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बहुविवाह, निकाह-हलाला को चुनौती पर AIMPLB का SC से अनुरोध-दूसरों को मुस्लिम नियमों में न करने दें हस्तक्षेप

Utkarsh Anand | News18Hindi
Updated: January 27, 2020, 6:33 PM IST
बहुविवाह, निकाह-हलाला को चुनौती पर AIMPLB का SC से अनुरोध-दूसरों को मुस्लिम नियमों में न करने दें हस्तक्षेप
भारत के सुप्रीम कोर्ट की फाइल फोटो

दी गई अर्जी (Application) के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) 1997 में ही बहुविवाह (Polygamy) के मामले में सुनवाई कर चुका है और उस वक्त उसने इस मामले में कोई भी आदेश जारी करने से मना कर दिया था.

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  • Last Updated: January 27, 2020, 6:33 PM IST
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नई दिल्ली. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक अर्जी दाखिल की है, जिसके मुताबिक किसी धर्म विशेष के रीति-रिवाजों (Religious Practices) को किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति द्वारा चुनौती न दिए जाने की बात कही गई है.

उलेमाओं (Ulemas) की इस रजिस्टर्ड सोसायटी ने यह भी कहा कि जब तक आस्था के सवाल किसी के जीवन और स्वतंत्रता (Liberty) के लिए खतरा न बनते हों, तब तक इन पर सवाल उठाए जाने की किसी को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

यूनिफॉर्म सिविल कोड, नीति-निर्देशक सिद्धांत का हिस्सा और बाध्यकारी नहीं
समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) के बारे में बोर्ड ने कहा है कि संविधान का अनुच्छेद 44, जो कि पूरे देश के लिए एक जैसे कानूनों की बात कहता है, वह मात्र राज्य का नीति-निर्देशक सिद्धांत है और उसे लागू किया जाना बाध्यकारी नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट में दी गई अर्जी में इस बात पर जोर दिया गया है कि 'मुस्लिम कानून (Mohammedan Law) पवित्र कुरान और हदीस' पर आधारित हैं और इनकी वैधता को इस आधार पर नहीं जांचा जा सकता कि वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.

मुस्लिम समुदाय की प्रथाएं सामान्य कानून के अंतर्गत नहीं
बोर्ड ने यह याचिका मुस्लिम समुदाय में चलने वाली बहुविवाह की प्रथा और निकाह-हलाला (Nikah Halala) की प्रथा के खिलाफ दाखिल की गई जनहित याचिका के विरोध में दाखिल की है.जबकि वकील और बीजेपी सदस्य अश्विनी उपाध्याय की याचिका (Petition) में दावा किया गया है कि ऐसी प्रथाएं मुस्लिम महिलाओं के सम्मानपूर्ण जीवन के अधिकार और उनकी निजता का उल्लंघन करती है. अब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दावा किया है कि ऐसी प्रथाएं 'लागू कानून' के अंतर्गत नहीं आती हैं ऐसे में वे न्यायिक समीक्षा से परे हैं.

अर्जी में दिया गया सुप्रीम कोर्ट में 1997 में हुई सुनवाई का हवाला
दी गई अर्जी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट 1997 में ही बहुविवाह (Polygamy) के मामले में सुनवाई कर चुका है और उस वक्त उसने इस मामले में कोई भी आदेश जारी करने से मना कर दिया था. बोर्ड ने यह भी कहा है कि अगर उपाध्याय की याचिका पर डिटेल सुनवाई (Detailed Hearing) हुई तो उसमें उसे भी अपने तर्क रखने की आज्ञा दी जानी चाहिए.

उपाध्याय की याचिका इंस्टेंट ट्रिपल तलाक (Instant Triple Talaq) को खारिज किए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर दाखिल की गई है. साथ ही इसमें निजता के अधिकार के फैसले को भी आधार बनाया गया है.

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First published: January 27, 2020, 5:15 PM IST
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