जेल के अंदर महिला कैदी जीती हैं बदहाल लाइफ, मासूम बच्चे भी भुगत रहे सजा

एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक 2019 तक इनके कुल 1779 बच्चे इनके साथ जेलों में थे
एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक 2019 तक इनके कुल 1779 बच्चे इनके साथ जेलों में थे

ग्लोबल प्रिजन ट्रेंड्स, 2020 (Global Prison Trends, 2020) की रिपोर्ट्स के मुताबिक पूरी दुनिया में अपनी मां (mother) के साथ जेल (jail) में रहने वाले बच्चों की संख्या करीब 19 हजार है. पिछले एक दशक से भारत में कुल महिला कैदियों (Lady Prisoners) में से करीब 9% अपने बच्चों के सात जेल में रहती आई हैं. वह भी ऐसी हर 4 माताओं में से 3 का मामला विचाराधीन (under trail) था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 17, 2020, 3:44 PM IST
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दिल्ली (Delhi) के मंगोलपुरी की रहने वाली 42 साल की वीना पर अपने पति की कथित हत्या के आरोप में मुकदमा चल रहा है. फिलहाल वे तिहाड़ जेल (Tihar Jail) से जमानत पर बाहर हैं. कार के कलपुर्जों (spare parts) के एक मार्केट में काम करने वाली वीना महीने का 6 हजार कमाती हैं. उनके परिवार में उनके अलावा एक बेटी है. जब वह जेल (jail) गईं तो बेटी मात्र 9 महीने की थी. वीना ने एक रिपोर्ट में इंडियास्पेंड को बताया कि उस समय, उनके पास कोई नहीं था जिसपर विश्वास किया जा सके, इसलिए वे अपनी बेटी (daughter) को लेकर जेल गईं. वीना ने बताया, "तिहाड़ जेल में मूलभूत सुविधाएं ठीकठाक हैं, लेकिन बच्चों के लिए (अलग) खाना (food) दिया जाना चाहिए."

ऐसी ही कहानी 34 साल की आशा की भी है, जिसे 2009 में अपने सौतेले बच्चे (step child) की हत्या के मामले में दोषी पाया गया था. उसने अपनी सजा (sentence) की घोषणा से 5 महीने पहले ही अपनी बच्ची को जन्म दिया था. उसने बताया कि तब गर्भवती महिला (Pregnant Lady) और नवजात बच्चे (Newborn Baby) के लिए जेल में कोई सुविधा नहीं थी. अब आशा की बेटी नोएडा के एक मिशनरी स्कूल की स्टूडेंट है. जेल में बच्चों के साथ रह रही इन दोनों महिलाओं जैसी ही डेढ़ हजार से ज्यादा महिलाओं और उनके बच्चों की जिंदगी इन वजहों से बदहाल बनी हुई है-

6 साल की उम्र के बाद कर दिया जाता है मां से अलग
ये दोनों ही महिलाएं, भारत की अन्य 1543 महिला कैदियों की तरह हैं. जो देश में जेलों में बंद कुल 19913 महिलाओं का 8% हैं. एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक 2019 तक इनके कुल 1779 बच्चे इनके साथ जेलों में थे. बता दें कि भारत में महिला कैदी, कुल कैदियों का मात्र 4% हैं.
जेलों में बंद माएं अक्सर अपने बच्चों के लिए उचित खाने का जुगाड़ करने के लिए जूझती रहती हैं. ये बच्चे अपनी मां के साथ तब तक जेल में रह सकते हैं, जब तक वे 6 साल के नहीं हो जाते या उनके लिए बाहर कोई प्रबंध नहीं हो जाता.



भारत की ज्यादातर जेलों का प्रबंधन पुरुष कैदियों के नजरिए से
दिल्ली की तिहाड़ जैसी जेलें भारत में सुविधासम्पन्न जेलें मानी जाती हैं. जहां महिला कैदियों को पुरुष कैदियों से बिल्कुल अलग रखे जाने का प्रबंध है वरना ज्यादातर जेलों में महिला कैदियों को पुरुषों की जेल के एक हिस्से में ही रखा जाता है. इसी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ज्यादातर जेलें "पुरुष कैदियों से जुड़े मुद्दों के नज़रिए से प्रबंधित की जाती हैं."

ऐसे में इन महिलाओं के बच्चों की शायद ही कभी शिक्षा तक पहुंच हो पाती है और हमेशा जेल के बंद वातावरण में रहने के चलते अक्सर उनमें सामाजिक कौशल का अभाव भी हो जाता है. अगर वे बच्चे मां की रिहाई से पहले ही 6 साल के हो जाते हैं, तो उन्हें राज्य संचालित एक दूसरे संस्थान में रखा जाता है. और उन्हें उनकी मां के रिहा होने के साथ ही या उनके अपनी आजीविका कमाने लायक हो जाने के बाद ही वहां से जाने दिया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट ही नहीं, गृह मंत्रालय की ओर से भी हैं इसके दिशानिर्देश
साल 2006 में एक मुकदमे के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने महिला कैदियों और उनके बच्चों के कल्याण के लिए नियम निर्धारित किये थे. जिसके मुताबिक इन बच्चों को हफ्ते में कम से कम एक बार अपनी मां के पास आने की अनुमति दिए जाने की बात कही गई थी, लेकिन शायद ही कभी इसके लिए अनुमति दी गई.

सभी प्रक्रियाओं के लिए 2016 में जारी किए गए गृह मंत्रालय के आदर्श जेल मैनुअल और 2011 में जारी संयुक्त राष्ट्र के बैंकॉक नियम प्रोटोकॉल भी बच्चों के साथ जेल में बंद महिला कैदियों के कल्याण की प्रक्रियाओं का निर्धारण करते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ये और सुप्रीम कोर्ट का फैसला दोनों के ही कल्याण पर "सकारात्मक प्रभाव" डालने वाला है, लेकिन "इन नीतियों और उनके कार्यान्वयन के बीच अंतर" है.

भारत के ज्यादातर राज्यों में नहीं हैं महिलाओं के लिए अलग जेल
ग्लोबल प्रिजन ट्रेंड्स, 2020 की रिपोर्ट्स के मुताबिक पूरी दुनिया में अपनी मां के साथ जेल में रहने वाले बच्चों की संख्या करीब 19 हजार है. पिछले एक दशक से भारत में कुल महिला कैदियों में से करीब 9% अपने बच्चों के सात जेल में रहती आई हैं. वह भी ऐसी हर 4 माताओं में से 3 का मामला विचाराधीन था. बता दें कि भारत के 15 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में महिलाओं के लिए 31 जेलें हैं. हालांकि 21 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में महिलाओं के लिए कोई अलग जेल नहीं है और वे पुरुष जेलों के ही एक हिस्से में रहती हैं. 2019 में जिन आरोपी महिलाओं के खिलाफ मामले चल रहे थे, उनमें से औसतन हर 10 महिला में से एक अपने बच्चे के साथ थी. सितंबर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के हर 10 में से 7 कैदियों के मामले विचाराधीन हैं.

बच्चों को जेल में रहने के दौरान होने वाली समस्याएं
गृह मंत्रालय की ओर से पर्याप्त दिशानिर्देश होने के बावजूद बच्चों के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान नहीं रखा जाता. यहां तक कि उन्हें तभी अलग से विशेष मांग पर दूध उपलब्ध कराया जाता है, अगर उनकी मां को दूध न बन रहा हो. जेल अधिकारियों का कहना है कि बच्चों को पर्याप्त आहार दिया जाता है, जिसमें दूध, दलिया और खिचड़ी होती है लेकिन आशा के मुताबिक गुरुग्राम जेल में उनका अनुभव इससे बिल्कुल अलग रहा है.

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इसके अलावा बच्चे की शिक्षा के लिए मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 के दिशानिर्देशों का भी पालन नहीं किया जाता है. इसके अलावा शायद ही जो बच्चे बाहर हैं, वे कभी अपनी माताओं से मिलने जेल में आ पाते हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि अपराधियों के प्रति लोगों के मन में जो पूर्वाग्रह हैं, इन मामलों में उनकी विशेष भूमिका होती है. इस तरह के व्यवहार के महिला कैदियों पर बुरे मनोवैज्ञानिक प्रभाव देखे गये हैं.
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