दिल्‍ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- फेसबुक और उसके अफसर यह तय नहीं कर सकते कि उन्‍हें कहां पेश होना है

फेसबुक मामले में दिल्‍ली सरकार ने दाखिल किया हलफनामा.
फेसबुक मामले में दिल्‍ली सरकार ने दाखिल किया हलफनामा.

दिल्‍ली सरकार ने अजीत मोहन और फेसबुक की एक याचिका के जवाब में अपना हलफनामा दायर किया है. इस याचिका में कहा गया है कि दिल्ली दंगों के कुछ पहलुओं पर गौर करने वाली दिल्ली विधायी समिति मोहन को दिखाने और गवाही देने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 7, 2020, 3:47 PM IST
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नई दिल्‍ली. फेसबुक (Facebook) से जुड़े एक मामले में दिल्‍ली सरकार (Delhi Government) ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) से कहा कि समन के बाद किसी गवाह का उपस्थित न होना भी विधायी कार्य में एक बाधा है. दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में फेसबुक और उसके प्रबंध निदेशक अजीत मोहन की आलोचना की. सरकार की ओर से कहा गया कि भारत में किस कानून का पालन करना है और किसका चयन करना है यह फेसबुक और उसके अफसर तय नहीं कर सकते.

दिल्‍ली सरकार ने अजीत मोहन और फेसबुक की एक याचिका के जवाब में अपना हलफनामा दायर किया है. इस याचिका में कहा गया है कि दिल्ली दंगों के कुछ पहलुओं पर गौर करने वाली दिल्ली विधायी समिति मोहन को गवाही देने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है. जबकि फेसबुक की याचिका में चुप रहने के अधिकार पर जोर दिया गया है. दिल्ली सरकार ने इसे तुच्छ और गलत कहा है. कहा गया है कि उन्‍हें गवाह तौर पर बुलाने के लिए एक विधायी समिति के अधिकारों पर वह सवाल उठा रहे हैं. यह बताया कि मोहन कुछ अन्य मुद्दों पर संसद में पहले ही बयान दे चुके हैं. फेसबुक के प्रतिनिधि नियमित रूप से दुनिया भर की विधानसभाओं में भी पेश हो चुके हैं. इसमें अमेरिका भी शामिल है, जहां इस सोशल नेटवर्किंग कंपनी का कॉरपोरेट ऑफिस है.





वकील शादान फरासत की ओर से दाखिल किए गए राज्‍य सरकार के हलफनामे में कहा गया है, 'इसलिए वर्तमान तथ्यों में कुछ मौलिक अधिकारों को दबाने और संलग्न करने का प्रयास प्रारंभिक तौर पर संदिग्‍ध है. यह वास्तविक या बोनाफाइड नहीं है, और दावा किया गया मौलिक अधिकार वर्तमान तथ्यों के साथ मेल नहीं खा रहे हैं. याचिकाकर्ताओं को यह तय करने और चुनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है कि वे किस संवैधानिक रूप से सशक्‍त निकाय के सामने पेश होंगे.'
मोहन के चुप रहने के अधिकार के बारे में दिल्ली सरकार ने कहा कि इस तरह के अधिकार केवल आपराधिक सुनवाई या कार्यवाही में मान्‍य हैं, जहां आत्महनन को हतोत्साहित करना है, लेकिन उस जैसे किसी को नहीं जिसे गवाह के रूप में बुलाया गया है. दिल्‍ली सरकार ने यह भी मांग की कि मोहन निजता के मामले में अकेले छोड़ दिए जाने के अपने अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं.

हलफनामे में कहा गया है कि अकेले रहने का अधिकार एक गवाह के लिए उपलब्ध नहीं है. निजता का अधिकार वर्तमान तथ्यों में बिल्कुल समाहित नहीं है. यह पूरी तरह से अकल्पनीय है कि किसी कंपनी के प्रतिनिधि को सार्वजनिक प्रभाव के संबंध में बताने के लिए कैसे बुलाया जाए. हलफनामे में आगे कहा गया है कि शांति और सद्भाव समिति पुलिसिंग और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों की जांच कर रही है, जो विशेष रूप से राष्‍ट्रीय राजधानी में केंद्र सरकार के तहत हैं.
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