चौराहे पर दलित राजनीति: '85 बनाम 15' की 'मास्टर चाबी' से कांशीराम ने कैसे खोला राजनीतिक सत्ता का ताला

कांशीराम ने बसपा से पहले बामसेफ और DS4 दल भी बनाये थे
कांशीराम ने बसपा से पहले बामसेफ और DS4 दल भी बनाये थे

1980 में करीब दो महीने तक बिल्कुल ध्यान न दिये जाने के बावजूद कांशीराम (Kanshiram) का तूफान उत्तर भारत (North India) के करीब तीन दर्जन शहरों में चलता रहा.

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हालांकि राजनीति (Politics) में, जीवन (Life) की तरह ही हर अंत में एक शुरुआत (Beginning) छिपी होती है. और हर शुरुआत में एक अंत (End) छिपा होता है. कांग्रेस (Congress) के भी 1980 में सत्ता में वापसी करने के छह महीने बाद बदलाव का पहिया (wheels of change) फिर से घूमना शुरू हो गया.

उस साल अप्रैल में किसी समय, राजनीतिक कार्यकर्ताओं (Political Activists) का एक मिश्रित समूह उत्तर-प्रदेश और बिहार (Bihar) के बॉर्डर पर पहियों पर चल रहे अंबेडकर अभियान का स्वागत करने के लिए पहुंचा हुआ था. इस झांकी में डॉ बीआर अंबेडकर (Dr. BR Ambedkar) के जीवन और संघर्ष का प्रदर्शन किया गया था और सामाजिक आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से लगातार होने वाले भेदभाव को दिखाया गया था.

जनता पार्टी का प्रयोग हो चुका था असफल
BSP से अब अपनी राहें अलग कर चुके जगन्नाथ कुशवाहा याद करते हैं, "उस दिन बिहार के कैमूर जिले में मनिहार से चलकर चंदौली जिले पहुंचा था." कुशवाहा, तब मात्र 28 साल के थे और शोषित समाज दल नाम के एक राजनीतिक संगठन से कट चुके थे. SSD का नेतृत्व कट्टर समाजवादी राम स्वरूप वर्मा और बाबू जगदेव प्रसाद कर रहे थे.
वर्मा ने 1967 में चरण सिंह की सरकार में मंत्री के तौर पर काम किया था. प्रसाद, जो कि राम मनोहर लोहिया के शिष्यों में एक थे, उन्होंने बिहार की आक्रामक पिछड़ा राजनीति में अपनी एक विशेष जगह बनाई थी. वे जहानाबाद जिले से MLA थे और सितंबर, 1975 में एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए पुलिस की फायरिंग में मारे गये थे.



जनता पार्टी से निराश कार्यकर्ताओं ने थामा कांशीराम का दामन
1980 तक इमरजेंसी के बाद का जनता प्रयोग असफल हो चुका था और कुशवाहा जैसे राजनीतिक कार्यकर्ता अगले सहारे की तलाश में बह रहे थे. कुशवाहा कहते हैं, "जैसे ही हमने उत्तरप्रदेश में मान्यवर का स्वागत किया, यह कांशीराम के साथ मेरी पहली मुलाकात थी."

करीब दो महीने तक बिल्कुल ध्यान न दिये जाने के बावजूद कांशीराम का तूफान उत्तर भारत के करीब तीन दर्जन शहरों में चलता रहा. लखनऊ में, इलाहाबाद से आए एक युवा कॉलेज ग्रेजुएट ने, जब सामाजिक बदलावों पर उनका भाषण सुना तो वह प्रभावित हुआ. कुशवाहा की तरह, जंग बहादुर पटेल ने भी कांशीराम के कार्यकर्ता बनने का निर्णय लिया.

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कांशीराम ने बीएसपी से पहले बनाया बामसेफ और DS4
रक्षा अनुसंधान और विकास प्रयोगशाला (डीआरडीओ) पुणे के पूर्व कर्मचारी कांशी राम ने आखिरकार उत्तर भारत के दिल में राजनीति में एक अनूठा प्रयोग शुरू करने के लिए सड़क पर कदम रखा. 1970 में कांशी राम और उनके सहयोगियों ने पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी महासंघ या BAMCEF नाम का सरकारी कर्मचारियों के समर्थन का एक मजबूत नेटवर्क बुना था.

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एक साल बाद, काशी राम ने एक और कदम उठाया, एक दलित-राजनीतिक संगठन, दलित शोषित समाज संघर्ष समिति या डीएस4 नामक एक अर्ध राजनीतिक संगठन बनाया. 6 दिसंबर, 1984 को, डॉ. अंबेडकर की पुण्यतिथि पर DS4 को एक राजनैतिक पार्टी- बहुजन समाज पार्टी में बदल दिया गया. इसके बाद उन्होंने 85 बनाम 15 की ‘मास्टर की’ राजनीति आगे बढ़ाई.
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