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क्या सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस भी आएंगे RTI के दायरे में? कल होगा फैसला

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Updated: November 12, 2019, 6:33 PM IST
क्या सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस भी आएंगे RTI के दायरे में? कल होगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ इस मामले पर अपना फैसला सुना सकती है.

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High court) ने फैसला सुनाया था कि चीफ जस्टिस (Chief Justice) के ऑफिस और सुप्रीम कोर्ट को आरटीआई (RTI) के अंतर्गत अपनी सूचनाओं को उसी तरह देना चाहिए, जिस तरह देश में दूसरी सार्वजनिक अथॉरिटी देती हैं. 2007 में एक एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल ने जजों की संपत्ति जानने के लिए एक आरटीआई दाखिल की थी.

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नई दिल्ली. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के कार्यालय को सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे में लाने संबंधी दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) बुधवार को फैसला सुनाएगा. सीजेआई रंजन गोगोई (CJI Ranjan Gogoi) के नेतृत्व वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ कल दोपहर दो बजे निर्णय सुनाएगी. पीठ के अन्य सदस्य न्यायमूर्ति एन. वी. रमण, न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना हैं. फैसला सुनाए जाने का नोटिस आज दोपहर सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक किया गया.

करीब दशक भर पहले 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High court) ने फैसला सुनाया था कि चीफ जस्टिस (Chief Justice) के ऑफिस और सुप्रीम कोर्ट को आरटीआई (RTI) के अंतर्गत अपनी सूचनाओं को उसी तरह देना चाहिए, जिस तरह देश में दूसरी सार्वजनिक अथॉरिटी देती हैं. 2007 में एक एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल ने जजों की संपत्ति जानने के लिए एक आरटीआई दाखिल की थी. जब इस मामले पर सूचना देने से इनकार कर दिया गया तो ये मामला केंद्रीय सूचना आयुक्त के पास पहुंचा. सीआईसी ने सूचना देने के लिए कहा. इसके बाद इस मामले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. उन्होंने इस आदेश को बरकरार रखा.

2010 में ये मामला आया था सुप्रीम कोर्ट में
2010 में सुप्रीम कोर्ट के जनरल सेक्रेटरी और सुप्रीम कोर्ट के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए. इस साल अप्रैल में शीर्ष कोर्ट ने इस मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया. इस पर बुधवार को फैसला सुनाया जाएगा. हाईकोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए कहा जा रहा है कि यह उनकी स्वतंत्रता से समझौता होगा. साथ ही न्यायपालिका के कामकाज के लिए सही नहीं होगा.

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First published: November 12, 2019, 5:54 PM IST
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