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अब ब्रेन डेड मरीज की हड्डी कर सकेंगे दान, कैंसर मरीजों को होगा फायदा

बेंगलुरु में एमएस रमैया अस्पताल एवं रोटरी टीटीके ऐसे दो केंद्र हैं, जिन्हें चिकित्सा के लिए हड्डियों को सुरक्षित रखने का लाइसेन्स दिया गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

बेंगलुरु में एमएस रमैया अस्पताल एवं रोटरी टीटीके ऐसे दो केंद्र हैं, जिन्हें चिकित्सा के लिए हड्डियों को सुरक्षित रखने का लाइसेन्स दिया गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Organ Donation: हड्डियां सिर्फ दिमाग़ी रूप से मृत व्यक्तियों के शरीर से प्राप्त की जा सकती हैं. अभी मानव शरीर (Human Body) की सबसे बड़ी हड्डी जांघ की हड्डी को ही निकालने के बारे में निर्णय लिया गया है.

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(सौम्या कलसा)
बेंगलुरु.
पूरी दुनिया में अंगदान से बहुत सारे लोगों की जान बच रही है. कर्नाटक (Karnataka) में पिछले वर्षों में अंगदान और उन अंगों का मरीज़ों के शरीर में ट्रांसप्लांट करने की दिशा में भारी प्रगति हुई है. राज्य सरकार की मदद से चल रहा जीवनसार्थककथे नामक संगठन ने राज्य में क़ानूनी रूप से अंगदान को सफल बनाने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है. गुर्दा (Kidney), यकृत (Liver), हृदय (Heart), वाल्व्ज़, त्वचा, पैंक्रीयस (Pancreas) आदि ऐसे कुछ अंग हैं जो दिमाग़ी रूप से मृत व्यक्ति के शरीर से परिवार की अनुमति से प्राप्त किया जाता है. पर अब पहली बार, इस सूची में हड्डी को शामिल कर लिया गया है जिसे किसी दिमाग़ी रूप से मृत व्यक्ति के शरीर से जीवनसार्थककथे के संयोजन में प्राप्त किया जा सकेगा.

मानव हड्डी दान क्या है?
हड्डियां सिर्फ दिमाग़ी रूप से मृत व्यक्तियों के शरीर से प्राप्त की जा सकती हैं. अभी मानव शरीर की सबसे बड़ी हड्डी जांघ की हड्डी को ही निकालने के बारे में निर्णय लिया गया है. अंगदान संयोजन टीम इस तरह के अंगदान के लिए राज़ी होने वाले परिवार के लिए सभी ज़रूरी काग़ज़ी कार्रवाई करेगा और इस कार्य को सफल बनाएगा. अगर परिवार के लोग राज़ी होते हैं तो उस स्थिती में मृत व्यक्ति के शरीर से अन्य अंगों को निकालने के दौरान ही इसे भी निकाल लिया जाएगा. हड्डी दान के लिए आयु की कोई सीमा निर्धारित नहीं की गयी है और इसलिए इसका प्रयोग अपेक्षाकृत व्यापक होगा.
दिमाग़ी रूप से मृत व्यक्ति के शरीर से हड्डी कब प्राप्त किया जा सकता है?
आदर्शतः किसी व्यक्ति के मरने के 10-12 घंटे के भीतर इसे निकाल लिया जाना चाहिए. हड्डी को निकाले जाने के बाद इसकी जगह एक कृत्रिम पांव लगा दिया जाएगा इससे लाश विकृत नहीं लगेगा क्योंकि अंगदान करने वाले के परिवारवालों की यह बड़ी चिंता होती है.



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इस तरह के हड्डी-दान से किसको लाभ होता है?
कैंसर के ऐसे मरीज़ जिनकी हड्डी बीमारी के कारण या इलाज की कठोरता के कारण क्षतिग्रस्त हो गयी है, उनको इस तरह के हड्डी दान से काफ़ी मदद मिलेगी. फिर, ऐसे लोग जिनकी दुर्घटना एक कारण हड्डी टूट गयी है, उनके शरीर में अंगदान करनेवाले व्यक्ति के टिश्यूज़ की मदद से इस हड्डी को सर्जरी से लगाया जा सकता है. हड्डी के दान का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि इसमें प्राप्तकर्ता के शरीर से मैच करने और स्वीकार्यता या ब्लड ग्रूप के मैच करने जैसी कठिनाई नहीं उठती है.

हड्डी को कैसे रखा जाता है? कितने समय तक उसे बचाए रखा जा सकता है?
बेंगलुरु में एमएस रमैया अस्पताल एवं रोटरी टीटीके ऐसे दो केंद्र हैं, जिन्हें चिकित्सा के लिए हड्डियों को सुरक्षित रखने का लाइसेन्स दिया गया है. हड्डियों को एक विशेष तरीक़े से प्रोसेस किया जाता है, इसकी अस्थि मज्जा को निकाल लिया जाता है, इसकी क्लीनिकल सफ़ाई होती है और फिर इसे -80°C पर रखा जाता है. इस तरह से रखी गई हड्डियों को 5 साल तक कभी भी प्रयोग किया जा सकता है.

बेंगलुरु में कम से कम 30 मरीज़ ऐसे हैं जिनको एक माह में ऐसे हड्डियों की ज़रूरत है और जो अभी तक उन्हें उपलब्ध नहीं था. अब डोनर हड्डी दान कर सकते हैं और इससे कम से कम 40 बीमार लोगों की जान बच सकती है. इसलिए उम्मीद की जाती है कि यह नयी शुरुआत कई लोगों को नया जीवन दे सकती है.
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