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दिल्ली चुनाव: फ्री बिजली-पानी मुफ्तखोरी नहीं अधिकार, दूसरे राज्य भी देते हैं ये सारी सुविधाएं

दिल्ली चुनाव: फ्री बिजली-पानी मुफ्तखोरी नहीं अधिकार, दूसरे राज्य भी देते हैं ये सारी सुविधाएं

परिणाम आने के बाद हारे हुए राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि यह कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी ने मुफ्तखोरी की योजनाओं के बल पर यह चुनाव जीता है. आखिर इस बयान का संवैधानिक सच क्या है?

परिणाम आने के बाद हारे हुए राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि यह कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी ने मुफ्तखोरी की योजनाओं के बल पर यह चुनाव जीता है. आखिर इस बयान का संवैधानिक सच क्या है?

परिणाम आने के बाद हारे हुए राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि यह कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी ने मुफ्तखोरी की योजनाओं के बल पर यह चुनाव जीता है. आखिर इस बयान का संवैधानिक सच क्या है?

दिल्ली में विधान सभा चुनाव (Delhi Assembly Elections) के परिणाम आ गए हैं. इन परिणामों को आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) की मुफ्तखोरी की योजनाओं के प्रभाव के रूप में स्थापित किया जा रहा है. भारतीय लोकतंत्र और राजनीति की यह विडंबना है कि यहां के राजनीतिज्ञों ने नागरिकों और संवैधानिक व्यवस्था के अपमान का संकल्प ले रखा है.

वास्तविकता यह है कि भारत के संविधान के मूलभूत अधिकारों में जीवन, शिक्षा, समानता, न्याय और शोषण से मुक्ति के अधिकार को शामिल किया गया. यदि इन अधिकारों का हनन होता है तो कोई भी नागरिक न्यायपालिका के समक्ष जा सकता है और अदालत राज्य को इन अधिकारों का संरक्षण करने पर बाध्य कर सकती है. इसके साथ ही संविधान का दूसरा हिस्सा है राज्य की नीति निदेशक तत्वों का. इनमें छोटे बच्चों की देखरेख, स्वास्थ्य, पोषण, नागरिकों के जीवन स्तर को उठाना, मादक पेयों के प्रसार पर पाबंदी आदि विषय शामिल किये गए हैं.

अदालत के जरिये हासिल नहीं किए जा सकते नीति निदेशक तत्व
उल्लेखनीय है कि नीति निदेशक तत्वों को अदालत के जरिये हासिल नहीं किया जा सकता है. इनके बारे में अनुच्छेद 37 में यह कहा गया था कि नीति निदेशक तत्व अदालत में प्रवर्तनीय नहीं है किंतु देश के शासन में मूलभूत हैं और क़ानून/नीति/योजनाएं बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा. इनके पीछे जनकल्याणकारी राजनीति को स्थान दिलाना अहम मकसद था. डॉ. भीम राव आम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि "यदि कोई सरकार इनकी अवहेलना करेगी तो उसे निर्वाचन के समय मतदाताओं को उत्तर देना होगा. इस हिसाब से विपक्ष के हाथ में भी यह एक अस्त्र का कार्य करेगा, जिससे वे सरकार की आलोचना कर सकें कि सरकार ने जनकल्याणकारी नीतियां नहीं बनाईं."

जो मुफ्तखोरी के मुहावरे को स्थापित कर रहे हैं, यहां उन लोगों से प्रश्न है कि आप लोग तीर्थ यात्राओं के लिए सरकारी खर्चे का विरोध कीजिए ताकि वह राशि बच्चों को कुपोषण से बचाने में खर्च की जा सके; आप लोग उस विचार का प्रतिरोध करने की हिम्मत जुटाइए, जो यह मानता है कि स्कूलों को ख़त्म करके मंदिर-मस्जिद-विशालकाय मूर्तियां स्थापित करवाना सरकार का कर्तव्य है.



भाजपा और कांग्रेस ने भी की थीं ये घोषणाएं
चुनाव के परिणामों से परे जाकर, अपनी तार्किक बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि इसी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने भी बिजली की 200 यूनिट मुफ्त देने, 20 हज़ार लीटर मुफ्त पानी देने, छात्रों को साइकिल, छात्राओं को इलेक्ट्रिक स्कूटी मुफ्त देने सरीखे वायदे किए थे. कांग्रेस ने 10 हज़ार लीटर पानी बचाने वाले परिवार को तीन हज़ार रुपये नकद देने की बात कही थी. जो चुनाव हार गए, वे खुद इन विषयों के खिलाफ हो गए.

वास्तव में आज पूरी दुनिया में यही सवाल बार-बार पूछा जा रहा है कि राष्ट्र और समाज का निर्माण करने के लिए सबसे जरूरी क्या है? बच्चों की शिक्षा, लोगों का स्वास्थ्य, पीने का पानी, मजदूरों के हकों की सुरक्षा; या मज़हब के नाम पर हिंसक टकराव, लैंगिक हिंसा, शिक्षण संस्थाओं पर हमले और समाज में आतंक का विस्तार! यह निर्णय लोकतंत्र में चुनावों के जरिए ही हो सकता है. ऐसा ही एक निर्णय दिल्ली में हुआ भी है.

इस संदर्भ में आधुनिक भारत की राजनीति में दिल्ली के विधानसभा चुनाव का उदाहरण एक आदर्श है. जहां आम आदमी पार्टी ने मूलभूत अधिकारों और नीति के निदेशक तत्वों को अपनी सियासत के केंद्र में रखा और विभाजनकारी, बर्बर-हिंसक भावनाओं को भड़काने वाली चुनावी राजनीति से मुकाबला किया. एक तरफ तो इस चुनाव में साम्प्रदायिक विद्वेष को भड़काने की न केवल कोशिशें की गईं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से हिंसा को भी भड़काने का प्रयास किया गया, किन्तु आम आदमी पार्टी ने बहुत संयम दिखाया और विभाजनकारी राजनीति के जाल में फंसने से खुद को सुरक्षित रख पाई.

परिणाम आने के बाद हारे हुए राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि यह कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी ने मुफ्तखोरी की योजनाओं के बल पर यह चुनाव जीता है. आखिर इस बयान का संवैधानिक सच क्या है? आखिर आम आदमी पार्टी ने किस तरह की नीतियों को लागू किया, जिन्होंने नकारात्मक राजनीति को पीछे धकेल दिया?

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर दिल्ली का हाल
परमानंद, रामलुभाया और पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति आदि प्रकरणों में उच्चतम न्यायालय ने स्वास्थ्य के अधिकार को संविधान में दर्ज जीवन जीने के मूलभूत अधिकार के साथ परिभाषित किया है. दिल्ली के सरकार ने नागरिकों को 10 से 15 हज़ार की जनसंख्या के स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं (बुखार, सांस का संक्रमण, डायरिया, चोटें लगना, जलना, त्वचा की समस्या आदि) उपलब्ध करवाने के लिए मोहल्ला क्लीनिक की व्यवस्था लागू की और यह तय किया कि दिल्ली के नागरिकों को दुर्घटना की स्थिति में पूरा उपचार उपलब्ध करवाया जाएगा.



यहां 212 तरह की जांचें और 109 तरह की दवाएं प्रदान किए जाने की व्यवस्था है. अभी की स्थिति में दिल्ली में 450 मोहल्ला क्लीनिक संचालित हो रहे हैं, जिन्हें मार्च 2020 तक 1000 की संख्या तक पहुंचाने का लक्ष्य है. इसके माध्यम से तौर में 700 से 1000 मीटर के दायरे में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं. पिछले तीन साल के अनुभव बताते हैं कि इन स्वास्थ्य केंद्रों में हर रोज़ औसतन 70 से 75 लोग सेवाएं प्राप्त करने आते हैं. यहां से गरीब परिवारों और मध्यमवर्गीय परिवारों ने सेवाएं हासिल कीं.

दिल्ली सरकार की पहल का हुआ ये असर
दिल्ली सरकार की इस पहल का मुख्य असर यह हुआ कि आर्थिक कारणों या अन्य व्यवस्थागत कारणों से जो लोग स्वास्थ्य सेवाएं हासिल नहीं कर पाते थे, उन्हें ये सेवाएं मिल पाईं. वैश्विक स्तर पर एक व्यक्ति इलाज़ के लिए वर्ष में तीन बार स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल या डॉक्टर के पास जाता है, भारत में यह औसत एक वर्ष में एक बार स्वास्थ्य सेवा हासिल करने का है. दिल्ली में स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव का असर यह हुआ कि एक व्यक्ति वर्ष में 5-7 बार डॉक्टर के पास जा पाया.

दिल्ली सरकार ने एक मोहल्ला क्लीनिक की स्थापना पर 20 लाख रुपये खर्च किए. एक साल में 90 लाख रुपये इनके संचालन पर खर्च होते हैं, जहां करीब 20 हज़ार मरीजों का उपचार किया जाता है. वर्ष 2019-20 में दिल्ली सरकार ने 60 हज़ार करोड़ रुपये के बजट में से स्वास्थ्य पर कुल 8549 करोड़ रुपये खर्च किए. दिल्ली सरकार ने कुल बजट में से स्वास्थ्य पर 13.8 प्रतिशत आवंटित किया. जबकि अन्य राज्य औसतन 5.2 प्रतिशत ही आवंटित करते हैं.

सवाल यह है कि क्या दिल्ली सरकार को नागरिकों के स्वास्थ्य और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए पहल नहीं करनी चाहिए थी?

शिक्षा को लेकर क्या हुआ, क्या किया

जो सरकार अपने कुल बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च करती हो, क्या उसे संवैधानिक मूल्यों पर विश्वास करने वाली सरकार नहीं माना जाना चाहिए? आम आदमी पार्टी ने पिछली बार 500 नए स्कूल बनाने का वायदा किया था, पर जगह की कमी के कारण केवल 30 नए स्कूल बन पाए. लेकिन सरकार ने विकल्प खोजा और मौजूदा स्कूलों में 8000 नए कमरों का निर्माण करवा दिया. सभी स्कूलों में ढांचागत विकास के काम हुए.

शिक्षकों और प्राचार्यों को नए सिरे से प्रशिक्षण दिलवाया गया. कई शिक्षकों को प्रशिक्षण लेने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, सिंगापुर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन, आईआईएम भेजा गया. इस पर 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए, परंतु सरकारी शिक्षकों में नवाचार करने का विश्वास पनपा. शिक्षा के अधिकार के क़ानून में दर्ज शाला प्रबंधन समिति के प्रावधान को लागू करते हुए नियमित बच्चों के पालकों से न केवल नियमित संवाद की व्यवस्था स्थापित की, बल्कि हर समिति के लिए 5 से 7 लाख रुपये के बजट का प्रावधान भी किया. यहां 12वीं कक्षा तक की शिक्षा मुफ्त कर दी गई.

निजी स्कूल छोड़ सरकारी स्कूल में आए बच्चे
सरकारी स्कूलों में सतर्कता रखने के लिए कैमरे लगाए गए. वर्ष 2018 में दिल्ली सरकार के स्कूलों में निजी-महंगे-प्रचार पर पनपे स्कूलों की तुलना में बेहतर परिणाम आया. इस साल 90.68 प्रतिशत बच्चे उत्तीर्ण हुए, जबकि निजी स्कूलों में 88.35 प्रतिशत बच्चे उत्तीर्ण हुए थे. एक साल में 900 बच्चों ने बड़े निजी स्कूलों को छोड़ कर सरकारी स्कूलों में दाखिला लिया.

आम आदमी पार्टी की सरकार ने निजी स्कूलों में अनियंत्रित फीस वृद्धि पर भी नियंत्रण किया. सरकार ने पालकों को 330 स्कूलों से 32 करोड़ रुपये की बढ़ी हुई फीस स्कूलों से वापस भी करवाई.

अब सरकार खुशहाली, देशभक्ति, संविधान सरीखे विषयों को शिक्षा का आधार बना रही है. नई तकनीकों को सीखने, समस्याओं के हल खोजने की क्षमता विकसित करने के लिए विशेष पहल की जा रही है. उच्च शिक्षा पर भी दिल्ली सरकार ने महत्वपूर्ण पहल करते हुए प्रतिभाशाली छात्रों की 100 प्रतिशत फीस चुकाई, कमज़ोर तबकों के बच्चों की 25 से 50 प्रतिशत फीस माफ़ की.

दिल्ली सरकार ने राज्य के बजट में से 27.8 प्रतिशत शिक्षा के लिए आवंटित किया, जबकि अन्य राज्य अधिकतम 15.9 प्रतिशत ही आवंटित करते हैं.

शिक्षा का अधिकार समाज निर्माण का मूलभूत आधार भी है और संविधान का मूलभूत अधिकार भी. क्या शिक्षा पर सरकारी व्यय करना अनुचित राजनीति मानी जाए?

बिजली फ्री करने का क्या है आधार
दिल्ली में राज्य सरकार ने यह नीति बनाई है कि 200 यूनिट के बिल तक उपभोक्ता से कोई राशि नहीं ली जाएगी और 201 से 400 यूनिट तक के बिजली के बिल पर 50 प्रतिशत की रियायत दी जाएगी. ये वह तबका है, जो निम्न आय वर्ग और निम्न मध्यम आय वर्ग में शामिल है, जिसकी पारिवारिक आय 3 लाख रुपये के आसपास है. भारत में केंद्र सरकार ने 8 लाख रुपये तक की आय वाले परिवारों को आरक्षण देने के लिए नीति बनाई है.



अगर अपनी स्मरण शक्ति पर थोड़ा जोर डालेंगे तो याद आएगा कि जब दिल्ली में वर्ष 2015 में नई सरकार बनी थी, तब उसने विद्युत वितरण कंपनियों के ऑडिट की प्रक्रिया शुरू की थी, किन्तु बलशाली कंपनियों ने बड़े सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के सहयोग से उस प्रक्रिया को रुकवा लिया था. वास्तविकता तो यह है कि दिल्ली सरकार ने बिजली कंपनियों की मुनाफाखोरी करने वाली कंपनियों को नियांत्रित करने की नीति अपनाई.

अन्य राज्यों में बिजली के लिए हुआ इतना आवंटन
दिल्ली सरकार ने वर्ष 2019-20 में बिजली सब्सिडी के लिए 1720 करोड़ रुपये आवंटित किए. लेकिन जरा यह भी जान लीजिए कि उत्तर प्रदेश में सकल बिजली रियायत के लिए 11 हज़ार करोड़ रुपये, कर्नाटक में 11048 करोड़ रुपये, तमिलनाडु में 8000 करोड़ रुपये, पंजाब में 8000 करोड़ रुपये, मध्य प्रदेश में 4000 करोड़ रुपये आवंटित किए जाते हैं. वास्तव में बिजली के अर्थशास्त्र की बुनियाद में भ्रष्टाचार के अलंगे भरे पड़े हैं, जिसके कारण 3 रुपये प्रति यूनिट की बिजली सरकार को 10 रुपये प्रति यूनिट पड़ती है. अगर यह कीमत किसानों, उद्योगों और आम लोगों से वसूल करनी पड़े तो यह तय है कि लोगों के जीवन में बिजली व्यय का हिस्सा एक चौथाई तक पहुंच जाएगा.

ऊर्जा पर दिल्ली सरकार ने कुल बजट का 3.3 प्रतिशत हिस्सा आवंटित किया, जबकि अन्य राज्य 5.2 प्रतिशत ही आवंटित करते हैं.

फ्री पानी की क्या है कहानी
दिल्ली में 20 हज़ार लीटर पानी की आपूर्ति के लिए कोई शुल्क नहीं किया जाता है. यह एक बुनियादी जरूरत भी है. इससे ज्यादा उपभोग होने पर तय था कि पूरी मात्रा पर जल शुल्क लिया जाएगा. यानी 21000 लीटर होने पर पूरे 21000 लीटर का शुल्क. वर्ष 2019-20 में दिल्ली सरकार ने पानी के लिए कुल 1340 करोड़ रुपये का आवंटन किया, जो कि कुल बजट का 2.23 प्रतिशत हिस्सा था. इतना ही हिस्सा देश के ज्यादातर राज्य आवंटित करते हैं. इसमें से भी सब्सिडी के लिए 468 करोड़ रुपये का ही प्रावधान था.

पानी और स्वच्छता पर दिल्ली राज्य के कुल बजट का 2.5 प्रतिशत भाग आवंटित किया गया, जबकि अन्य राज्य भी लगभग इतना ही (2.4 प्रतिशत) व्यय करते हैं.

मजदूर की मजदूरी
दिल्ली में पिछले दो सालों में एक और महत्वपूर्ण पहल हुई है. दिल्ली सरकार ने अकुशल श्रम की न्यूनतम मासिक मजदूरी 14842 रुपये, अर्ध कुशल श्रम की मासिक मजदूरी 16341 रुपये और कुशल श्रम की न्यूनतम मासिक मजदूरी 17991 रुपये अधिसूचित की थी. इस निर्णय के खिलाफ नियोक्ताओं के 44 संगठनों ने उच्च न्यायालय में याचिक दाखिल की और न्यायालय ने नई दरों को लागू नहीं करने दिया. दिल्ली सरकार ने इसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी और श्रमिकों के पक्ष में निर्णय करवाया. बात केवल कागज़ पर मजदूरी तय करने तक सीमित नहीं रही, इस पर सघन कार्रवाई भी की गई. 1373 ऐसे ठेकेदार हटाए गए, जो न्यूनतम मजदूरी का भुगतान नहीं कर रहे थे और 100 नियोक्ताओं के खिलाफ न्यूनतम मजदूरी क़ानून के तहत कार्रवाई भी की गई. भारत में मजदूरी की सबसे अधिक राशि दिल्ली में है.

हमें यह सोचना चाहिए कि आज जब राजनीतिक हितों के लिए, जब जनहित की आहुति दी जाती है, तब समाज को इस तरह की राजनीति का प्रतिकार कैसे करना चाहिए? डॉ. आम्बेडकर ने इसका रास्ता सुझाया था - चुनाव में सही निर्णय लेकर.

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Tags: Aam aadmi party, AAP, Arvind kejriwal, BJP

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