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दिल्ली विधानसभा चुनाव: विवादित बयानों पर आखिर क्या कर सकता है चुनाव आयोग!

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020- नेताओं के विवादित बयान

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020- नेताओं के विवादित बयान

देश में चुनाव दर चुनाव विवादित बयानों की संख्या बढ़ती जा रही है. खास बात ये है कि चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही चुना ...अधिक पढ़ें

नई दिल्ली. दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly Elections) में मुद्दों से ज्यादा चर्चा नेताओं के बयानों की है. नेता एक के बाद एक विवादित बयान दिये जा रहे हैं. चुनाव आयोग (Election Commission) ये तो मानता है कि इन नेताओं के बयान गलत हैं और उन्हें रोकने की जिम्मेदारी भी चुनाव आयोग की है, लेकिन चुनाव आयोग नोटिस और एफआईआर से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहा. संभवतः इसीलिए देश में चुनाव दर चुनाव विवादित बयानों की संख्या बढ़ती जा रही है. खास बात ये है कि चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की खबरें आने लगती हैं. आचार संहिता का दायरा सिर्फ भाषणों तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि चुनाव प्रचार के तरीकों, चुनाव में पैसा बांटने, देर तक सभा करने जैसे तमाम ऐसे आदेश हैं जिनकी धज्जियां उड़ाने में राजनीतिक दल हों या नेता कभी नहीं कतराते. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनाव आयोग शक्तिविहीन है या फिर वह बड़े नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई करना ही नहीं चाहता!

आयोग के नोटिस और एफआईआर से क्यों नहीं डरते नेता
चुनाव आयोग चुनाव के दौरान पार्टियों और नेताओं को नोटिस जारी करता है, कुछ मामलों में एफआईआर भी दर्ज कराई जाती है, लेकिन उसके बाद क्या इन मुकदमों पर कोई कार्रवाई होती है! यदि नहीं होती, तो कार्रवाई कराने की जिम्मेदारी किसकी है? चुनाव आयोग को इन मुदकमों की याद तब आती है, जब अगला चुनाव होता है. यानी 5 साल तक इन मुकदमों की पैरवी करने वाला कोई नहीं होता, जिससे ज्यादातर मामले खत्म हो जाते हैं. एक आरटीआई के जवाब में चुनाव आयोग ने साफ-साफ बताया था कि आयोग के पास चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े आंकड़ों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है. जरूरत पड़ने पर जिलों से रिकॉर्ड मांगे जाते हैं.

इतना कमजोर क्यों है चुनाव आयोग!
दरअसल, चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन पर सजा का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. सजा या मुकदमा आचार संहिता के साथ-साथ उन मामलों में दर्ज होता है, जो आईपीसी की धाराओं में अपराध हैं और पुलिस भी उसी तरह कार्रवाई करती है. किसी-किसी मामले में चुनाव अधिकारी को आर्थिक दंड देने का अधिकार है, लेकिन चुनाव लड़ रहे नेताओं पर इस आर्थिक दंड का कोई असर नहीं होता. आचार संहिता की शिकायत मिलने के बाद चुनाव आयोग सबसे पहले उस पर सफाई मांगता है और ज्यादातर मामलों में सफाई के बाद ही मामला खत्म हो जाता है.

आचार संहिता का उल्लंघन करने पर कार्रवाई
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी के अनुसार ऐसा नहीं है कि चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में कार्रवाई नहीं होती. उनकी मानें तो चुनाव आयोग लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (THE REPRESENTATION OF THE PEOPLE ACT, 1951) के तहत आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के साथ-साथ कई ठोस कार्रवाई करता है. हालांकि चुनाव खत्म होने के बाद इन मुकदमों के आगे की पैरवी और आंकड़े इकठ्ठा करने के सवाल पर कुरैशी का कहना है कि चुनाव आयोग के पास अपना कोई कर्मचारी नहीं होता और चुनाव के समय राज्य सरकार के कर्मचारी डेपूटेशन पर आते हैं, जो चुनाव के बाद वापस चले जाते हैं. ऐसे में चुनाव के बाद चुनाव आयोग के पास उनको निर्देश देने का अधिकार ही नहीं होता. इन हालात में इन मुकदमों के आगे की पैरवी करना आयोग के लिए संभव नहीं होता.

सिर्फ इस मामले में चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का है अधिकार
हालांकि आय-व्यय का ब्योरा न देने पर आयोग के पास नेताओं पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का अधिकार है, लेकिन आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में ऐसा कोई अधिकार नहीं है. लेकिन जो एक बात तय है और हर चुनाव में दिखती है वो ये कि चुनाव आचार संहिता का भय तो दिखता है, लेकिन उसके उल्लंघन के तमाम मामले भी होते रहते हैं और कार्रवाई के नाम पर सबकुछ सिफर ही रह जाता है. खासतौर से बड़ी पार्टियां और बड़े नेता आचार संहिता के शिकंजे में कम ही आते हैं.

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Tags: Controversial Statements, Delhi Election 2020, Election commission

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