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दिल्ली में गांधी, यूपी में यादव और अब महाराष्ट्र में ठाकरे... राजनीतिक परिवारों के लिए खतरे की घंटी

गांधी, यादव और अब ठाकरे, सबके सितारे इन दिनों गर्दिश में हैं. फाइल फोटो

गांधी, यादव और अब ठाकरे, सबके सितारे इन दिनों गर्दिश में हैं. फाइल फोटो

Political Families Facing Rejection: दिल्ली में गांधी, यूपी में यादव, पंजाब में बादल और महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार इन दिनों जनता के मोहभंग और अंदरूनी संकट से जूझ रहे हैं. क्या ये 'अक्षम' बेटों को कुर्सी सौंपने का मामला है या एक परिपक्व लोकतंत्र का संकेत है? क्या देश की बाकी राजनीतिक वंशवादी पार्टियां इनके अनुभवों से सबक लेंगी?

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नई दिल्ली. शिवसेना विभाजन के कगार पर खड़ी है. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अपने मंत्री-विधायक बेटे आदित्य ठाकरे के साथ इस संकट से पार पाने के लिए जूझ रहे हैं. शिवसेना के नौ मंत्री पहले ही बागी खेमे में शामिल हो चुके हैं. शिवसेना के 55 विधायकों में से लगभग 40 विधायक अपनी ही सरकार के खिलाफ गुवाहाटी में डेरा डाले हुए हैं. इस विद्रोह की वजह से पार्टी की अंदरूनी समस्याएं खुलकर सामने आ गई हैं. उत्तर की तरफ देखें तो अखिलेश यादव को जब से उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने कमान सौंपी है, वह एक के बाद एक हार का सामना कर रहे हैं. 2014, 2017, 2019 और अब 2022. ताजा मामला रामपुर और आजमगढ़ के लोकसभा उपचुनावों का है. यहां अखिलेश की पार्टी सपा को अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा है. इन चुनावों में अखिलेश एक बार भी प्रचार के लिए नहीं उतरे, इसके लिए उनके सहयोगी भी उन पर सवाल उठा रहे हैं.

थोड़ा आगे बढ़ें तो पंजाब में सुखबीर बादल को भी इसी तरह के उलटफेरों का सामना करना पड़ रहा है. 2014, 2017, 2019 और 2022 में उनकी पार्टी शिरोमणि अकाली दल पंजाब में सिमटती जा रही है. संगरूर लोकसभा उपचुनाव में तो अकाली दल उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई. 2007 से 2017 तक मुख्यमंत्री के रूप में प्रकाश सिंह बादल का समय अब बीते जमाने की बात लगता है.

वंशवाद से मोहभंग या नेताओं की अक्षमता?
क्या यह सब ‘अक्षम’ बेटों को कुर्सी सौंपने का मामला है या एक परिपक्व लोकतंत्र का संकेत है, जहां मतदाता वंशवाद की राजनीति से प्रभावित नहीं होते और वास्तव में इनसे नाराज हैं? या फिर, ये परिवार संचालित पार्टियां ऐसा लोकतांत्रिक सिस्टम नहीं बना पाईं, जो एकनाथ शिंदे जैसे वरिष्ठ नेताओं की आकांक्षाओं को समायोजित करता हो? प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक और News18 के स्तंभकार बद्री नारायण कहते हैं कि देश में इस वक्त मूड वंशवाद की राजनीति के खिलाफ है. इसके खिलाफ भाजपा की नीति लोगों को खूब पसंद आ रही है. नारायण कहते हैं, ‘परिवारवाद के खिलाफ नरेंद्र मोदी के आह्वान को लोगों ने हाथों हाथ लिया है. अब लोग खुलकर इसके खिलाफ बोलने लगे हैं.’

‘मोदी के आगे नेताओं का करिश्मा फेल’
लेकिन क्या ऐसा भी मामला हो सकता है कि ‘बेटों’ में पार्टी चलाने की क्षमता ही नहीं हो, इसलिए वोटर उन्हें खारिज कर दे रहे है? इस पर नारायण कहते हैं कि क्षमता का कुछ असर तो होता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में खराब काम किया था, खासकर अपने कार्यकाल के आखिरी दो वर्षों में. नारायण कहते हैं, ‘फैक्ट ये है कि मोदी-योगी की जोड़ी के रूप में इस समय यूपी में अखिलेश से बड़ी ताकत मौजूद है. वंशवाद के खिलाफ जनता में भावनाएं पहले भी रही हैं, लेकिन फिर लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं के करिश्मे ने उन्हें अपने पाले में कर लिया. करिश्मा इस समय बेअसर है क्योंकि दूसरे मजबूत विकल्प मौजूद हैं. लोगों का मोदी पर मजबूत भरोसा है.’

पार्टियों की अंदरूनी नाराजगी भारी पड़ी
वंशवाद की राजनीति के खिलाफ नाराजगी सिर्फ जनता के बीच ही नहीं बल्कि परिवार संचालित ऐसी पार्टियों के अंदर भी नजर आ रही है. शिवसेना के मामले से ये और भी स्पष्ट हो गया है. शिवसेना में अंदरखाने लंबे समय से तनाव चल रहा था. सरकार में आदित्य ठाकरे को तवज्जो दी जा रही थी. एकनाथ शिंदे भी आदित्य पर उनके पीडब्ल्यूडी और शहरी विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में दखल का आरोप लगा चुके थे. लगता है, ठाकरे परिवार की कांग्रेस और एनपीसी के साथ गठजोड़ की रणनीति ने उसके मूल आधार को नुकसान पहुंचाया है.

आजमगढ़ की हार से हिली सपा
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अंदर इस बात को लेकर कोई खुलकर सवाल नहीं उठा रहा है कि अखिलेश यादव ने आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव की लड़ाई के लिए एक ‘बाहरी’ और अपने चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को ही क्यों चुना. सपा के एक वरिष्ठ नेता के शब्दों में, ‘धर्मेंद्र यादव बदायूं से पिछला लोकसभा चुनाव हार गए थे, अखिलेश उन्हें फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे. हालांकि पहले प्रस्ताव ये था कि आजमगढ़ से अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव को मैदान में उतारा जाए.’

संकेतों की राजनीति पहुंचा रही चोट
आजमगढ़ से सपा की हार में वंशवाद को लेकर इस तरह की धारणाओं का भी योगदान माना जाता है. जहां बसपा के एक स्थानीय नेता गुड्डू जमाली ने सपा की उम्मीदों को बड़ी चोट पहुंचाई और बड़ी संख्या में वोट हासिल किए. अखिलेश का 2017 में कांग्रेस से चुनावी गठबंधन का असफल प्रयोग, 2019 में बसपा से हाथ मिलाना और 2022 में सिर्फ छोटी पार्टियों के बलबूते मैदान में उतरना, ये सभी फैसले सपा के लिए उलटे पड़ गए. चाचा शिवपाल यादव भी अखिलेश की रणनीतियों को खारिज करते हैं. शिवपाल कहते हैं, ‘हर कोई जानता है कि हम ये उपचुनाव क्यों हारे.’

पंजाब में बादल का सितारा डूब रहा
पंजाब में पार्टी के मजबूत आधार के बावजूद बादल का राजनीतिक सितारा लगातार डूब रहा है. हालिया विधानसभा चुनावों में बादल पिता-पुत्र दोनों की जोड़ी को हार का सामना करना पड़ा. सुखबीर बादल के एनडीए छोड़ने और तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन का समर्थन भी उन्हें फायदा नहीं दिला सका. सुखबीर बादल को पिता ने 2022 के विधानसभा चुनावों में सीएम फेस के रूप में पेश किया था, लेकिन पार्टी को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ गया.

क्या देश के बाकी राजनीतिक वंशवादी परिवार इन पार्टियों के ऐसे अनुभवों से सबक लेंगे और कुछ सुधार करेंगे? पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तेलंगाना में के. चंद्रशेकर राव को इस बारे में विचार करना चाहिए.

Tags: Congress, Samajwadi party, Shiromani Akali Dal, Shiv sena, Uddhav thackeray

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