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OPINION: अमेरिका की DARPA से सीखे DRDO, पुराने हथियारों से नहीं लड़े जा सकते भविष्‍य के युद्ध

News18Hindi
Updated: November 25, 2019, 5:35 PM IST
OPINION: अमेरिका की DARPA से सीखे DRDO, पुराने हथियारों से नहीं लड़े जा सकते भविष्‍य के युद्ध
2016 में पाकिस्‍तान में घुसकर की गई सर्जिकल स्‍ट्राइक का नेतृत्‍व करने वाले सेवानिवृत्‍त ले. जनरल डीएस हुड्डा का कहना है कि डीआरडीओ भविष्‍य के युद्ध के मुताबिक युद्धक तकनीक विकसित करने पर ध्‍यान देना चाहिए.

अमेरिका (US) की डिफेंस एडवांस्‍ड रिसर्च प्रोजेट्स एजेंसी (DARPA) का सालाना बजट (Annual Budget) 3 अरब डॉलर (213 अरब रुपये से ज्‍यादा) का है. वहीं, भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (DRDO) का सालाना बजट 2.5 अरब डॉलर (177 अरब रुपये से ज्‍यादा) है. दोनों के सालाना बजट में जरूरतों के मुताबिक बहुत ज्‍यादा फर्क नहीं है. सवाल यही उठता है कि फिर अमेरिकी एजेंसी भारतीय संगठन के मुकाबले ज्‍यादा काम कैसे कर पा रही है.

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  • Last Updated: November 25, 2019, 5:35 PM IST
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ले. जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा

नई दिल्‍ली. सोवियत संघ (Soviet Union) की न्‍यूज एजेंसी Tass ने 4 अक्‍टूबर 1957 को पहले सेटेलाइट स्‍पुतनिक 1 (Sputnik 1) के सफल प्रक्षेपण की घोषणा की. इस खबर से सबसे तगड़ा झटका अमेरिका (US) के लोगों को लगा था. तब तक अमेरिका की तकनीकी क्षमता पर गर्व करने वाली जनता की भावनाओं को गहरी ठेस लगी. आइजनहावर प्रशासन (Eisenhower Administration) की आलोचनाओं को दरकिनार कर दिया जाए तो इस घटना का अमेरिका पर लंबी अवधि के लिए बहुत अच्‍छा असर पड़ा. स्‍पुतनिक के सफल प्रक्षेपण ने अमेरिकी नेतृत्‍व की सैन्‍य तकनीक (Military Technology) के मामले में दुनिया में सबसे आगे रहने की प्रतिबद्धता को मजबूत किया.

अमेरिका ने स्‍पुतनिक लॉन्‍च के बाद स्‍थापित की DARPA
स्‍पुतनिक लॉन्‍च के बाद अमेरिकी सरकार (US Government) ने सबसे पहला कदम उठाते हुए फरवरी, 1958 में डिफेंस एडवांस्‍ड रिसर्च प्रोजेक्‍ट एजेंसी (DARPA) स्‍थापित की. डीपीआरपीए की वेबसाइट के मुताबिक, एजेंसी अमेरिका को रणनीतिक तकनीकी मामलों में दुनिया को चौंकाने वाले देश के तौर पर बरकरार रखने के सिद्धांत पर काम करती है. एजेंसी तकनीकी विस्‍तार के बजाय बड़े तकनीकी बदलाव के लिए काम करती है. अमेरिकी रक्षा एजेंसी की उपलब्धियां काफी अहम हैं. इनमें ARPANET भी शामिल है, जिसकी वजह से इंटरनेट, स्‍टील्‍थ टेक्‍नोलॉजी, माइक्रोइलेक्‍ट्रॉनिक्‍स, निगरानी के लिए सेंसर्स, ड्रोन और इन्‍फ्रारेड नाइट विजन सिस्‍टम बेहरीन तरीके से काम करते हैं. ये सभी युद्ध में काम आने वाली उन्‍नत तकनीक हैं. डीएआरपीए पहले से मौजूद तकनीक को बेहतर बनाने या संख्‍या बढ़ाने के बजाय नई तकनीक विकसित करने के कारण सफल रक्षा एजेंसी है.

DRDO देखे भविष्‍य के बारे में कैसे सोचती है डीएआरपीए
भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (DRDO) को देखना चाहिए कि डीएआरपीए भविष्‍य के हथियारों (Future Warfare) के बारे में कैसे सोचती है. डीएआरपीए के टैक्टिकल टेक्‍नोलॉजी ऑफिस (TTO) ने पांच महीने पहले नए युद्धक उपकरण बनाने के लिए अप्‍लाइड रिसर्च, एडवांस्‍ड टेक्‍नोलॉजी डेवलपमेंट, प्‍लेटफॉर्म डेमॉस्‍ट्रेशन, सिस्‍टम स्‍टडीज के लिए फंड का प्रस्‍ताव दिया. टीटीओ ने लिखा, 'अमेरिकी सेना को अपने ऐतिहासिक प्रदर्शन को बरकरार रखने के लिए अपनी क्षमता बढ़ानी होगी.' इस नोट में हवा (Air), जमीन (Ground), समुद्र (Naval) और अंतरिक्ष (Space) प्रणाली में भविष्‍य की क्षमताओं व संभावनाओं के बारे में बताया गया है. इसमें विमान, जहाज, पनडुब्‍बी और भारी-भरकम अंतरिक्ष एसेट्स पर निर्भरता कम करने की बात कही गई है.

टीटीओ ने कम लागत वाली ऐसी नेटवर्क प्रणाली की परिकल्पना की है, जो भविष्य के युद्ध के लिए विध्‍वंसक हथियार क्षमता बढ़ाने का काम करेगी.

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तीनों सेनाओं के लिए डीएआरपीए ने बनाई है अलग योजना
टीटीओ ने कम लागत वाली ऐसी नेटवर्क प्रणाली (Network System) की परिकल्पना की है, जो भविष्य के युद्ध के लिए विध्‍वंसक हथियार क्षमता बढ़ाने का काम करेगी. डीएआरपीए के दस्‍तोवजों के मुताबिक, वायु प्रणाली को बेहतर प्रदर्शन (उदाहरण के तौर पर हाइपरसोनिक विमान) और कम लागत के जरिये कहीं ज्‍यादा विध्‍वंसक बनाया जाएगा. नौसेना (Naval) के लिए व्‍यावसायिक डिजाइन के जरिये छोटे (Small), सस्‍ते (Inexpensive) और भारी-भरकम नेटवर्क (Heavy Networked) वाले जहाज बनाए जाएंगे. अंतरिक्ष में 'जियोसिंक्रोनस अर्थ ऑर्बिट' (GEO) एसेट्स पर निर्भरता घटाने के लिए 'लो अर्थ ऑर्बिट' (LEO) एसेट्स बनाए जाएंगे. थल सेना (Army) के मामले में गतिशील और घातक छोटी यूनिटों पर ध्‍यान देने की बात कही गई है.

छोटे और हेवी नेटवर्क सिस्‍टम्‍स पर जोर दे रही अमेरिकी एजेंसी
साफ है कि डीएआरपीए भविष्‍य की युद्धक प्रणाली के तहत मौजूदा समय में दुनिया भर में इस्‍तेमाल की जा रहीं महंगी वायु व नौसेना प्रणालियों के बजाय छोटे, नेटवर्क्‍ड सिटसम्‍स पर जोर दे रही है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि लड़ाकू विमान, नौसेना के डिस्‍ट्रॉयर और पनडुब्बियों की उपयोगिता निकट भविष्‍य में कम नहीं होगी, लेकिन समय के साथ युद्ध जीतने की उनकी क्षमता पर सवाल बढ़ते जाएंगे. सऊदी अरब के पास अत्‍याधुनिक हवाई रक्षा प्रणाली है, लेकिन ये तेल कंपनी आरामको पर हमला करने वाले सस्‍ते, कम ऊंचाई पर उड़ान भरने वाले ड्रोन और क्रूज मिसाइलों के सामने नाकाम हो गई.

DRDO भविष्‍य की तकनीक के बजाय जरूरतें पूरी करने में जुटा है
रक्षा क्षेत्र में दुनिया में पांचवां सबसे ज्‍यादा खर्च करने वाला देश होने के बाद भी भारत (India) का ध्‍यान एडवांस्‍ड टेक्‍नोलॉजी (Advanced Technology) पर बहुत कम है. हमारी सैन्‍य तकनीक उपलब्धि (Achievment) पुराने टैंक, हेलीकॉप्‍टर और मिसाइल बनाने तक सीमित है. इसके अलावा हम टेक्‍नोलॉजी ट्रांसफर (Technology Transfer) होने पर विदेशी हथियारों की फैक्ट्रियां स्‍थापित करने में लगे हैं. सेना, नौसेना और वायु सेना अपने हथियारों की संख्या कम करने की इच्‍छुक नहीं हैं. इसलिए हम उन प्लेटफार्मों या हथियार प्रणालियों की खरीद कर रहे हैं जो उन्हें मौजूदा ढांचे को बनाए रखने की अनुमति देते हैं. भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (DRDO) भी भविष्‍य की तकनीक पर काम करने के बजाय सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने में ही जुटा है.

डीआरडीओ और डीएआरपीए के सालाना बजट में बहुत ज्‍यादा अंतर नहीं होने के बाद भी अमेरिकी एजेंसी बेहतर काम कर रही है.


बजट में ज्‍यादा अंतर नहीं होने के बाद बेहतर कर रही DARPA
डिफेंस एडवांस्‍ड रिसर्च प्रोजेट्स एजेंसी (DARPA) का सालाना बजट (Annual Budget) 3 अरब डॉलर (213 अरब रुपये से ज्‍यादा) है. वहीं, भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (DRDO) का सालाना बजट 2.5 अरब डॉलर (177 अरब रुपये से ज्‍यादा) है. दोनों के सालाना बजट में जरूरतों के मुताबिक बहुत ज्‍यादा फर्क नहीं है. सवाल यही उठता है कि फिर अमेरिकी एजेंसी भारतीय संगठन के मुकाबले ज्‍यादा काम कैसे कर पा रही है. इसका सीधा कारण है कि डीएपीआरए एक फंडिंग एजेंसी है. उसके पास न तो लैब है और न ही कोई स्‍टाफ है. इसमें 200 लोग काम करते हैं. इनमें आधे लोगों को तीन से पांच साल के लिए नियुक्‍त किया जाता है. ज्‍यादातर शोध यूनिवर्सिटीज, इंडस्‍ट्री या सरकारी शोध व विकास संस्‍थानों के जरिये कराया जाता है.

डीआरडीओ के पास शोध के लिए बच रहा है सीमित पैसा
DARPA के उलट डीआरडीओ में करीब 30,000 कर्मचारी काम करते हैं. डीआरडीओ की अपनी 50 से ज्‍यादा लैब (Labs) हैं. डीआरडीओ को चलाने में ही इतना पैसा खर्च हो रहा है कि शोध के लिए सीमित राशि ही उपलब्‍ध हो पा रही है. इसमें कोई शक नहीं कि डीआरडीओ ने अंतरराष्‍ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद भारत को परमाणु शक्ति संपन्‍न देश में बनाने में सफलता हासिल की. डीआरडीओ तीनों सेनाओं के लिए जरूरी उपकरणों की जरूरत को पूरा करने से इनकार नहीं कर सकता. 'मेक इन इंडिया' प्रोग्राम से भी इसमें मामूली मदद ही मिल पाई. इस पर भी बहस की जा सकती है कि भारत की रणनीतिक जरूरतें अमेरिका जैसी नहीं हैं. ये सभी तर्क जायज भी हैं, लेकिन भविष्‍य की जरूरतों के मुताबिक युद्धक प्रणाली विकसित करने की जरूरत से भी इनकार नहीं किया जा सकता है.

(लेखक भारतीय सेना में उत्‍तरी कमांड के पूर्व प्रमुख हैं. भारतीय सेना ने 2016 में उन्‍हीं के नेतृत्‍व में पाकिस्‍तान में घुसकर सर्जिकल स्‍ट्राइक को अंजाम दिया था. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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First published: November 25, 2019, 5:12 PM IST
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