तो अलग दरजे की ये आवाज़ें माहौल में टकराएंगी. बेचैनी का आलम पैदा करेंगी. इंसानी दिमाग़ों को परेशान करेंगी. सुनने वाले सुध खो देंगे और उन्हें साधना आसान हो जाएगा.

इसी तरह की बुनियाद पर आगे चलकर एक और दलील आई कि अमेरिका में दवा कारोबार के बड़े रईसों ने अस्ल में, 440 हर्ट्ज़ वाला ये बंदोबस्त कराया है. क्योंकि लंदन के जमावड़े से तीन साल पहले यानी 1936 से ही वहां इसके इस्तेमाल की बाक़ायदा शुरुआत हो चुकी थी. इस दलील में भी बात वही रही कि अलग दरजे (440 और 432 हर्ट्ज़) की आवाज़ों के माहौल में टकराने से इंसानों के भीतर बेचैनी पैदा होगी. इसके असर में आकर वे तरह-तरह की बीमारियों के शिकार होंगे. इससे दवा कारोबारियों के लिए मोटा मुनाफ़ा कमाने का इंतज़ाम हो जाएगा. हालांकि गुज़रते वक़्त के साथ ऐसी तमाम दलीलों को जानकारों ने सिलसिलेवार तरीके से ख़ारिज़ कर दिया.

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ग़ौर कीजिए. संगीत के सुरों में साज़िश की बात करने वाले एक दलील देते हैं कि पुरानी बांसुरी और तिब्बत के बाउल जैसे साज 432 हर्ट्ज़ की बुनियाद पर बजाए जाते थे. ट्यून किए जाते थे. जबकि वे यह भूल जाते हैं कि हर्ट्ज़ की तो शुरुआत ही 1935 से हुई. यहां तक कि सेकेंड की माप भी 16वीं सदी में शुरू हुई तो इससे भी पहले के फ़नकार अपने साज़ 432 हर्ट्ज़ पर कैसे ट्यून कर सकते हैं. फिर इसी तरह एक और दलील है कि दिल, दिमाग़, धरती, सूरज और पानी से आने वाली तमाम आवाज़ें 432 हर्ट्ज़ की बुनियाद से शुरू होती हैं. तो इस बाबत भी साइंसदान बताते हैं कि दिल की आवाज़ एक से ढाई हर्ट्ज़ के बीच रहती है. यानी इसे गुणा कर के आगे बढ़ाएं तब भी ये 432 के आंकड़े पर नहीं पहुंचती. ऐसे ही दिमाग़ी नसों की जुंबिश (कंपन) एक से 70 हर्ट्ज़ के बीच आ ठहरती है. यानी उसके गुणा में भी 432 कहीं नहीं आता. इसी तरह साइंसदानों ने धरती, पानी और सूरज से निकलने वाली जुंबिशों को भी नापा. वे भी 432 तक पहुंचती नहीं दिखीं.

दुनिया के दो बड़े मुसीक़ार इतालवी ग्युसेप वरदी और ऑस्ट्रिया के वॉल्फगैंग एमेडियस मोज़ार्ट के बारे में कहा गया कि उन्होंने 432 हर्ट्ज़ की बुनियाद पर अपना करिश्माई संगीत रचा. लेकिन यह बात भी सही नहीं पाई गई. क्योंकि मोज़ार्ट के पियानो को ट्यून करने वाला जो औज़ार जानकारों के हाथ लगा वह इस साज़ को 421.6 हर्ट्ज़ की बुनियाद देने वाला बताया जाता है. वहीं वरदी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी पूरी मुसीक़ी 435 हर्ट्ज़ की बुनियाद पर तैयार की थी. हालांकि उन्होंने 432 हर्ट्ज़ की बुनियाद की तरफ इशारा ज़रूर किया, ऐसा बताया जाता है. इसके अलावा साज़िश की बात काटने वाले सबसे वज़नदार दलील ये देते हैं कि 440 हर्ट्ज़ की बुनियाद वाला बंदोबस्त दुनिया में आज है ज़रूर. लेकिन ये ऐसा कोई क़ाइदा (नियम) नहीं है कि उसे हर किसी को मानना ही होगा. यानी मुसीक़ार की मर्ज़ी है, वह चाहें तो अपने साज़ को 440 पर ट्यून करें, 432, 435 या किसी और पैमाने पर. दुनिया के कई मुसीक़ार ऐसा कर रहे हैं.

यानी कुल मिलाकर मसला यूं है कि संगीत से सेहत बिगाड़ने की ‘साज़िश’ वाली बातों में हक़ीक़त का मेल कम, अफ़सानों का घाल-मेल ज़्यादा दिखता है. और अफ़साने भी ऐसे जो किसी अज़ाम तक पहुंचते नहीं दिखते. सो, शायर साहिर लुधियानवी के लब्ज़ों में इससे आगे की बात यूं समझें कि ‘वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा.’ लिहाज़ा ‘साज़िश’ की बातों पर मिट्‌टी डालिए और संगीत-दिवस पर मनपसंद संगीत का मज़ा लेकर तर-ओ-ताज़ा होइए. सुकून तो मिलेगा ही, सेहत को भी फ़ायदा हो रहेगा.

Tags: Hindi news, News18 Hindi Originals, World music day

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