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Explained: विदेशी जानवरों पर केंद्र की एडवाइजरी और उस पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर है कितनी अहम? ऐसे समझें

Explained: विदेशी जानवरों पर केंद्र की एडवाइजरी और उस पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर है कितनी अहम? ऐसे समझें

विदेशी जानवरों पर केंद्र की एडवाइजरी बेहद अहम है. ( प्रतीकात्‍मक फोटो)

विदेशी जानवरों पर केंद्र की एडवाइजरी बेहद अहम है. ( प्रतीकात्‍मक फोटो)

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने विदेशी जीवित प्रजातियों के आयात और उसे हासिल करने की प्रक्रिया को कारगर बनाया जाने के लिए जून 2020 में एडवाइजरी जारी की थी. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस एडवाइजरी अपना ठप्पा भी लगाया, ऐसे में जानते हैं इसके क्या मायने हैं, भारत में जीवों की तस्करी किस स्तर पर है और जानकार क्या कहते हैं.

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हाइलाइट्स

विदेशी जानवरों पर केंद्र की एडवाइजरी बेहद महत्‍वपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट ने भी एडवायजरी को सही ठहराया
केंद्र ने जून 2020 में एडवायजरी जारी की थी

कोविड के फैलने के साथ ही दुनिया भर में वन्यजीवों के गैरकानूनी व्यापार और ज़ूनोटिक यानी पशुओं के ज़रिए इंसानों तक पहुंचने वाली बीमारियों का ख़तरा बढ़ा है. इसी के मद्देनज़र वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने विदेशी जीवित प्रजातियों के आयात और उसे हासिल करने की प्रक्रिया को कारगर बनाया जाने के लिए जून 2020 में एडवाइजरी जारी की थी. मंत्रालय ने कहा था कि “विदेशी जीवित प्रजातियों” के आयात करने वाले इसकी स्वेच्छा से जानकारी दें. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस एडवाइजरी अपना ठप्पा भी लगाया, ऐसे में जानते हैं इसके क्या मायने हैं, भारत में जीवों की तस्करी किस स्तर पर है और जानकार क्या कहते हैं.

विदेशी जीवित प्रजातियों का मतलब क्या है?
मंत्रालय के मुताबिक़ विदेशी जीवित प्रजातियों का अर्थ, उस जीव या पौधे की प्रजाति जिसे उसकी असल जगह से नई जगह पर लाया जाए. द हिंदू के अनुसार पक्षियों, छोटे स्तनधारी, मछलियां, रेंगनेवाले जीव और यहां तक कि कुछ पौधे भी आयात किए जाते हैं. मंत्रालय ने विदेशी जीवित प्रजातियों को परिभाषित करते हुए कहा है कि “वही जानवर जिनका CITES ( The Convention of International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) के परिशिष्ट एक, दो और तीन में उल्लेख किया गया है.” (परिशिष्ट एक के हिसाब से कोई व्यापार नहीं हो सकता, परिशिष्ट दो के हिसाब जिनके व्यापार से पहले अनुमति लेनी होगी और परिशिष्ट तीन के हिसाब से वो जानवर और पक्षी जिनका बड़ी तादाद में लेन-देन हो सकता है.)

मंत्रालय ने ये फैसला क्यों लिया?
क्योंकि भारत में कई लोगों के पास CITES में उल्लेखित जीव हैं लेकिन केंद्रीय या राज्य स्तर पर इसकी एक जगह जुटी हुई जानकारी नहीं है.

परामर्श में क्या कहा गया है?
पर्यावरण मंत्रालय इन प्रजातियों को रखने वालों से अगले छह महीने में स्वैच्छिक जानकारी के ज़रिए इन जीवों के तादाद की जानकारी लेगी. साथ ही जानवरों के समूह, नए बच्चे और उनके आयात तथा लेन-देन को लेकर पंजीकरण करना होगा. इससे प्रजाति की देख-रेख बेहतर हो पाएगी और उसके मालिक की जीव की देखभाल, आवास और उसकी बेहतरी के अन्य पहलुओं पर बेहतर तरीके से मदद की जा सकेगी. इन ख़ास जीवों के डाटाबेस से ज़ूनोटिक बीमारियों को काबू करने और संभालने में मदद भी मिलेगी जिसे लेकर वक्त-वक्त पर दिशा दी जा सकेगी ताकि जानवर और इंसानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. मंत्रालय का कहना है कि घोषणा करने वाले को इन प्रजातियों से जुड़े दस्तावेज़ दिखाने की ज़रूरत नहीं अगर परामर्श जारी करने की तारीख के छह महीने के भीतर वह इसकी जानकारी दे चुका है. छह महीने के बाद की किसी जानकारी के लिए व्यक्ति को कानून के हिसाब से ज़रूरी दस्तावेज़ दिखाने होंगे. इस तरह की प्रजातियों के मालिकों को www.parivesh.nic.in पर जाकर जरूरी जानकारी भरनी होगी. Insight on India के मुताबिक विदेशी जीवित प्रजाति को आयात करने वाले व्यक्ति को परामर्श के प्रावधानों के तहत Directorate General of Foreign Trade (DGFT) से लायसेंस लेने के लिए आवेदन जमा करना होगा. आवेदन के साथ ही संबंधित राज्य के मुख्य वन्यजीव वार्डन के No Objection Certificate (NOC) को भी संलग्न करना होगा.

परामर्श का महत्व
ये परामर्श जिसमें स्वैच्छिक जानकारी योजना की तारीख बढ़ाकर 15 मार्च 2021 कर दी गई, उसमें क़रीब 30 हज़ार भारतीयों ने आवेदन दिया. ये जानकारी IndiaSpend की रिपोर्ट में सामने आई.
द हिंदू से हुई बातचीत में जानकारों ने इस कदम को सराहा और कहा कि इससे आयात पर नज़र रखने की प्रक्रिया बनेगी. वर्तमान में आयात DGFT के ज़रिए होते हैं और राज्य के वन्य विभागों को इसकी जानकारी नहीं होती. वन्यजीव से जुड़े अपराधों पर लगाम कसने वाली संस्था Wildlife Trust of India के Jose Louise का कहना है कि ‘इस कदम के ज़रिए वन्यजीव व्यापार में हालात बेहतर होंगे. अगर इन प्रजातियों को वन में छोड़ दिया जाए तो जंगल के माहौल में होने वाले असंतुलन और आक्रमणकारी प्रजातियों की वजह से ये विदेशी प्रजातियां समस्या बन सकती हैं. ऐसा पहली बार होगा कि CITES में उल्लेखित जानवरों को राज्य के वन विभाग जांचेंगे. पहले ये काम कस्टम अधिकारी करते थे. गैरकानूनी व्यापार पर लगाम कसे जाने का ये पहला कदम है.’

भारत में जानवरों की तस्करी का हाल
Mongabay के मुताबिक इन प्रयासों के बावजूद भारत में वन्यजीव की तस्करी जोरों पर है. Hindustan Times, के मुताबिक जून में उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी में दो अलग-अलग जगहों से तीन कंगारुओं को बचाया गया था. इसकी जांच चल रही है कि इन्हें देश में कैसे लाया गया. वेबसाइट के मुताबिक भारत की CITES सदस्यता और उससे जुड़े कड़े कानून (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972) जो कि देशीय पौधों, जानवरों और उससे जुड़े उत्पादों की 1800 प्रजातियों के व्यापार को प्रतिबंधित करती है लेकिन ये भी तस्करी पर लगाम कसने में असरदार नहीं है क्योंकि ये कानून और परामर्श कई बार सही ढंग से पहुंचाए या लागू नहीं किये जाते. जानकार कहते हैं कि भारत को इन ख़ास प्रजातियों के संरक्षण के लिए कड़े कानून चाहिए जिसकी कमी के चलते विदेशी जीव प्रजातियों की स्मगलिंग का काम जोर-शोर से चलता है.

World Wildlife Fund (WWF) के मुताबिक करीब 15 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष वाली वन्यजीव तस्करी, दुनिया का चौथा बड़ा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थित अपराध है ( ड्रग्स की स्मगलिंग, मानव तस्करी और जालसाज़ी के बाद). CITES का हिस्सा होने के बावजूद भारत का नंबर इस मामले में पहले 20 देशों में आता है और हवा के ज़रिए वन्यजीव तस्करी में तो शीर्ष 10 में इसका नंबर है.
Indian Express की मानें तो UN Environment Programme (UNEP) ने कहा है कि हाथी के दांत, पैंगोलिन की पपड़ी, शेर की खाल और भारतीय स्टार कछुए के हिस्से कुछ वन्यजीवों के हिस्से हैं जिन्हें भारत के एयरपोर्ट से ज़ब्त किया जा चुका है जो हवाई रास्ते के ज़रिए बढ़ती तस्करी का संकेत देता है. 2020 World Wildlife Report बताती है कि 1999-2018 के बीच वनस्पति और जीवों की 6000 प्रजातियां ज़ब्त की गई है.

Tags: Central government, Supreme Court

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