...इसलिए आसाराम का केस लड़ रहा हूं मैं: स्वामी

पिछले साल आम चुनावों से ठीक पहले अपनी जनता पार्टी का विलय बीजेपी में करने के बाद से भगवा राजनीति का प्रमुख चेहरा बने सुब्रमण्यम स्वामी अपनी खास स्टाइल ऑफ पॉलीटिक्स के लिए जाने जाते हैं।

श्रवण शुक्‍ला | News18India.com
Updated: October 15, 2015, 8:14 PM IST
...इसलिए आसाराम का केस लड़ रहा हूं मैं: स्वामी
पिछले साल आम चुनावों से ठीक पहले अपनी जनता पार्टी का विलय बीजेपी में करने के बाद से भगवा राजनीति का प्रमुख चेहरा बने सुब्रमण्यम स्वामी अपनी खास स्टाइल ऑफ पॉलीटिक्स के लिए जाने जाते हैं।
श्रवण शुक्‍ला
श्रवण शुक्‍ला | News18India.com
Updated: October 15, 2015, 8:14 PM IST
श्रवण शुक्ल

नई दिल्ली। पिछले साल आम चुनावों से ठीक पहले अपनी जनता पार्टी का विलय बीजेपी में करने के बाद से भगवा राजनीति का प्रमुख चेहरा बने सुब्रमण्यम स्वामी अपनी खास स्टाइल ऑफ पॉलीटिक्स के लिए जाने जाते हैं। वे देश के सबसे शक्तिशाली कहे जाने वाले गांधी परिवार के खिलाफ बेखौफ होकर मुहिम चलाते हैं, अल्पसंख्यकों को लेकर अपने कट्टर विचारों के सार्वजनिक इजहार से हिचकते नहीं हैं और ज्वलंत मुद्दों पर पार्टी लाइन की तरफ से भी बेपरवाह नजर आते हैं। स्वामी  हाल में चर्चा में आए नाबालिग से बलात्कार के आरोपी संत आसाराम से मिलने जेल जाने की वजह से। उन्होंने आसाराम का केस लड़ने का ऐलान किया है। आईबीएनखबर ने उनसे इस ऐलान की वजह सहित विभिन्न मुद्दे पर विस्तार से बात की।

<b>आसाराम का केस लड़ने की वजह क्या है? इस सवाल पर स्वामी ने कहा कि</b> मूल बात ये है कि मुझे पता लगा कि आसाराम जिनके दुनियाभर में भक्त हैं, वो 18 महीने से जमानत के बिना जेल में हैं। फिर मैंने पता किया कि उनपर क्या आरोप हैं तो पता चला कि एक लड़की ने आरोप लगाया था कि मेरे साथ दुर्व्यवहार हुआ। बलात्कार हुआ। मैंने जब छानबीन की तो लड़की के बयान के आधार पर जोधपुर में ये तथाकथित घटना हुई और उसने दिल्ली में मामला दर्ज कराया। क्रिमिनल लॉ में इस तरह का प्रावधान नहीं है कि अपराध एक जगह हो और उसकी एफआईआर दूसरी जगह हो। पर दिल्ली पुलिस ने जीरो एफआईआर के आधार पर मेडिकल कराया। मेडिकल रिपोर्ट में साफ लिखा है कि इस लड़की के शरीर पर कोई चोट नहीं थी, बलात्कार को कोई संकेत नहीं था, नाखून तक की खरोंच नहीं थी। इस रिपोर्ट को देखने के बाद मुझे आश्चर्य हुआ कि आसाराम बिना बेल के 18 महीने से कैसे जेल के अंदर हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के अनेक जजमेंट के अनुसार, ये स्पष्ट है कि जेल अपवाद होता है और बेल अनिवार्य होता है।

स्वामी ने कहा कि बेल का एक ही उद्देश्य होता है कि जब ट्रायल शुरू होगा, उस समय आसाराम को प्रस्तुत होना पड़ेगा। अब आसाराम जैसे व्यक्ति को देश छोड़कर भागने का सवाल ही नहीं होता। इस पूरे मामले को देखने के बाद लगा कि कोई इसके पीछे है। मैं अब सहमत हो गया हूं कि उनकी जो गिरफ्तारी हुई थी, उस समय राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तो ये सोनिया गांधी के निर्देश पर हुई थी क्योंकि आसाराम उनके खिलाफ बोलते थे, दूसरा आसाराम घर वापसी कार्यक्रम चलाते थे। जो ईसाई मिशनरीज ने गुजरात के आदिवासी बहुल इलाकों में पैसे देकर धर्मपरिवर्तन कराया था, वो उन्हें वापस ला रहे थे। उस नाराजगी के कारण क्रिश्चियन लॉबी ने ऐसा किया। अब आसाराम का स्वभाव ऐसा है कि उनके दुश्मन आसानी से बन जाते हैं।

सुब्रमण्यम स्वामी के मुताबिक आसाराम के राजनीति में दुश्मन हैं, तो उनके समर्थक भी है। लेकिन वे समर्थक कायर थे। मैं न तो आसाराम का शिष्य हूं। न उन्हें जानता हूं, परंतु मैं मानता हूं कि आसाराम जैसे संत को 18 महीने तक जेल में बिना बेल के रखना, ये हमारे संविधान के विपरीत है। जहां तक आसाराम के विरुद्ध गवाही देने वालों पर हमले का सवाल है तो ये सब मीडिया की बनाई हवा है। इससे पहले आगरा में चर्च पर हुए हमले में हिंदुत्व का नाम लेकर खूब उछाला गया, लेकिन अब मामला दूसरा सामने आया है। इसी तरह से हो सकता है कि आसाराम के गवाहों पर हमलों का भी दूसरा कारण हो। खैर, मैं इस बात की गहराई में नहीं जाना चाहता। जो तथ्य हैं, उनके साथ कोर्ट में खड़ा होऊंगा।

<b>फ्रांस के साथ लड़ाकू विमान रॉफेल की डील का विरोध करने और बाद में इससे पलट जाने पर स्वामी ने कहा कि</b> रॉफेल डील पर शुरू से मेरा एक ही कदम रहा है कि इसमें दलाली हो रही है। अगर पुरानी शर्तों पर डील होती है तो मैं केस करूंगा। सोनिया गांधी और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की इटालियन पत्नी कार्ला ब्रूनी ने रॉफेल डील पर पैसा कमाने की डील की थी। रॉफेल को एक भी देश नहीं खरीद रहा था। फिलहाल फ्री मिलने की हालत में मिश्र 24 जहाज ले रहा है। मुफ्त में मिलने की सूरत में कोई भी ले लेगा। ऐसे में ऐसे जहाज जिसे कोई भी खरीद नहीं रहा, उसे 126 की संख्या में खरीदने की जरूरत ही क्या है? ये डील सिर्फ दलाली के लिए थी। मैंने सोनिया गांधी-कार्ला ब्रूनी के समझौते वाले दस्तावेज पर दस्तखत के खिलाफ कोर्ट में जाने की बात कही थी, जिसके बारे में रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने स्पष्ट कर दिया है कि पुरानी डील पूरी तरह से रद्द कर दी गई है। अब सौदा नए सिरे से सीधे फ्रांस सरकार से हुआ है। जिसमें 36 जहाज फ्रांस में बने होंगे। वो हम सीधे सरकार से लेंगे। हालांकि इसपर अभी जुबानी सहमति ही बनी है। मेरा मूल मुद्दा था कि सोनिया-ब्रूनी वाले सौदे को नहीं होने देना था, जो रद्द कर दिया गया है। ऐसे में कोर्ट जाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

<b>वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा भ्रष्टाचार  निरोधक कानून को  ईमानदार फैसले में बाधक बताने और सीबीआई को करप्शन व गलती में अंतर समझने की नसीहत देने पर स्वामी ने कहा कि</b> सवाल ये नहीं है कि अधिकारी ईमानदार है या भ्रष्ट। सवाल ये है कि उसके कदम से सार्वजनिक हित का उल्लंघन हुआ या नहीं। ये अधिकारी का दायित्व है कि वो सार्वजनिक हित की रक्षा करे और अनजाने में अगर वो सार्वजनिक हित का त्याग करेगा। तब भी वो दंड का भागीदार होगा इसीलिए प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट में धारा 13 के पार्ट 3 में ये है कि यद्यपि आप रिश्वत नहीं लेंगे, परंतु आपके निर्णय के कारण किसी को लाभ हुआ है और वो लाभ राष्ट्रहित नहीं है, तो उसमें अधिकारी को 7 साल की सजा मिल सकती है। अब उस कानून में फंसे हुए हैं मिस्टर चिदंबरम। यदि इस कानून को रद्द करेंगे तो मुझे नहीं पता लेकिन जिसने राष्ट्रहित की सुरक्षा नहीं की, राष्ट्रहित का ख्याल नहीं किया, तो वो दोषी है। उसकी पैसा बनाने की नीयत थी, या नहीं। इसपर हम नहीं जाएंगे।
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<b> (कल इंटरव्यू के अगले भाग में पढ़िए विदेश नीति और उससे जुड़े मुद्दों पर सुब्रमण्यम स्वामी की बेबाक राय।)</b>

 

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First published: April 29, 2015, 1:55 AM IST
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