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भारत में ही रहना पसंद करेंगे दलाई लामा, चीन-ताइवान के नाजुक संबंधों का दिया हवाला

भारत में ही रहना पसंद करेंगे दलाई लामा, चीन-ताइवान के नाजुक संबंधों का दिया हवाला

दलाई लामा ने भारत में ही रहने की इच्छा जताई है. (फाइल फोटो: ANI)

दलाई लामा ने भारत में ही रहने की इच्छा जताई है. (फाइल फोटो: ANI)

China-Taiwan Relations: उल्लेखनीय है कि चीन और ताइवान 1949 के गृहयुद्ध में अलग हो गए थे. अमेरिका ने साम्यवादी चीन को मान्यता देने के लिए 1979 में ताइवान से औपचारिक कूटनीतिक संबंध खत्म कर दिए थे, लेकिन वह कानून के तहत यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि ताइवान अपनी रक्षा स्वयं कर सके और वह उसके प्रति सभी खतरों को गंभीर चिंता का विषय मानता है.

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    नई दिल्ली. तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा (Dalai Lama) ने भारत में ही रहने की इच्छा जताई है. चीन और ताइवान के ‘नाजुक संबंधों’ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा है वे भारत में ही रहना पसंद करेंगे. बुधवार को ऑनलाइन न्यूज कॉन्फ्रेंस में उन्होंने इस बात की जानकारी दी. साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि फिलहाल, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की कोई योजना नहीं है. हाल ही में दलाई लामा ने तिब्बत में चीन की तरफ से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की दुनिया से अपील की थी. उन्होंने अन्य देशों से अपील की थी कि क्षेत्र में तिब्बत की भूमिका पर ध्यान दें.

    बुधवार को एक कॉन्फ्रेंस के दौरान दलाई लामा ने कहा कि ताइवान और चीन के बीच संबंध काफी नाजुक बने हुए हैं. ऐसे में वे भारत में ही रहना पसंद करेंगे. उन्होंने कहा, ‘मैं यहां भारत में शांति से रहना पसंद करूंगा.’ इस दौरान उन्होंने धार्मिक सद्भाव के केंद्र के रूप में भारत की काफी तारीफ भी की. कॉन्फ्रेंस में धर्म गुरु ने चीन की मौजूदा स्थिति, ताइवान के हालात समेत कई मुद्दों पर चर्चा की.

    ताइवान में बढ़े सैन्य तनाव को लेकर दलाई लामा ने कहा कि उन्हें लगता है कि यह द्वीप चीन की पुरानी संस्कृति और परंपराओं का सच्चा भंडार था, लेकिन अब इसका ‘बहुत राजनीतिकरण’ हो गया है. उन्होंने कहा, ‘आर्थिक रूप से ताइवान को चीन से बहुत मदद मिलती है.’ उन्होंने बताया, ‘और संस्कृति, बौद्ध समेत चीनी संस्कृति, मुझे लगता है कि चीन के भाई-बहन ताइवान के भाइयों और बहनों से काफी कुछ सीख सकते हैं.’

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    चीन हमारी सेना और मनोबल को कमजोर करने की कोशिश कर रहा: ताइवान
    ताइवान ने मंगलवार को कहा कि चीन सीधे सैन्य संघर्ष में उलझे बिना उसकी सैन्य क्षमताओं को कमजोर करके और लोगों की राय को प्रभावित करके द्वीप को अपने नियंत्रण में लेना चाहता है. ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने एक द्विवार्षिक रिपोर्ट में कहा कि चीन ताइवान पर दबाव बनाने के लिए ‘ग्रे जोन’ रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहा है. ‘ग्रे जोन’ रणनीति के तहत कोई विरोधी बड़े पैमाने पर सीधे संघर्ष से बचते हुए अपने हित साधने के लिए अप्रत्यक्ष तरीके से दबाव बनाता है. चीन ताइवान पर अपना दावा करता है.

    चीन सैन्य अभ्यास करके और द्वीप के निकट विमान भेजकर ताइवान के खिलाफ बल प्रयोग के अपने खतरों को बढ़ा रहा है. चीन ने अक्टूबर की शुरुआत में अपने राष्ट्रीय दिवस पर ताइवान के दक्षिण पश्चिम में 149 सैन्य विमान भेजे थे, जिसके बाद ताइवान को अपनी वायु रक्षा प्रणाली को सक्रिय करना पड़ा था. रिपोर्ट में कहा गया है कि यह ताइवान की वायुसेना को कमजोर करने के प्रयासों को दर्शाता है. उसने कहा कि चीन ताइवान के खिलाफ जो रणनीति अपना रहा है, उसमें साइबर युद्ध छेड़ना, दुष्प्रचार करना और ताइवान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने के लिए मुहिम चलाना शामिल है, ताकि ताइवान को कोई युद्ध किए बिना चीन की शर्तें मानने पर मजबूर किया जा सके.

    उल्लेखनीय है कि चीन और ताइवान 1949 के गृहयुद्ध में अलग हो गए थे. अमेरिका ने साम्यवादी चीन को मान्यता देने के लिए 1979 में ताइवान से औपचारिक कूटनीतिक संबंध खत्म कर दिए थे, लेकिन वह कानून के तहत यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि ताइवान अपनी रक्षा स्वयं कर सके और वह उसके प्रति सभी खतरों को गंभीर चिंता का विषय मानता है. (भाषा इनपुट के साथ)

    Tags: China-Taiwan, Dalai Lama, India

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