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अंटार्कटिका फतह करने वाली पहली महिला फॉरेस्ट अफसर, बीमारियों को हराते हुए बनीं मिसाल

अंटार्कटिका फतह करने वाली पहली महिला फॉरेस्ट अफसर, बीमारियों को हराते हुए बनीं मिसाल

फॉरेस्ट अफसर

फॉरेस्ट अफसर

दीप जे कॉन्ट्रेक्टर पहली महिला फॉरेस्ट अफसर और तीसरी अफसर हैं जिन्होंने अंटार्कटिका को फतह किया है. वह 4 भाषाओं की समझ रखती हैं. अभियान के दौरान जब उन्हें आर्थराइटिस डिटेक्ट हुआ या फिर अपेंडिसाइटिस का ऑपरेशन कराना पड़ा तो भी वह रुकी नहीं.

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महिला सशक्तिकरण के तमाम दावे तब सच साबित होते हैं, जब हमारे सामने दीप जे कॉन्ट्रेक्टर जैसी कहानी आती है. एक की उपलब्धि में हमें दो पीढ़ियों की तपस्या दिखती है. अंटार्कटिका को फतह करने वाली पहली महिला फॉरेस्ट अफसर की जिंदगी में पीछे जाते हुए 7वीं क्लास में पहुंचते हैं, जब उनके पिता का निधन हुआ और दो छोटी बेटियों की जिंदगी संवारने के लिए एक मां संघर्ष कर रही होती हैं. बच्चों को स्कूल से लाने के बाद घर में ताला लगाकर कंप्यूटर सीखने जाने वाली मां जो खुद तमाम संघर्ष करके थोड़े पैसे कमाती हैं और उससे बच्चों को पढ़ाती हैं, जो बड़ी होकर देश-दुनिया के लिए मिसाल बन जाती हैं.

दीप जे कॉन्ट्रेक्टर पहली महिला फॉरेस्ट अफसर हैं जिन्होंने अंटार्कटिका को फतह किया है. 38 साल की इस अफसर ने तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए एक मिसाल पेश की है. इस अभियान के दौरान जब उन्हें आर्थराइटिस डिटेक्ट हुआ या फिर अपेंडिसाइटिस का ऑपरेशन कराना पड़ा तो भी वह रुकी नहीं. कोरोना की तमाम लहरें भी उनके मनोबल को कमजोर नहीं कर पाईं और 2041 क्लाइमेट फोर्स अंटार्कटिका 2022 अभियान में सफल रहीं.

न्यूज-18 हिंदी से बात करते हुए वह कहती हैं, “मेरी एक दोस्त हैं चारुलता सोमल जो कि 2012 बैच की आईएएस अफसर हैं, उन्होंने इसके लिए मुझे प्रोत्साहित किया. वह पहले इस अभियान का हिस्सा रह चुकी हैं. सिर्फ अंटार्कटिका जाना, मुझे रोमांचित नहीं कर रहा था. लेकिन, जब मैं इसके बारे में पढ़ने लगी तो मुझे लगा यह बस एक यात्रा नहीं है. यह क्लाइमेट चेंज जागरूकता अभियान है. फिर क्या मैंने तैयारी शुरू कर दी.”

Deep j contractor

दीप जे

तैयारी के दौरान आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? इस पर वह कहती हैं, “सबसे जरूरी चीज थी फिटनेस. सेलेक्शन के समय बताया गया कि मॉडरेट लेवल फिटनेस चाहिए. मेरी उम्र 38 साल है. ऑफिस वर्क होने की वजह से एक नॉर्मल फॉरेस्ट ऑफिसर की जो फिटनेस होती है, वह मेरी थी. लेकिन, मैंने तय किया कि फिटनेस पर काम करूंगी. इसके लिए कोशिश शुरू की तो पता चला कि मुझे आर्थराइटिस है. डॉक्टर्स ने सुझाव दिया कि सावधानी से ट्रेनिंग करनी होगी. बेहतर तरीके से लाइफस्टाइल फॉलो करनी होगी. उनकी बताई एक्सरसाइज करनी होगी. मैंने इन सबको गंभीरता से लिया और प्रैक्टिस शुरू कर दी.

इसी बीच एक मेडिकल टेस्ट में मुझे अपेंडिसाइट्स डिटेक्ट हुआ. उसका ऑपरेशन कराना पड़ा और दो महीने रेस्ट किया. इसके बाद फिर से प्रैक्टिस शुरू की और अभियान के लिए निकल गई. हालांकि, इस दौरान भी ओमिक्रॉन वेरिएंट को लेकर तमाम सावधानी बरती गईं. शिप में प्रतिदिन कोविड टेस्ट होता था. तमाम सावधानियां बरतनी होती थीं.”

Deep J

दीप जे

दीप जे कॉन्ट्रेक्टर कहती हैं, “एक समय ऐसा लगा कि मेरी उम्र कम होती तो मैं ज्यादा फिट रहती. लेकिन, प्रैक्टिस के बाद इस सोच से आगे बढ़ गई. अंटार्कटिका के टेंपरेचर को लेकर भी चिंतित थी. मैं गुजरात से आती हूं. कर्नाटक में रह रही हूं. वहां स्वेटर भी कम ही पहनते हैं. लेकिन, अंटार्कटिका में टेंपरेचर माइनस 10-15 रहता है. विंड स्पीड भी 70-80 की रहती है. लेकिन, अपने अभियान के बाद ये समझ में आया कि आप प्रॉपर ट्रेनिंग के बाद शरीर और दिमाग को इतना फिट कर सकते हैं कि ये चुनौती ही नहीं लगती है. अब ऐसा कॉन्फिडेंस आ गया है कि कह सकती हूं कि किसी भी काम को किसी भी जेंडर और उम्र का व्यक्ति कर सकता है.”

मां रहीं रोल मॉडल
वह अपनी लाइफ जर्नी के बारे में बताती हैं, “मैं जब 7 साल की थी तो मेरे पिता का निधन हो गया. मेरी मां ने मुझे और मेरी बहन को बड़ा किया है. मां हमेशा से हमारी रोल मॉडल रही हैं. जब हम छोटे थे तो मां स्कूल से लाने के बाद हमें खिलाकर घर लॉक करके कंप्यूटर सीखने जाती थीं. फिर लौट कर हमारा होमवर्क कराती थीं. उन्होंने बहुत मेहनत की. उन्हीं को देखकर हम लोग ये समझ गए कि मेहनत का कोई अल्टरनेटिव नहीं है.”

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दीप जे

दीप जे कॉन्ट्रेक्टर ने बताया, “मैंने बैचलर्स सेंट जेवियर्स कॉलेज अहमदाबाद से जूलॉजी में कंप्लीट किया. इसके बाद मास्टर्स के लिए वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट्स ऑफ इंडिया देहरादून चली गई. मुझे पहले से वाइल्ड लाइफ और नेचर्स पसंद थे. मैं सोच रही थी कि मैं इसी में रिसर्च या टीचिंग जैसा कुछ करूंगी. इसी दौरान मेरी मां की तबीयत खराब हुई तो आगे पढ़ाई रोकनी पड़ी और मेरी दिल्ली में WWE (वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर इंडिया) में कंजर्वेशन बायोलॉजिस्ट की जॉब लग गई. एक साल बाद मैंने 2009 में दूसरे एनजीओ को ज्वाइन कर लिया.

इसी दौरान वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट के एक सीनियर ने IFS का एग्जाम क्लीयर किया. उनसे मेरी मुलाकात हुई तो उन्होंने इस एग्जाम के लिए मोटिवेट किया. पहले मैं सोचती थी कि मुझसे ये नहीं हो पाएगा. लेकिन, उन्होंने कहा कि थोड़ा बेहतर तरीके से तैयारी करोगी तो हो जाएगा. कम से कम एक चांस ले लो. मेरी मां सपोर्टिव थीं, लेकिन घर के लोग कहने लगे कि इंटरनेशनल एनजीओ में काम कर रही हो. ठीकठाक सैलरी है. इसके लिए छुट्टी लेनी होगी या जॉब छोड़नी होगा. लेकिन, मां ने बहुत सपोर्ट किया. 2010 में एग्जाम दिया और 11 में सेलेक्शन हुआ. इसके बाद देहरादून में ट्रेनिंग के दौरान हस्बेंड से मुलाकात हुई. वह कर्नाटक के हैं और वह भी 11 बैच के आईएफएस अफसर हैं. बाद में शादी के बाद मैं कर्नाटक आ गई और वहीं काम कर रही हूं.”

कैसे सीखी इंग्लिश और कन्नड
हमारी बातचीत इंग्लिश में शुरू हुई, लेकिन बाद में हिंदी तक पहुंच गई. भाषा पर आप कैसे काम कर पाईं, इस पर वह कहती हैं, “पिता की मृत्यु के बाद मां हमें बड़े स्कूल में एडमिशन कराने में सक्षम नहीं थीं तो उन्होंने पहले एक ट्रस्ट स्कूल में हमारा एडमिशन करा दिया. वह गुजराती मीडियम का था. वहां काफी वर्ष तक पढ़े. फिर नाना-नानी ने इंग्लिश मीडियम स्कूल के लिए सोचा. 9वीं में मां ने इंग्लिश मीडियम स्कूल में एडमिशन करवा दिया.

हमें गुजराती से सीधे इंग्लिश को कोप करने में प्रॉब्लम हो रही थी. लेकिन, नाना जी न्यूज पेपर पढ़ाते थे. इंग्लिश रेडियो चलाते थे. इंग्लिश गाने सुनाते थे. इसके बाद गुजराती से इंग्लिश का ट्रांजिशन हो गया. उसके बाद तो किसी भी लैंग्वेज को सीखने में बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ी. दिल्ली और देहरादून में रहने की वजह से हिंदी साफ हो गई. कन्नड में भी वही फॉर्मूला अपनाया. फिल्म देखना, गाने सुनना, पढ़ना. स्टाफ को भी कह रखा था कि आप लोग कन्नडा में ही बात करना. गलती होगी तो हंसना, मगर सिखाना. कन्नडा में ही बात करना. ऐसे में कन्नड में भी एक्सपर्ट हो गई हूं. ऑफिस का सारा काम इसी भाषा में होता है.”

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दीप जे

वहां जाने के बाद क्लाइमेट चेंज को लेकर एक नया नजरिया बना. इसके बारे में बेहतर जानकारी हुई. दुनियाभर से हर उम्र के लोग आए थे. उनकी अपनी समझ थी. उन्हें जाना-समझा. अंटाकर्टिका की सारी आइस तेजी से मेल्ट हो रही है. इसका असर समुद्र के लेवल पर भी पड़ रहा है. इसका असर भारत में भी देखने को मिलेगा. जब अंटाकर्टिका में हम लैंड पर जाते थे और शिप पर वापस लौटते थे तो साइंटिस्ट हमसे क्लाइमेट चेंज पर बात करते थे. वर्कशाप से क्लाइमेंट चेंज पर एक्सपीरियंस बढ़ा है और दूसरे देश इस पर कैसे काम कर रहे हैं, वह भी जानने को मिला. ओवरऑल देखें तो मेरे लिए ये बहुत ही बड़ा एक्सपीरियंस था.

Tags: Climate Change, Environment news, Inspiring story, News18 Hindi Originals

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