दीपिक मिश्रा: विवादों से भरा रहा CJI के तौर पर कार्यकाल, फिर भी फैसलों से रचा इतिहास

दीपिक मिश्रा, सीजेआई (File Photo)
दीपिक मिश्रा, सीजेआई (File Photo)

दीपिक मिश्रा का कार्यकाल उतार-चढ़ाव भरा रहा है, सुप्रीम कोर्ट में उनके कार्यकाल को लंबे वक्त तक याद किया जाएगा.

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  • Last Updated: October 3, 2018, 12:14 PM IST
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ब्रूटस कहता है कि वह महत्वकांक्षी था और ब्रूटस एक प्रतिष्ठित व्यक्ति है- जूलियस सीजर

रिश्तेदार से थोड़ा अधिक, और दयालू से थोड़ा कम- हेमलेट

विडम्बना को व्यक्त करने में विलियम शेक्सपियर को महारत हासिल थी.



संयोग देखिए कि भारत के पूर्व प्रधान न्यायधीश दीपिक मिश्रा ने इसी अंग्रेजी कवि और नाटककार को कई बार कोट किया, मिश्रा का कार्यकाल भी विडम्बनाओं से भरा हुआ है.
एक न्यायाधीश जो अपनी सार्वजनिक छवि को बनाए रखने के लिए बेहद चौकस रहा. नकारात्मक धारणाओं और सीजेआई के तौर पर उनके कार्यकाल को लेकर सवाल उनकी सबसे कठिन लड़ाई थी. एक जज जिसने मुश्किल से कोर्ट के बाहर अपनी आवाज उठाई हो, उसे उसी के सहयोगियों ने सार्वजनिक लड़ाई में घसीटा था.

सीजेआई के रूप में जस्टिस दीपक मिश्रा का कार्यकाल भारत के कानूनी इतिहास में अद्वितीय विवादों से भरा रहा. फिर भी उन्होंने अपने फैसलों से इतिहास बनाया.

दीपिक मिश्रा का कार्यकाल उतार-चढ़ाव भरा रहा है, सुप्रीम कोर्ट में उनके कार्यकाल को लंबे वक्त तक याद किया जाएगा. उन्होंने पिछले साल अगस्त में संस्थान के प्रमुख के रूप में पदभार संभाला था, उस वक्त वह किसी भी तरह के विवाद से दूर थे.


सीजेआई बनते ही जस्टिस मिश्रा ने कॉलेजियम की सिफारिशों को सार्वजनिक कर दिया. पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों ने प्रस्ताव दिया था कि यह जजों की नियुक्तियों के मामलों में अधिक पारदर्शिता लाने में मील का पत्थर साबित होगा. इसके बाद सरकार के सभी प्रस्ताव अदालत की वेबसाइट पर अपलोड किए गए थे.

लेकिन बड़ी संख्या में वकीलों, वादियों और पत्रकारों के बार-बार मामलों के सूचिबद्ध करने के आरोपों के बाद सीजेआई की कोर्ट देश की सर्वोच्च अदालत की तरह नहीं दिखती थी.

जस्टिस मिश्रा ने मेडिकल एडमिशन मामलों को कोर्ट संख्या 2 से कोर्ट संख्या 1 में ले लिया था. फिर एक दिन उनके आदेश से भ्रष्टाचार कायम रखने को लेकर विवाद फूट गया.

इससे देश की सर्वोच्च अदालत में दो वरिष्ठ जजों के बीच असहमति सामने आई. सीजेआई और जस्टिस चेलमेश्वर के बीच विचारधारा को लेकर लड़ाई छिड़ गई वहीं कानूनी बिरादरी इन दो न्यायाधीशों के बीच विभिन्न मुद्दों पर बंट गई.

कुछ ने कहा कि यह जस्टिस चेलमेश्वर की सीजेआई न बन पाने की खीझ का नतीजा है. कुछ ने जस्टिस मिश्रा के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए. उनपर अपने हित साधने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वकीलों का इस्तेमाल करने का भी आरोप लगा.

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इससे संस्थान की प्रतिष्ठा को झटका लगा लेकिन सबसे बड़ा विवाद होना अभी बाकी था.

12 जनवरी की तारीख भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में सबसे हैरान करने वाली तारीख थी. इस दिन सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जज प्रेस के सामने आए और केसों के बंटवारे को लेकर जस्टिस मिश्रा पर आरोप लगाए. इससे पहले देश में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि सुप्रीम कोर्ट के जज प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह कहें कि उन्हें सीजेआई पर विश्वास नहीं है.


सरगर्मी बढ़ रही थी और भारत का शीर्ष न्यायिक पद विवाद में उलझा हुआ था. लेकिन जस्टिस मिश्रा ने इस मामले पर चुप्पी साधे रखी. चार जजों की तरफ से जस्टिस दीपिक मिश्रा को लिखे गए पत्र के लीक होने के बाद भी उन्होंने न तो कोई सफाई दी और न कोई बयान. हफ्ते दर हफ्ते जस्टिस मिश्रा पर नए आरोप लगते रहे लेकिन उन्होंने कोर्ट के बाहर कभी कुछ नहीं कहा.

किसी भी घटना के दौरान जब पत्रकारों ने उनसे सवाल किया तो जस्टिस मिश्रा ने अन्य सवालों, किताबों या कविताओं से उनका जवाब दिया. किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल था कि वह सोच क्या रहे हैं.

फिर जस्टिस मिश्रा के खिलाफ दुर्व्यवहार के आरोपों के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाया गया. यह पहला अवसर था जब मुख्य न्यायधीश के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. प्रस्ताव को उप-राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. हालांकि बाद में इस केस को वापस ले लिया गया. लेकिन इससे जस्टिस मिश्रा की छवि फिर एक बार चर्चा में आ गई थी.


इन विवादों के बीच जस्टिस मिश्रा ने निश्चित किया कि वह केवल उन मुद्दों पर फोकस करेंगे जिन पर उनका पूरा नियंत्रण है- उनका कोर्ट और रोस्टर. जस्टिस मिश्रा ने दो संविधान बेंच बनाए और 10 महत्वपूर्ण मामलों में फैसला दिया.

कोर्ट में रातों रात सबकुछ बदल गया. जस्टिस मिश्रा की कोर्ट नागरिक स्वतंत्रता, अधिकार और संवैधानिक सिद्धांतों से संबंधित मुद्दों पर मौलिक तर्कों का केंद्र बन गई. वरिष्ठ वकील कोर्ट नंबर 1 में जोरदार तर्क दे रहे थे, युवा समर्थकों और कानून शोधकर्ता इन घटनाओं पर करीब से नजर रखे हुए थे- वे कह सकते थे कि कुछ दिन पहले इस कोर्ट में तूफान मचा हुआ था.

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अप्रैल से सितंबर के बीच जस्टिस मिश्रा संवैधानिक मामलों के शीघ्र निपटारे को लेकर विभिन्न संजोयनों में बैठे थे भले ही उनकी आलोचना की आवाज कमजोर पड़ने लगी थी. पिछले हफ्ते जस्टिस दीपिका मिश्रा की बेंच ने आधार, एडल्टरी, सबरीमाला मंदिर विवाद, राजनीति का अपराधिकरण से संबंधित कई एतिहासिक फैसले दिेए.

इनमें से कुछ फैसलों ने नई जमीन तैयार की तो कुछ में न्यायपालिका ने संयम बरतने और सही संतुलन बनाने का प्रयास किया. इनमें से कई फैसलों में महिलाओं के हक की आवाज भी सुनाई दी.

जब उनका कार्यकाल समाप्ति के करीब था तब सीजेआई मिश्रा महत्वपूर्ण फैसले देने में व्यस्त थे, वे समकालीन भारत में नए न्यायशास्त्र को विकसित कर रहे थे और आने वाले दशकों के लिए न्यायिक उदाहरण तैयार कर रहे थे. उन्होंने अगले सीजेआई के लिए जस्टिस रंजन गोगोई के नाम का प्रस्ताव भेजा जो उन चार जजों में से एक थे जिन्होंने जनवरी में उनके खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी.


जब सीजेआई निशाजनक नजर आ रहे थे तब राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण मामले निश्चित तौर पर उनकी सहायता के लिए आए थे.

सोमवार को जस्टिस मिश्रा सुप्रीम कोर्ट में आखिरी बार अपने सहयोगी जजों, वकीलों और पत्रकारों से मिले लेकिन इस दौरान उन्होंने केवल शेक्सपियर, विलियम ब्लेक, इरिक सेगल और पब्लो नेरुदा के बारे में बात की.

जस्टिस मिश्रा ने न तो प्रेस कॉन्फ्रेस के बारे में कुछ कहा और न ही अपने द्वारा दिए गए बड़े फैसलों का खुद को क्रेडिट दिया.

सोमवार शाम को अपने आखिरी विदाई समारोह में जस्टिस मिश्रा ने कहा कि अगर वह अपनी आत्मकथा लिखेंगे तो उसका नाम 'No Antonians' होगा.

"ज्यादा बोलना नहीं बल्कि कड़ी मेहनत" सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस मिश्रा के कार्यकाल का यही निष्कर्ष निकलता है, जबकि 45वें सीजेआई के तौर पर उनके कार्यकाल के सकारात्मक और नकारात्मक बातों को चुनने के लिए जूरी अब भी बाहर है.

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