कर्जमाफी: जानिए देश में कब हुई थी पहली बार किसानों की कर्जमाफी, क्या हैं फायदे और नुकसान

कर्जमाफी का वाद नेताओं के लिए चुनाव जीतने का ब्रह्मास्त्र बन चुका है. तत्कालिक लाभ के लिए किए गए इन चुनावी वादों को पूरा करने के लिए साल 2014 से अब तक राज्य सरकारों पर करीब 2 लाख 44 हजार करोड़ का अतरिक्त भार पड़ चुका है.

Anoop Pandey | News18Hindi
Updated: December 30, 2018, 3:25 PM IST
कर्जमाफी: जानिए देश में कब हुई थी पहली बार किसानों की कर्जमाफी, क्या हैं फायदे और नुकसान
प्रतीकात्मक तस्वीर
Anoop Pandey
Anoop Pandey | News18Hindi
Updated: December 30, 2018, 3:25 PM IST
चुनावी सीजन में राजनीतिक पार्टियां किसानों को खुश करने के लिए अक्सर कर्जमाफी का वादा करती हैं और चुनाव जीतने के बाद अपने इस वादे को निभाती भी हैं. हाल ही में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बनी कांग्रेस पार्टी की नई सरकार ने भी चुनावी वादे के मुताबिक किसानों के कर्जमाफी का एलान किया है. ऐसे में पूर्व के अनुभवों के आधार पर कुछ सवाल उभर कर सामने आ रहे हैं कि क्या कर्जमाफी किसानों की समस्या का स्थाई समाधान हो सकता है, कर्जमाफी के फैसलों का देश या प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा और सबसे अहम कि आज तक हुई कर्जमाफी से कितने किसानों की किस्मत बदली है.

किसानों की कर्जमाफी के इतिहास की बात करें तो सबसे पहले साल 1990 में वीपी सिंह की सरकार ने पूरे देश में किसानों का कर्ज माफ किया था. उस वक्त सरकार के खजाने पर करीब दस हजार करोड़ का अतरिक्त भार पड़ा था. इसके बाद साल 2008-09 के बजट में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने पूरे देश में किसानों के करीब 71 हजार करोड़ रुपए माफ करने का फैसला लिया था. जिसके बाद यूपीए की सरकार फिर से केंद्र की सत्ता पर आसानी से काबिज होने में सफल रही थी.



इसके बाद से तो किसानों के कर्जमाफी का वादा राजनितिक दलों के लिए सत्ता पाने का ब्रह्मास्त्र बन गया. साल 2014 से लेकर अबतक करीब दस राज्य सरकारें किसानों की कर्जमाफी का एलान कर चुकी हैं. इनमें सबसे पहले आंध्रपदेश ने 24 हज़ार करोड़ रुपए फिर तेलंगाना ने 17 हज़ार करोड़, साल 2016 में तमिलनाडु ने 6 हज़ार करोड़, साल 2017 में महाराष्ट्र ने 34 हज़ार करोड़, वहीं उत्तर प्रदेश ने 36 हज़ार करोड़ और पंजाब ने 1 हज़ार करोड़ रुपए की कर्जमाफी का एलान किया था. हाल की चुनी सरकारों की बात करें तो ये आकड़ा मध्य प्रदेश में 35 से 38 हजार करोड़ रुपए, छत्तीसगढ़ 6 हजार करोड़, और राजस्थान 18 हजार करोड़ रुपए हो सकता है. इस तरह देखें तो साल 2014 से अब तक राज्य सरकारों पर करीब 2 लाख 44 हजार करोड़ का अतरिक्त भार पड़ चुका है.

कर्जमाफी का फैसला कितना फायदेमंद, कितना नुकसानदायक-

किसानों की कर्जमाफी के फायदे और नुकसान को लेकर समय-समय पर देश में बहस होती रहती है. जानकारों का मानना है कि कर्जमाफी का फैसला राज्यों के वित्तीय संतुलन के लिए सही नहीं है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन पहले ही कर्जमाफी की योजना की आलोचना कर चुके हैं साथ ही नीति आयोग ने भी कर्जमाफी को किसानों की समस्याओं के हल के लिहाज से उचित नहीं माना है. ये बात सच है कि देश में किसानों की अनेक समस्याए हैं जिनमें मौसस की मार, फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलना और कर्ज भी शामिल है. कई बार तो देश के अन्नदाता को कर्ज नहीं चुका पाने पर आत्महत्या तक करनी पड़ जाती है.

कृषि क़र्ज़ से संबंधित एक पहलू यह भी है कि किसान जो कर्ज़ खेती के नाम पर लेता है उसका पूरा इस्तेमाल खेती को बढ़ावा देने के लिए नहीं करता है. अनुमान है कि किसान कृषि के नाम पर लिए गए कर्ज़ का तीन-चौथाई अपने नीजी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए करता है. कृषि से जुडे़ ज़्यादातर मामले राज्य सरकारों के दायरे में आते हैं. फिर भी ज़्यादातर राजनीतिक दल स्थायी समाधान पर ज़ोर देने की बजाय तत्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए कर्जमाफी का फार्मूला अपनाते हैं.

केवल बड़े किसानों को मिलता है लाभ-
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तत्कालिक राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर लिया गया कर्जमाफी के फैसले का असर देश और राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. माना जाता है कि इस तरह की क़र्ज़माफी का फायदा कुछ बड़े किसानों को ही मिल पाता है. छोटे किसानों पर इसका कोई असर नहीं होता है, क्योंकि बड़ा किसान कुछ हद तक कर्ज़ चुकाने में सक्षम होता है, और वही क़र्ज़ भी ले पाता है. जबकि छोटे किसानों को कर्जमाफी का कोई फायदा नहीं होता है. साथ ही राज्य की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है.

फिर क्या है समाधान-

अब सवाल यह उठता है कि अगर कर्जमाफी किसानों की समस्या का हल नहीं है तो फिर समाधान क्या है ? जानकारों का मानना है कि कर्ज़माफी की जगह किसानों के उपज की खरीद, उसके रख-रखाव के साथ ही कृषि उत्पादों की मार्केटिंग पर ध्यान देने की जरूरत है. कृषि के लिए जरूरी आधारभूत संरचना के साथ कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए. उत्पादन क्षति, सूखा, बाढ़, जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी किसानों की परेशानी के मुख्य कारण हैं. किसानों की आय बढ़ाने और खेती को लाभकारी बनाने के लिए किसानों की इन समस्याओं का स्थायी समाधान निकालने के उपायों की खोज करनी चाहिए.
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