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बालीगंज उपचुनाव पश्चिम बंगाल के चुनावी नक्शे पर 'लेफ्ट' की वापसी का संकेत देता है?

पश्चिम बंगाल की बालीगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में सीपीआईएम उम्मीदवार सायरा शाह हलीम टीएमसी के बाबुल सुप्रियो से हार गईं. वह दूसरे स्थान पर रहीं. (सांकेतिक तस्वीर)

पश्चिम बंगाल की बालीगंज विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में सीपीआईएम उम्मीदवार सायरा शाह हलीम टीएमसी के बाबुल सुप्रियो से हार गईं. वह दूसरे स्थान पर रहीं. (सांकेतिक तस्वीर)

पिछले साल नवंबर में सुब्रत मुखर्जी के आकस्मिक निधन के कारण बालीगंज में उपचुनाव की जरूरत पड़ी, और ममता बनर्जी द्वारा भाज ...अधिक पढ़ें

(सौगत मुखोपाध्याय)
कोलकाता. पश्चिम बंगाल में जब बीते साल राज्य विधानसभा के चुनाव में बालीगंज सीट पर लगभग 2.5 लाख योग्य मतदाताओं में से 61 फीसदी वोट डालने के लिए पहुंचे, तो तृणमूल कांग्रेस के दिग्गज नेता और उम्मीदवार सुब्रत मुखर्जी के चेहरे पर मुस्कान बिखरी हुई थी. सुब्रत मुखर्जी जानते थे कि दक्षिण कोलकाता के इस प्रमुख शहरी भूभाग में, जहां कुछ सबसे महंगी संपत्तियों में शहरी अभिजात वर्ग के साथ-साथ गगनचुंबी इमारतों की छाया में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले अमीर और गरीब दोनों वर्ग के लोग उन्हें आराम से देख सकते हैं. भले ही इस सीट पर मतदान प्रतिशत राज्य भर में औसत मतदान से कम था.

निश्चित रूप से, सुब्रत मुखर्जी ने बालीगंज में अपने निकटतम भाजपा प्रतिद्वंद्वी अधिवक्ता लोकनाथ चटर्जी के खिलाफ 75,000 से अधिक मतों के अंतर से चुनाव जीता. परिणाम आने के बाद लोकनाथ चटर्जी राजनीतिक गुमनामी में डूब गए, पूर्व कांग्रेस नेता सुब्रत मुखर्जी ममता बनर्जी के मंत्रिमंडल में स्थान बनाने में सफल रहे. साल 2011 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ना शुरू करने के बाद से सुब्रत मुखर्जी ने 2021 के विधानसभा चुनाव में बालीगंज से अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी.

पिछले साल नवंबर में सुब्रत मुखर्जी के आकस्मिक निधन के कारण बालीगंज में उपचुनाव की जरूरत पड़ी, और ममता बनर्जी द्वारा भाजपा से पाला बदलकर आने वाले बाबुल सुप्रियो को यहां से तृणमूल कांग्रेस का उम्मीदवार बनाने पर किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ. लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि राज्य में उपचुनाव मानकों के हिसाब से बहुत कम, बालीगंज में 41% मतदान हुआ. जाहिर है, मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग इस बार पोलिंग बूथ से दूर रहा. और यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि मतदाताओं का पोलिंग बूथ तक न आना केवल गर्म और उमस भरे मौसम के कारण नहीं था.

कम मतदान के बावजूद, 20,000 से अधिक मतों के अंतर के साथ बाबुल सुप्रियो की जीत के बाद, उम्मीदवार के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने राहत की सांस ली होगी. ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने ट्वीट कर बालीगंज और आसनसोल की जीत को पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि माना. तृणमूल कांग्रेस की सरकार वर्तमान में पश्चिम बंगाल में कानून और व्यवस्था की कथित विफलता पर आलोचना से बचने के लिए संघर्ष कर रही है. बालीगंज पर ध्यान केंद्रित करें तो, उपचुनाव के रनर-अप ने निश्चित रूप से बाबुल सुप्रियो को कुछ झटकेदार क्षण दिए होंगे.

बाबुल सुप्रियो की चुनौती अपने मतदाताओं, जिनमें से 42% मुस्लिम हैं, को यह विश्वास दिलाना था कि जिस व्यक्ति ने भाजपा नेता के रूप में अपने पहले के अवतार के दौरान CAA के एजेंडे को जमकर प्रचारित किया था, तृणमूल कांग्रेस में जाने के बाद उसकी छवि में बदलाव आया है. ‘बाबुल को वोट नहीं’ (#NoVoteToBabul) अभियान, जो बाबुल सुप्रियो के पिछले रुख पर आधारित था और जिसका नेतृत्व शहर के कुछ समूहों ने किया, जाहिर तौर पर इस हद तक असरदार साबित हो रहा था कि कोलकाता पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को सड़कों से गिरफ्तार कर लिया.

बालीगंज निर्वाचन क्षेत्र के 7 नगरपालिका वार्डों के चुनाव आंकड़ों के विश्लेषण पर एक सरसरी निगाह डालने से पता चलता है कि बाबुल सुप्रियो कभी भी मतदाताओं का पूरा विश्वास हासिल करने में सफल नहीं हुए. उन 7 वार्डों में से दो, वार्ड संख्या 64 और 65 में, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सायरा शाह हलीम ने तृणमूल कांग्रेस की तुलना में अधिक वोट हासिल किए. यह स्थिति तब थी जब बालीगंज में 20% कम मतदान हुआ था. यह इस बात का प्रमाण है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने अपना मत जाहिर करने से दूरी बनाई. और जिन लोगों ने वोट दिया, उनमें से एक महत्वपूर्ण हिस्से ने स्पष्ट रूप से तृणमूल और भाजपा दोनों को खारिज करते हुए CPI-M को अपना विकल्प चुना.

उल्लेखनीय है कि राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी, भाजपा बालीगंज में तीसरे स्थान पर रही और पार्टी उम्मीदवार कीया घोष ने चुनाव आयोग के पास अपनी जमानत जब्त करा ली. कोई आश्चर्य नहीं कि बाबुल सुप्रियो ने अपनी जीत को उनके खिलाफ झूठे और दुर्भावनापूर्ण अभियान फैलाने वालों के लिए जवाब बताया और वादा किया कि बाबुल 2.0 संस्करण उनके पिछले अवतार से बेहतर होगा. दूसरी ओर, वामपंथी अपनी राजनीतिक लाइन पर अड़े रहे और राज्य में तृणमूल-भाजपा के राजनीतिक गतिरोध को ‘फर्जी विरोध का एक शो’ बताया, जिसे बालीगंज के मतदाताओं ने देखा है.

चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए, माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद सलीम ने कहा, ‘कम मतदान राजनीतिक दलों के साथ मतदाताओं की निराशा का संकेत है और यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है. उस भरोसे को वापस पाने के लिए हमें बहुत काम करना है.’ बालीगंज उपचुनाव का अनुभव ऊपर बताई गई किसी भी संभावना या सभी के मिश्रण और मेल का नतीजा हो सकता है. लेकिन बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की सरकार के लिए, बालीगंज का नतीजा निश्चित रूप से एक चेतावनी की घंटी है, जो 2024 के आम चुनावों में अपनी बड़ी भूमिका को लेकर आशांवित है. उसे तथाकथित ‘मतदाताओं की दुविधा’ को दूर करने के लिए गहन आत्मनिरीक्षण की जरूरत है.

Tags: Babul supriyo, BJP VS TMC, West Bengal Bypolls

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