OPINION: कौन सी प्यास बड़ी है, तेल की या पानी की?

सरकार ने एथेनॉल (Ethanol) के दाम तो ज़रूर बढ़ा दिये हैं लेकिन हम उसके एवज में उस कीमती चीज़ को खो देंगे जिसको लेकर आज पूरी दुनिया में त्राहिमाम चल रहा है.

News18Hindi
Updated: September 5, 2019, 3:14 PM IST
OPINION: कौन सी प्यास बड़ी है, तेल की या पानी की?
देश में पानी की समस्या एक गंभीर संकट के रूप में है. लेकिन हमें ये देखना होगा कि पानी का कहां-कहां इस्तेमाल रोका जा सकता है.
News18Hindi
Updated: September 5, 2019, 3:14 PM IST
पंकज रामेन्दु

सुबह का वक्त है, छत की मुंडेर पर बैठा हुआ नायक बोलता है 'उसे अपने आप को बदलना होगा, जिंदगी ऐसे तो नहीं चल सकती, कभी तो बदलेगी, ऐसा कैसे हो सकता है कि रात ही रात चलती रहे और सवेरा ना हो, ये तो नहीं हो सकता मेमसाब' तभी दूर ऊगते हुए सूरज के पास कुछ चलता हुआ दिखाई देता है. धीरे धीरे दृश्य साफ होता है और सामने सैंकड़ों बैलगाड़ियां और उस पर बैठे हुए हजारों किसान नज़र आते हैं. नायिका देखती है औऱ नायक से बोलती है 'वो देखो आज़ाद सामने गांव में सवेरा हो रहा है'

‘मैं आजाद हूं’ फिल्म का ये दृश्य सालों से अपने हक की लडाई लड़ते आ रहे गन्ना किसानों की जीत को दिखाता है . गन्ना किसानों और चीनी मिलों का मालिकों की बीच चली आ रही तनातनी उस कश्मीर विवाद की तरह रही है जिसे देख कर हमेशा ऐसा लगता रहा है जैसे कोई इसे ठीक करना ही नहीं चाहता है. अब सरकार ने एक फैसला लेते हुए एथेनॉल के दाम बढा दिए हैं. एथेनॉल चीनी मिल में चीनी बन जाने के बाद निकलने वाले उपोत्पाद यानि बायप्रोडक्ट मोलायसिस से बनाया जाने वाला पदार्थ है. इसे पेट्रोल के साथ मिलाकर उसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर दिया जा रहा है. ये बायोफ्यूल जहां एक तरफ पेट्रोल पर विदेशी निर्भरता को कम करेगा वहीं इससे कार्बन उत्सर्जन पर भी लगाम लग सकेगी .

यही नहीं इस तरह एथेनॉल के दाम बढ़ा दिये जाने से चीनी मिल और गन्ना किसान दोनों को लाभ मिलेगा. इसे गन्ना किसानों की जीत के तौर पर भी देखा जा रहा है. लेकिन सवाल ये पैदा होता है कि ये जीत किस कीमत पर मिल रही है.

ऐथेनॉल के दाम पर क्या दे रहे हैं?
सरकार ने एथेनॉल के दाम तो ज़रूर बढ़ा दिये हैं लेकिन हम उसके एवज में उस कीमती चीज़ को खो देंगे जिसको लेकर आज पूरी दुनिया में त्राहिमाम चल रहा है. वो चीज़ है पानी. दरअसल एथेऩॉल की कीमत बढ़ा दिए जाने के बाद चीनी मिलों पर ज्यादा से ज्यादा एथेनॉल बनाने पर जोर रहेगा . पहले से ही चीनी मिले इसकी मांग को पूरा नहीं कर पा रही हैं. वर्तमान में देश में करीब 300 करोड़ लीटर एथेनॉल उपलब्ध है. जिसमें से करीब 130 करोड़ लीटर शराब उत्पादन में उपयोग ले लिया जाता है. और सरकार इस 130 करोड़ को छूना भी नहीं चाहेगी क्योंकि सभी जानते है कि शराब सरकार के लिए कितना बड़ा आय का स्रोत है. इसके अलावा 60-80 करोड़ लीटर केमिकल उत्पादन में लग जाता है . इसके बाद बचा हुआ 100 -120 करोड़ लीटर ऑइल मार्केटिंग कंपनी के हाथ लगता है.

2003 में ईबीपी यानि ऐथेनॉल ब्लैंडेड पेट्रोल कार्यक्रम की शुरूआत तेल संगठनों ने की थी. वर्तमान में ये करीब 21 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशो में काम कर रहा है जिसका लक्ष्य 5 फीसद तक की मिलावट है जिसे बढ़ाते हुए 10 फीसद तक ले जाने का लक्ष्य तय किया गया है. जबकि 1 दिसंबर 2015 से 30 नवंबर 2016 तक तेल संगठनों को जो एथेनॉल मिला उससे पेट्रोल में करीब 3.5 फीसद मिलावट की जा सकती है. वहीं देश के प्रधानमंत्री और रोड ट्रांसपोर्ट और हाइवे मंत्री नितिन गड़करी पेट्रोल की आयात पर लगाम लगाने के लिए अलग अलग मंचो से बायोफ्यूल को बढ़ाने पर जोर देने की बात कर चुके हैं. सरकार 2030 तक पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट को 20 फीसद तक ले जाने का लक्ष्य बना कर चल रही है. हम सभी जानते हैं कि एथेनॉल के परंपरागत उत्पादन का मुख्य स्रोत गन्ने से निकला मोलाएसिस है. यानि अगर एथनॉल का उत्पादन बढ़ाना है तो गन्ना उत्पादन बढ़ाना होगा. गन्ना उत्पादन का मतलब और ज्यादा वॉटर टेबल यानि भूमिगत जल का दोहन. यानि देश पर जल और खाद्य संकट. गन्ना एक ऐसी फसल है जिसका वॉटर फुट प्रिंट बेहद ज्यादा है. यानि एक किलो चीनी बनने में करीब 5000 लीटर पानी की खपत होती है . शायद यही वजह है कि कई पर्यावरणविद और जल बचाओ आंदोलनों से जुड़े लोग गन्ना उत्पादन पर रोक लगाने या उसे सीमित करने पर जोर देने की बात कर रहे हैं. वहीं नीति आयोग ने भी धान और गन्ना उत्पादन पर लगाम लगाने की बात कही थी . कर्नाटक और महाराष्ट्र में लगातार ज़मीन के नीचे के पानी के स्तर के गिरने के पीछ की खास वजह गन्ना उत्पादन ही है. उत्तर प्रदेश में भी यही हाल है. बीते सालो में भारत भूमिगत जल दोहन करने के मामले में दुनिया में अव्वल रहा है साथ ही वो ज्यादा एथेनॉल उत्पादन करने वाले देशों की सूची में भी अपना नाम दर्ज करा चुका है. भारत के पास सतह और सतह के नीचे जो पानी की उपलब्धता है वो ब्राजील से एक चौथाई है. ब्राजील अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा एथेनॉल उत्पादन करने वाले देशों में से एक है. हम एथेनॉल उत्पादन में उससे बहुत नीचे हैं लेकिन उसके लिए हम जो पानी खर्च कर रहे हैं वो ब्राजील की खपत के बराबर पहुंच चुका है. जबकि हम पेट्रौल में एथनॉल की मिलावट 2-3 फीसद ही कर पा रहे हैं जबकि ब्राजील में ये मात्रा करीब 40-50 फीसद तक की है. दरअसल जहां हमारे पास ब्राजील के बराबर पानी उपलब्ध नहीं है वहीं हमारा व़ॉटरफुट प्रिंट और दूसरे उपयोगो में पानी की खपत कहीं ज्यादा है. इस पर अगर हम बायफ्यूल के लिए एथेनॉल को बढ़ावा देते हैं तो ये हमारे देश के लिए एक बेहद गंभीर संकट खड़ा कर सकता है.
Loading...

यही नहीं इसके अलावा वर्तमान में भारत के कुल कृषि क्षेत्र के तीन फीसद में गन्ना उगाया जा रहा है लेकिन जिस तरह से बायोफ्यूल को तरजीह दी जा रही है और एथेनॉल के दाम बढ़ाकर चीनी मिलों और गन्ना किसानों को लुभाया जा रहा, उससे दूसरी फसलों को हटाकर गन्ना उत्पादन पर जोर दिया जाने लगेगा. बीते कई सालों में भारत में वैसे भी किसानों का ध्यान खाद्य उत्पादन से ज्यादा लाभ देने वाली फसलों की तरफ किया गया है. इसमें किसानों की गलती नहीं है बस उन्हें लगातार ये समझाया जा रहा है कि खाद्यान्न उत्पादन में लाभ नहीं रहा है. सरकार भी अनाज पर किसानों को सही दाम नहीं दिलवा पा रही है. ऐसे में किसानों का लाभ की फसल की तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक होगा. हालांकि इसमें अभी भी ये पेंच है कि चीनी मिल वाले जो एथेनॉल से लाभ कमाएंगे उसका ईमानदारी के साथ किसानों की जेब में कितना डालेंगे. लेकिन इससे ये तो तय है कि इसका नुकसान भारत के जलस्तर पर पड़ेगा. ये वो संकट है जो आने वाले समय में संभाले नहीं संभलेगा.


तो क्या बायोफ्यूल का विचार गलत है
इयर्स ऑफ लिविंग डेंजरसली में जानेमाने टीवी प्रस्तुतकर्ता डेविड लेटरमेन को दिए साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि अगर दुनिया वैकल्पिक ऊर्जा की तरफ विचार करती है तो वो इसका समर्थन करने वाला पहले व्यक्ति होंगे. उन्होंने ये भी कहा था कि वो भारत लगातार वैकल्पिक ऊर्जा पर काम कर रहा है यहा तक कि बिजली उत्पादन के लिए कोयले की निर्भरता को खत्म करते हुए सौर ऊर्जा पर भी तेजी से काम किया जा रहा है. साथ ही प्रधानमंत्री ने खुद को प्रकृति का सबसे बड़े रक्षक में से एक बताया था, हाल ही में बियर ग्रिल्स के साथ जिम कॉरबेट में वक्त गुजारने के दौरान भी प्रधानमंत्री ने प्रकृति के साथ अपने लगाव को जाहिर किया था. इसके साथ ही देश में प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई में चलाए जा रहे जल बचाओ अभियान को भी काफी तरजीह दी जा रही है. ऐसे में बायो फ्यूल को विकल्प के तौर पर देखते हुए एथेनॉल का बढ़ावा देना सरकार की नीतियों को लेकर उलझन पैदा करता है. हालांकि ऐसा नहीं है कि बायोफ्यूल का विचार गलत है लेकिन फर्स्ट जनरेशन बायोफ्यूल यानि गन्ने से बना एथेनॉल दिक्कतें खड़ी करता है.

क्या है फर्स्ट जनरेशन और सेकेंड जनरेशन
दरअसल गन्ने के मोलायसिस के अलावा एक और तरीका होता है बायोफ्यूल बनाने का जिसे सेकेंड जनरेशन एथेनॉल कहा जाता है. इसका निर्माण गांव और शहर से निकलने वाले कचरे, उद्योगो में उपयोग आने वाला कच्चे माल यानि फीडस्टॉक जैसे चारा, सड़े आलू, खराब अनाज जिसमें, ज्वार, गेंहू, चावल और सबसे खास पराली (जिनके जलाए जाने से हर साल दिल्ली धुएं की चादर ओढ़ लेता है) शामिल होते हैं. परंपरागत तरीके के अलावा इस दूसरे तरीके से बायोफ्यूल यानि एथेनॉल के निर्माण के लिए तेल कंपनी ने देशभर में 12 सेकेंड जनरेशन रिफाइनरी लगाई थी जिसके लिए देश के 11 राज्यों के साथ मिलकर इसे चलाने और करीब 10हज़ार करोड़ के निवेश की योजना तैयार है इसमें से एक रिफाइनरी पंजाब के भटिंडा में स्थापित भी की जा चुकी है. दरअसल सेकेंड जनरेशन ऐथेनॉल पूरी तरह से बायोमास यानि जैव ईंधन जिसमें पराली, गेंहू और चावल का भूसा आता है, उस पर निर्भर है . ये प्रक्रिया फर्स्ट जनरेशन एथेनॉल बनाने की प्रक्रिया से काफी मंहगी है. जब तक ये प्रक्रिया सस्ती नहीं हो जाती है तब तक फर्स्ट जनरेशन से ही एथेनॉल निर्माण पर ज़ोर दिया जाएगा. और इतने वक्त में हम अपना बहुत नुकसान कर चुके होंगे. यहां हमें एक बात समझनी होगी कि जिस तरह से 2022 तक एथनॉल की पेट्रोल में मिलावट को 10 फीसद तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है और सेकेंड जनरेशन बायोफ्यूल अपनी शैशव अवस्था में है. ऐसे में 313 करोड़ लीटर एथेनॉल की जरूरत को पूरा करने के लिए जो कदम उठाए जा सकते हैं उसमें सबसे बड़ा खतरा गन्ने से सीधे एथेनॉल बनाया जाना है. यानि चीनी मिले अपना लाभ और मांग को देखते हुए चीनी बनाए बगैर सीधे एथनॉल का निर्माण कर सकती है जिस पर कढ़ी निगरानी रखना बेहद ज़रूरी होगा और वो कितना संभव है ये कहना मुश्किल है. ऐसे में गन्ने के उत्पादन की मांग का बढ़ना और उससे सीधे एथेनॉल का निर्माण पूरे इकोलॉजिकल सिस्टम की धज्जियां उडा देगा. देश के 3 फीसद क्षेत्र में उगाया जा रहा गन्ना जब भूमिगत जल पर सीधा असर डाल सकता है तो सोचिए अगर इसका रकबा बढ़ता है तो सतही और सतह के नीचे के जल की क्या स्थिति होगी. और सरकार उस पर कैसे नियत्रण कर पाएगी. ऐसे में ये सोचना बेहद ज़रूरी हो जाता है कि हमारी कौन सी प्यास बड़ी है. हम गन्ना किसानों को वाकई में लाभ पहुंचा रहे हैं या जो वो वर्तमान में अपनी उपज से हासिल कर रहे हैं उसे भी गर्त में डालने जा रहे हैं. क्योंकि ये तो तय है कि आने वाले वक्त पानी की भीषण कमी होने पर उसका सीधा असर पैदावार पर पड़ने वाला है. तब ना गन्ना होगा, ना एथेनॉल होगा और ना ही किसानों के पास आय होगी.

पंकज रामेन्दु स्वतंत्र लेखक हैं. 

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए देश से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: September 5, 2019, 3:14 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...