पटाखा व्यापारियों के बच्चे कैसे मनाएंगे दिवाली?

News18Hindi
Updated: October 13, 2017, 1:17 PM IST
पटाखा व्यापारियों के बच्चे कैसे मनाएंगे दिवाली?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली में सैकड़ों पटाखा व्यापारियों के सामने संकट पैदा हो गया है.
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Updated: October 13, 2017, 1:17 PM IST
अंकित फ्रांसिस/मलयानिल

दिवाली में बस अब कुछ ही दिन बचे हैं और जामा मस्जिद के पास मौजूद दरीबा कलां इलाके में सन्नाटा पसरा हुआ है. यहां स्थाई लाइसेंस वाले थोक पटाखा व्यापारियों की कई बड़ी दुकाने हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली- NCR में पटाखे बैन करने के बाद से दिल्ली पुलिस ने इन दुकानों पर ज़बरदस्ती ताला लगवा दिया है.

इन्हीं दुकानों से कुछ दिन पहले पटाखे खरीद कर ले गए छोटे व्यापारी इन बंद दुकानों के बाहर खड़े हैं और पटाखे वापस लेने की मिन्नतें कर रहे हैं. उधर यूपी, बिहार, बंगाल से सीजनल काम के लिए हज़ार- बारह सौ खर्च कर दिल्ली आए मजदूरों को तो अब ये भी नहीं पता कि शाम का खाना कैसे मिलेगा और अब वो घर कैसे लौटेंगे...

अब क्या करेंगे अमित, कमल और रामसुख...

अमित जैन पुरानी दिल्ली में पटाखों के थोक व्यापारी हैं और उनके पास इस काम के लिए स्थाई लाइसेंस भी है, जिसे तीन दिन पहले अमान्य कर दिया गया है. अमित बताते हैं कि पुराना और नया मिलाकर करीब 10 लाख रुपए से ऊपर का माल (पटाखे) बचा हुआ है. कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें दुकान पर ताला लगाने के लिए मजबूर कर दिया गया है. उनके पास करीब 5 लोगों का परमानेंट स्टाफ है. दिवाली का सीजन देखते हुए उन्होंने 10 दिनों के लिए 20 ढुलाई मजदूर भी रखे थे. अमित सवाल उठाते हैं कि कोर्ट ने बेचने पर तो बैन लगा दिया लेकिन पटाखे जलाने पर नहीं, अब भला बेचना रोकने से प्रदूषण कैसे कम होगा लोग जलाने के लिए बाहर से खरीद लाएंगे....?

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कमल की आंखें देखकर ये आसानी से समझा जा सकता है कि वो पिछले कुछ घंटों में कई बार रोया है. वह नोएडा सेक्टर-16 का रहने वाला है और अमित से ही 2 लाख रुपए के पटाखे खरीदकर ले गया था. उसने यह रकम ब्याज पर ली थी. पटाखे बेचने के लिए ले-देकर अस्थाई लाइसेंस भी लिया, लेकिन पटाखे बेचने पर ही रोक लग गई.

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कमल बीते दो दिनों से रोज़ सुबह अमित की दुकान पर आकर बैठता है और उनसे माल वापस लेने को कह रहा है. मगर जवाब में अमित खुद अपने पास पड़े लाखों के स्टॉक की दुहाई देते हैं. कमल पूछता है कि क्या कोर्ट ने यह नहीं सोचा होगा कि मेरे जैसे हजारों लोगों के बच्चों का क्या होगा...?

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अमित और कमल तो लाखों के नुकसान से परेशान हैं लेकिन उन्हीं के पीछे, नीचे ज़मीन पर करीब 10 मजदूर बैठे हैं, जो कैमरा देखकर असहज महसूस कर रहे हैं. इन्हीं में एक है रामसुख, जो बिहार के सीतामढ़ी से 1200 रुपए का ट्रेन टिकट खरीदकर दिल्ली के सदर में सामान ढुलाई के लिए आया था. वो दिवाली से पैसे कमाकर छठ मनाने की तैयारी में था, लेकिन बीते तीन दिन से अमित की दुकान के बाहर खाली बैठा है. बैन के बाद काम ठप है और अमित या कमल खुद ही सड़क पर आने की चिंताओं में घुल रहे हैं. रामसुख हमसे पूछता है कि उसके दिल्ली आने पर हुए खर्च का हिसाब कौन देगा, और इससे भी बड़ी बात यह कि वह अब घर कैसे लौटेगा?

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प्रोटेस्ट
दिवाली से ठीक पहले हर साल दिल्ली का सदर बाज़ार एक अनियंत्रित भीड़ में तब्दील हो जाता है. ये भीड़ हर साल दिवाली से पहले खरीदारी के लिए घरों से निकलती है. इस भीड़ में भी छोटे-छोटे समूह हैं जिनमें व्यापारी और भरे-पूरे परिवार सभी शामिल हैं. सदर बाज़ार, चावड़ी बाज़ार और चांदनी चौक में मौजूद छोटी-बड़ी हज़ारों दुकानों की तरफ ये भीड़ हर साल इन्हीं उम्मीदों से आती है कि यहां खरीदारी के लिए तैयार की गई उनकी लिस्ट का हर सामान सस्ते में मिल जाएगा. ऐसा होता भी है. यहां चाइनीज लाइट्स, ड्राई फ्रूट्स, हार्डवेयर, कपड़े, मसाले और ज़रूरत का जो-जो सामान आप सोच सकते हैं सभी मिल आसानी से मिल जाता है.

ये 11 अक्टूबर की एक शाम है और भीड़ से भरे सदर बाज़ार के कोने में एक मंच लगा है जिस पर हरजीत सिंह छाबड़ा नाम का एक शख्स खड़ा है, जो सुप्रीम कोर्ट के सामने खुद को आग लगाने की धमकी दे रहा है. मंच से नीचे कुछ सौ लोग खड़े हैं जो 'सुप्रीम कोर्ट डाउन-डाउन' के नारे लगा रहे हैं. मंच पर एक नेता टाइप का आदमी भी खड़ा है जो कि अतिउत्साही 'छाबड़ा जी' को सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ नारे न लगाने की सलाह दे रहा है, और बार-बार ये कोशिश करता है कि इन नारों के लगने के दौरान मौजूद कैमरों में उसकी शक्ल न आ जाए. मंच के नीचे कुछ और पटाखा व्यापारी खड़े हैं जो चिल्लाकर पूछ रहे हैं- हम व्यापारी हैं, पटाखों पर 28% लग्जरी टैक्स चुकाते हैं और हमें आत्महत्या के लिए आखिर क्यों मजबूर कर दिया गया है...?

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क्या है पूरा मामला!
दिवाली पर होने वाला प्रदूषण और उससे सेहत को होने वाला नुकसान कोई दंतकथा नहीं है. ये एक ऐसा सच है जिससे मुंह मोड़ना अब नामुमकिन हो गया है. बीती 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने तीन बच्चों की तरफ से दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली-एनसीआर में दिवाली के मौके पर पटाखों की बिक्री रोक दी. प्रतिबंध लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की तरफ़ से जारी सारे स्थाई और अस्थाई लाइसेंस भी तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए. हालांकि करीब एक महीने पहले खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही पटाखा कारोबारियों को पुराना स्टॉक बेचने की इजाज़त दी थी और 500 अस्थाई लाइसेंस देने का वादा भी किया था. ये बैन भी सिर्फ 22 दिन के लिए ही लगाया गया है.

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पुलिस ने कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए बड़े व्यापारियों के गोदामों और मंझले-छोटे व्यापारियों की दुकानों पर ताला लगवा दिया है. पुरानी दिल्ली के दरीबा कलां इलाके में पटाखा व्यापारी बताते हैं कि हर तीन घंटे में पुलिस आकर चेक कर रही है कि कहीं ताला खोला तो नहीं गया है. साथ ही उनसे आदेश मानने की बाध्यता वाले एक कागज़ पर बाकायदा साइन भी कराए गए हैं.

प्रदूषण समस्या है पर क्या यही है समाधान?
दिल्ली और देश के बाकी बड़े शहरों में वायु प्रदूषण एक बेहद भयानक समस्या है. बीते साल के आंकड़ों पर नज़र डालें तो दिवाली के बाद दिल्ली में प्रदूषण का स्तर 60 गुना ज्यादा हो गया था. पांच दिन तक शहर के लोग सांस लेने के दौरान ही इतना धुआं अंदर ले रहे थे मानो उन्होंने रोज़ 40 सिगरेट पी हों. इन 5 दिन तक दिल्ली-NCR स्मॉग से घिरा रहा और छोटे बच्चों, जानवरों और सांस की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए ये नरक जैसा था.

बीती दिवाली पर पॉल्युशन ने पिछले 3 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया. दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 1238 दर्ज की गई, जबकि सांस लेने के लिए इसका लेवल जीरो से 60 के बीच सुरक्षित माना जाता है. देश की 10 सबसे प्रदूषित जगहों में से 8 दिल्ली-एनसीआर की थीं. देश की 20 जगहों पर वायु प्रदूषण 40 गुना तक ज्यादा दर्ज किया गया था. दिल्ली के स्कूलों में वायु प्रदूषण नॉर्मल से 11 गुना ज्यादा था और आम लोगों को स्मॉग के चलते मास्क पहनना पड़ा था. इसके चलते 1800 स्कूल बंद करने पड़े थे.

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पटाखा व्यापारी पूछते हैं कि क्या सिर्फ उनके पटाखे न बेचने से प्रदूषण की गंभीर समस्या पर कोई असर पड़ेगा. क्योंकि दिल्ली से सटे राज्यों-हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हिमाचल में पटाखे बेचने-जलाने पर कोई रोक नहीं है. एक अंग्रेजी अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक दिवाली पर दिल्ली में होने वाले प्रदूषण का करीब 60% पड़ोसी राज्यों का ही योगदान होता है. दिल्ली में भी पटाखे जलाने पर नहीं सिर्फ बेचने पर बैन है? वैसे भी बीते पांच साल में हर साल पटाखों की बिक्री 10% बढ़ ही रही है.

इस भीड़ का भला कोई क्या करेगा...
सदर बाज़ार में भीड़ की तरफ इशारा करते हुए अमित कहते हैं कि हम न भी बेचें तो भीड़ को पटाखे जलाने से कोई कैसे रोकेगा? क्या इन्हें अपने बच्चों की सेहत की चिंता नहीं है? शाम के 6 बजे हैं और प्रोटेस्ट मंच का माहौल ठंडा पड़ता जा रहा है. नेता टाइप का शख्स बार-बार एक कागज़ लहरा रहा है जिस पर लिखा है- हिंदू हिन्दुस्तान में दिवाली नहीं मनाएगा तो क्या पाकिस्तान में मनाएगा? सोशल मीडिया पर भी ऐसी ही एक बहस को हवा दी जा रही है कि हिन्दुओं के त्योहारों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है जबकि बाकी धर्मों के त्योहारों पर ऐसा नहीं किया जाता.

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सदर और चांदनी चौक में पिछले सालों की तरह इस बार भी भीड़ है और दिवाली तक बढ़ेगी ही. बर्तन-कपड़ों, ड्राईफ्रूट्स और रंगीन लाइट्स की खरीदारी होगी. दिवाली के दिन पटाखे भी जलेंगे ही. इस भीड़ के लिए फिलहाल प्रदूषण मुद्दा नहीं है, कंगाल हो गए व्यापारी मुद्दा नहीं हैं... कोई धर्म बचा रहा है, कोई देश और संस्कृति और कुछ विधायक बनने के लिए मंच सजाकर अपनी ज़मीन तैयार करने में लगे हैं.

बस कोई अमित और कमल को नहीं बता रहा कि उनके लाखों के माल का क्या होगा? कोई रामसुख को ये नहीं बता रहा कि वो और उसके साथी अब सीतामढ़ी अपने घर कैसे लौटेंगे. कैसे होगी उसकी छठ और कहां से आएंगे लौटने के लिए वो 1200 रुपए...?
First published: October 13, 2017
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