अहीर रेजीमेंट के बहाने उठी ‘चमार रेजीमेंट हक़ है हमारा’ की आवाज, लेकिन क्या सोचती है मोदी सरकार?

अहीर रेजीमेंट के बहाने उठी ‘चमार रेजीमेंट हक़ है हमारा’ की आवाज, लेकिन क्या सोचती है मोदी सरकार?
इस रेजीमेंट को बहाल करने की मांग उठ रही है

आखिर अंग्रेजों ने क्यों खत्म कर दी थी चमार रेजीमेंट? इसके लड़ाकों की देशभक्ति की पूरी कहानी बता रहे हैं जेएनयू में इस विषय के रिसर्चर सतनाम सिंह

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नई दिल्ली. आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की बेटी और मुलायम सिंह के परिवार की बहू राज लक्ष्मी ने ट्विटर (Twitter) पर अहीर रेजीमेंट हक है हमारा हैशटैग के साथ यादव समाज की बड़ी इमोशनल मांग को फिर से हवा दे दी. लेकिन इसके कुछ ही देर बाद जवाब में अनुसूचित जाति के भी लोग उतर गए. उन्होंने ‘चमार रेजीमेंट हक़ है हमारा’ हैशटैग के साथ अपनी वर्षों पुरानी मांग उठा दी. सोमवार शाम तक इसके 46 हजार से अधिक ट्विट हो चुके थे. भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर भी इस मुहिम में कूद पड़े. उन्होंने अंग्रेजों के समय रही चमार रेजीमेंट (Chamar Regiment) को बहाल करने की मांग उठाई.

हालांकि, दलित एक्टिविस्ट ओपी धामा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) को पत्र लिखकर अपील की है कि अगर देश में जातिवाद खत्म करना है तो योद्धाओं के नाम पर रेजीमेंट बनाई जाएं. आर्मी में भर्ती किए जाते समय एप्लीकेशन में जाति और धर्म का कॉलम समाप्त कर दिया जाए.

सोशल एक्टिविस्ट प्रो. दिलीप मंडल भी कुछ इसी तरह की बात कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “चमार रेजीमेंट का कोई कानूनी रास्ता नहीं है. होना यही है कि भविष्य में जातियों के नाम पर बनीं सभी रेजीमेंट खत्म हो जाएं.” हालांकि, उन्होंने ट्विटर पर लिखा है, “ये शानदार बात है कि देश की हर जाति के लोग भारत की आन, बान और शान के लिए फौज में शामिल होकर मर मिटने के लिए तैयार हैं...”



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चमार रेजीमेंट के बहादुर सैनिकों का इतिहास

तब पहली बार राष्ट्रीय मीडिया में उछला था मामला
चमार रेजीमेंट के लिए अनुसूचित जाति के कुछ नेताओं ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) का दरवाजा खटखटाया था तो यह मसला पहली बार नेशनल मीडिया की सुर्खियां बना. यह बात है 22 फरवरी 2017 की. जब आयोग के तत्कालीन सदस्‍य ईश्‍वर सिंह ने रक्षा सचिव को नोटिस कर जवाब मांगा था कि आखिर इस रेजीमेंट को किन कारणों से बंद किया गया. न्यूज18 ने इस मसले को 28 फरवरी को सबसे पहले उठाया.

तब हमसे बातचीत में हरियाणा के रहने वाले ईश्‍वर सिंह ने कहा था कि दलित किसी भी विषम परिस्‍थिति में रह लेता है. उतनी कठिनाई में शायद ही कोई और जीवन व्‍यतीत करता हो जितनी में ये लोग रहते हैं फिर भी इनकी रेजीमेंट सेना में बहाल क्‍यों नहीं की जा रही है?

NCSC के नोटिस के बाद तेज हुई मांग
इस नोटिस के बाद राष्ट्रीय स्तर पर यह मांग समय-समय पर उठती रही. हालांकि, इसे लेकर आजादी के बाद से ही कुछ क्षेत्रीय संगठन मांग उठाते रहे. लेकिन वो आवाज मुखर नहीं थी. इधर, सोशल मीडिया पर अनुसूचित जाति के लोगों के बढ़ते दखल से यह बात इस समाज के जन-जन तक पहुंची. इसीलिए जब-जब अहीर रेजीमेंट की मांग उठती है तब-तब चमार रेजीमेंट भी सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगता है. इस रेजीमेंट को बहाल करने के लिए कई राज्‍यों में प्रदर्शन कर चुके हैं.

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सरकार को 22 फरवरी 2017 को दिया गया एनसीएससी का नोटिस (file Photo)


किताबों के जरिए जागरूकता
इस रेजीमेंट को लेकर दो किताबें भी मार्केट में हैं. हवलदार सुलतान सिंह ने ‘चमार रेजीमेंट और अनुसूचित जातियों की सेना में भागीदारी’ शीर्षक से किताब लिखी है. दूसरी किताब सतनाम सिंह ने ‘चमार रेजीमेंट और उसके बहादुर सैनिकों के विद्रोह की कहानी उन्‍हीं की जुबानी’ नाम से लिखी है.

क्या थी चमार रेजीमेंट?
‘ब्रिटिश कालीन भारतीय सेना की संरचना में चमार रेजीमेंट एक ऐतिहासिक अध्‍ययन’ विषय पर जेएनयू (JNU) में रिसर्च करने वाले सतनाम सिंह का दावा है कि यह रेजीमेंट भी उतनी ही बड़ी थी जितनी और जातियों के नाम पर बनी रेजीमेंट.

दूसरे विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश इंडियन आर्मी ने यह रेजीमेंट बनाई थी, जो 1943 से 1946 यानी सिर्फ तीन साल ही अस्‍तित्‍व में रही. हालांकि, इसकी बहाली के लिए लड़ाई लड़ रहे दलित नेता शांत प्रकाश जाटव का कहना है कि यह रेजीमेंट काफी पहले से थी.

सतनाम सिंह ने ‘चमार रेजीमेंट और उसके बहादुर सैनिकों के विद्रोह की कहानी उन्‍हीं की जुबानी’ नामक किताब भी लिखी. वो न्यूज18हिंदी से बातचीत में कहते हैं कि "कोहिमा में चमार रेजीमेंट ने अंग्रेजों की ओर से 1944 में जापानियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. यह इतिहास की सबसे खूंखार लड़ाईयों में से एक थी."

"उस वक्त दुनिया की सबसे ताकतवर सेना जापान की मानी गई थी. जापान को हराने के लिए अंग्रेजों ने इसका इस्तेमाल किया. कोहिमा के मोर्चे पर इस रेजीमेंट ने सबसे बहादुरी से लड़ाई लड़ी. इसलिए इसे बैटल ऑफ कोहिमा अवार्ड से नवाजा गया था."

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चमार रेजीमेंट पर सतनाम सिंह की किताब


खत्‍म क्यों की गई रेजीमेंट?
सतनाम सिंह के मुताबिक "एक वक्त ऐसा आया जब अंग्रेजों ने चमार रेजीमेंट को प्रतिबंधित कर दिया था. अंग्रेजों ने इसे आजाद हिंद फौज से मुकाबला करने के लिए सिंगापुर भेजा. रेजीमेंट का नेतृत्व कैप्टन मोहनलाल कुरील कर रहे थे. कैप्टन कुरील ने देखा कि अंग्रेज चमार रेजीमेंट के सैनिकों के हाथों अपने ही देशवासियों को मरवा रहे हैं. इसके बाद उन्‍होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज (आईएनए) में शामिल कर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करने का निर्णय लिया. तब अंग्रेजों ने 1946 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया.”

इस विषय पर बड़ा काम करने वाले सतनाम कहते हैं, “अंग्रेजों से युद्ध के दौरान चमार रेजीमेंट के सैकड़ों सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी. कुछ म्यांमार व थाईलैंड के जंगलों में भटक गए. जो पकड़े गए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया. कैप्टन मोहनलाल कुरील को भी युद्धबंदी बना लिया गया. जिन्हें आजादी के बाद रिहा किया गया. वह 1952 में उन्नाव की सफीपुर विधान सभा से विधायक भी रहे.”

नई रेजीमेंट पर क्या कहती है मोदी सरकार
अहीर और चमार रेजीमेंट की मांग तो उठती रहती है लेकिन बड़ा सवाल यही है कि इस पर सरकार क्या सोचती है? क्या वो ऐसी किसी रेजीमेंट को बनाने के लिए तैयार है? फिलहाल, निकट भविष्य में तो ऐसा लगता नहीं. 11 मार्च 2020 को सांसद पुष्पेंद्र सिंह चंदेल संसद में इसी को लेकर एक सवाल पूछा था.

जवाब में रक्षा राज्य मंत्री श्रीपाद नाईक ने लिखित जवाब में कहा कि नई रेजीमेंट स्थापित करने को लेकर संसद में कई अवसरों पर चर्चा की जा चुकी है. सरकारी नीति के मुताबिक सभी नागरिक चाहे वे किसी वर्ग, पंत, क्षेत्र या धर्म के हों, भारतीय सेना में भर्ती होने के लिए पात्र हैं. आजादी के बाद सरकार की नीति किसी विशेष वर्ग, समुदाय, धर्म या क्षेत्र के लिए कोई नई रेजीमेंट गठित करने की नहीं रही है.

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इंडियन आर्मी में रेजीमेंट (स्रोत: आरटीआई)


सेना में कितनी रेजीमेंट?
एक्टिविस्ट ओपी धामा की ओर से डाली गई एक आरटीआई के जवाब में बताया गया है कि इस समय सेना में 23 रेजीमेंट हैं. जिनमें से कई जातियों और इलाकों के नाम पर भी हैं. इनमें मुख्य तौर पर जाट रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट, गोरखा रेजीमेंट, सिख रेजीमेंट, डोगरा रेजीमेंट, पंजाब रेजीमेंट, बिहार रेजीमेंट और असम रेजीमेंट आदि शामिल हैं.

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