लद्दाख को अलग संभाग बनाने पर बंटा कश्मीर, सांप्रदायिक आधार पर बंटवारे के लगे आरोप

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जैसे ही लद्दाख को एक अलग संभाग का दर्जा दिया, राज्य में एक नई तरह का राजनीतिक हंगामा शुरू हो गया है.

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Updated: February 11, 2019, 5:15 PM IST
लद्दाख को अलग संभाग बनाने पर बंटा कश्मीर, सांप्रदायिक आधार पर बंटवारे के लगे आरोप
(सांकेतिक तस्वीर- पीटीआई)
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Updated: February 11, 2019, 5:15 PM IST
(आकाश हसन)

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जैसे ही लद्दाख को एक अलग संभाग का दर्जा दिया, राज्य में एक नए तरह का राजनीतिक हंगामा शुरू हो गया है. कई लोगों का मानना है कि यह बंटवारा भेदभावपूर्ण है और राजनीतिक फायदे के लिए किया गया है. कुछ लोग इसे लद्दाख को यूनियन टेरिटरी बनाने के बड़े प्लान की शुरुआत के तौर पर देख रहे हैं तो कुछ इसे धार्मिक आधार पर राज्य के बंटवारे के रूप में देख रहे हैं.

हालांकि घाटी की सभी राजनीतिक पार्टियों ने इस फैसले का स्वागत किया है. कई लोगों ने चिनाब घाटी और पीर पंजाल इलाके को भी संभाग बनाने की मांग की है.



करीब 87 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले लद्दाख में दो जिले हैं- करगिल और लेह. यह राज्य के सबसे विरले आबादी वाले इलाकों में से एक है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, इस इलाके की आबादी 2 लाख 84 हजार है. जिनमें 39 प्रतिशत बौद्ध, 46 प्रतिशत मुस्लिम और 12 प्रतिशत हिंदू हैं.

श्रीनगर से 204 किलोमीटर दूर स्थित करगिल में मुस्लिमों की आबादी अधिक है. वहीं श्रीनगर से 203 किलोमीटर दूर स्थित लेह की ज्यादातर आबादी बौद्ध है. लेह को लद्दाख संभाग का हेडक्वार्टर बनाया गया है. करगिल के नेताओं ने शनिवार को धमकी दी है कि यदि प्रशासन लेह में मुख्यालय बनाने के अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं करता है तो वे इसके खिलाफ बड़े स्तर पर प्रदर्शन करेंगे.

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लेह में अब जम्मू और कश्मीर संभागों की तरह ही प्रशासनिक और राजस्व अधिकार रखने वाले संभाग आयुक्त और आईजी पुलिस के ऑफिस होंगे. करगिल के लोगों की मांग है कि इन दफ्तरों की रोटेशन के आधार पर दोनों शहरों के बीच अदला-बदली होती रहे. यानी गर्मियों में करगिल से सारे काम हों और सर्दियों में लेह से.
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नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता फिरोज खान ने कहा, 'हम लद्दाख क्षेत्र को अलग संभाग का दर्जा देने के विरोध में नहीं हैं. हमें संभाग आयुक्त और आईजी के ऑफिसों को स्थायी तौर पर लेह में शिफ्ट कर देने से आपत्ति है.' वहीं लेह रहवासी और इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के पूर्व कुलपति सिद्दीक वाहिद का कहना है कि यह लद्दाख को बांट की की कोशिश है. उन्होंने कहा, 'लद्दाख के कई लोगों को लगता है कि यह लेह को फायदा पहुंचाते हुए लद्दाख को बांटने की कोशिश है.'

वाहिद कहते हैं, 'ऐसा लगता है कि इस फैसले के पीछे की मंशा क्षेत्र को साम्प्रदायिक आधार पर बांटने की है क्योंकि यह 1979 की वापसी है. उस साल लद्दाख को दो जिलों में बांट दिया गया था. उस बंटवारे की वजह प्रशासनिक थी.' इस बार वाहिद को लगता है कि दो प्रशासनिक केंद्र होने से इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है.

पूर्व अलगाववादी नेता सज्जाद लोन का भी यही मानना है. उन्होंने ट्वीट किया, 'रोटेशन के हिसाब से प्रशासनिक दफ्तरों की करगिल और लेह के बीच अदला-बदली न्यायसम्मत है. विकास की बात करें तो करगिल की हमेशा से उपेक्षा की गई है. सरकार सही को गलत करने का रिस्क ले रही है. लद्दाख को संभाग बनाने का फैसला सही है लेकिन एक स्थायी हेडक्वार्टर बनाने का फैसला गलत है.'

लोन ने कहा,'लेह और करगिल के बीच आर्थिक असमानता बहुत है. इससे करगिल और पिछड़ जाएगा. दोनों जगहों पर पारी-पारी हेडक्वार्टर बनने पर दोनों ही जगहों का विकास होगा.'

इस फैसले को राज्य के चिनाब घाटी और पीर पंजाल इलाके के साथ भेदभाव के रूप में देखा जा रहा है. दोनों ही क्षेत्र लंबे वक्त से अलग संभाग का दर्जा मांग रहे हैं. सरकार की घोषणा के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि यदि उनकी पार्टी राज्य में सत्ता में आई तो वह इन दोनों क्षेत्रों को अलग संभाग का दर्जा देंगे.

वर्तमान में दोनों ही क्षेत्रों में हिंदुओं और मुस्लिमों की मिश्रित आबादी है. दोनों ही क्षेत्र जम्मू संभाग हैं. पीर पंजाल क्षेत्र में रजौरी और पुंछ जिले आते हैं. वहीं डोडा, रामबन और किश्तवाड़ जिले चिनाब घाटी क्षेत्र में आते हैं.

कश्मीर के लोगों का मानना है कि यह कश्मीर का आकार छोटा करने की कोशिश है.

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शिक्षाविद शेख शौकत ने कहा, 'वे लोग कश्मीर के आकार को छोटा करने की कोशिश कर रहे हैं. यह कश्मीर और लद्दाख घाटी के बीच दिक्कतें हैं, चिनाब-पीर पंजाल क्षेत्र और जम्मू के बीच दिक्कतें हैं. अब वे लद्दाख को कश्मीर घाटी से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं.' उनका मानना है कि यह चुनावी रणनीति भी हो सकती है. उन्होंने कहा, 'हाल के चुनाव में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है. ऐसे में आगामी लोगसभा चुनाव को लेकर बीजेपी चिंतित है और उसे पता है कि हर सीट बेहद जरूरी है.'

राज्यपाल के अधिकारों पर सवाल उठाते हुए शौकत ने कहा, 'यह पॉलिसी स्तर पर लिया जाने वाला फैसला है. राज्यपाल शासन एक अस्थायी व्यवस्था है. क्या राज्यपाल को इस तरह के फैसले लेने चाहिए? चुनी हुई सरकारें भी इस तरह के फैसले लेने से पहले कई बार सोचती हैं लेकिन राज्यपाल को कोई फर्क ही नहीं पड़ता.'

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कश्मीर के नेता इसे राज्य को बांटने की कोशिश के तौर पर भी देख रहे हैं. पीडीपी यूथ प्रेसिडेंट वाहिद पारा ने कहा, 'यह फैसला प्रशासनिक होने के साथ-साथ राजनीतिक भी है. यह मुस्लिम वोटर्स को बांटने की कोशिश है. धार्मिक आधार पर बंटवारा किया जा रहा है. वे लोग सुन्नी-शिया, उत्तर-दक्षिण, अलगाववादी-मुख्यधारा, पहाड़ी-गुज्जर-बकरवाल आदि की लाइन पर बात करते हैं.'

चुनाव से पहले जम्मू-कश्मीर में यह राजनीतिक पार्टियों का मेजर एजेंडा बन गया है. पारा ने कहा, 'हम बंटवारे के खिलाफ नहीं है लेकिन हमने पीर पंजाल और चिनाब के लिए भी इसी तरह के बंटवारे की मांग की थी. यह हमारा एजेंडा रहेगा.'

वहीं चिनाब और पीर-पंजाल के लोगों का कहना है कि इसके लिए कश्मीरी नेता जिम्मेदार हैं. चिनाब घाटी के पत्रकार आसिफ इकबाल नाइक ने कहा, 'कश्मीर के नेता लंबे समय से हमसे वादा कर रहे हैं कि हमें अलग संभाग का दर्जा दिया जाएगा. लेकिन सत्ता में आते ही वे भूल जाते हैं. पिछले चुनाव में मुफ्ती सईद ने यही वादा किया था लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया. हमारा क्षेत्र पिछड़ा हुआ है.'

वहीं लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग भी उठ रही है. हालांकि, वाहिद कहते हैं कि यह प्रैक्टिकली पॉसिबल नहीं है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं.)
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