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पंजाब और हरियाणा में इस कानून के चलते पराली जलाने को मजबूर हैं किसान

News18Hindi
Updated: November 5, 2019, 1:24 PM IST
पंजाब और हरियाणा में इस कानून के चलते पराली जलाने को मजबूर हैं किसान
क़ानून के मुताबिक धान की फ़सल को लगाने का वक़्त किसान नहीं, बल्कि राज्य सरकार तय करती है

अगर किसान ने सरकार के बताए वक़्त से पहले ही फ़सल की बुआई कर दी, तो 10 हज़ार रुपए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जुर्माना देना पड़ता है. एक से ज़्यादा बार अगर क़ानून का उल्लंघन हुआ तो किसान का बिजली का कनेक्शन भी काटा जा सकता है.

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  • Last Updated: November 5, 2019, 1:24 PM IST
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दिवाली के बाद से दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) में खतरनाक प्रदूषण (Pollution) के चलते कोहराम मचा है. दिल्ली सरकार इसके लिए पंजाब और हरियाणा के किसानों को ज़िम्मेदार ठहरा रही है. कहा जा रहा है कि दिल्ली में धुंध की असली वजह किसानों का पराली जलाना (Stubble Burning) है. वैसे देखा जाए तो हरियाणा और पंजाब में पराली की परेशानी के पीछे दोनों राज्यों का एक क़ानून भी है.

क्या है ये कानून?
क़ानून के मुताबिक धान की फ़सल को लगाने का वक़्त किसान नहीं, बल्कि राज्य सरकार तय करती है और राज्य सरकार के बताए वक़्त पर ही किसानों को धान की फ़सल लगानी पड़ती है. ये क़ानून 2009 में बनाया गया था, जिसका मकसद दोनों राज्यों में अंडरग्राउंड वॉटर यानी ज़मीन के नीचे के पानी के स्तर को ऊपर लाना था. लेकिन तभी से धान की फ़सल की बुआई देर से होनी शुरू हो गई. कभी मई में बोई जाने वाली धान की फ़सल अब आधा जून बीत जाने के बाद की जाती है.

किसानों की मजबूरी


कानून का मकसद भूमिगत जल के स्तर को बढ़ना
जो क़ानून दोनों राज्यों में किसानों के लिए धान की बुआई का वक़्त तय करता है, उसे 'भूजल संरक्षण अधिनियम क़ानून' नाम दिया गया है. पंजाब में 2009 में बनाए गए इस क़ानून का मकसद लगातार गिर रहे भूमिगत जल के स्तर को ऊपर उठाना था. सबसे अहम बात ये कि इस क़ानून के तहत राज्य सरकार का कृषि विभाग ही किसानों को धान की फ़सल बोने का वक़्त बताता है. सरकार ऐसा इसलिए करती है, ताकि बारिश का पानी किसानों की मदद करे और किसान धान की फ़सल लगाने के लिए सबमरसिबल पम्प और दूसरी तकनीक के ज़रिये अंडरग्राउंड वॉटर कम खींचें. धान की बुआई के बाद उसे काफ़ी पानी की ज़रूरत पड़ती है. अगर मॉनसून के आने से महीना भर पहले बुआई की जाएगी, तो पानी की ज़रूरत को अंडरग्राउंड वॉटर से पूरा करना पड़ेगा. लेकिन अगर मॉनसून के चंद रोज़ पहले ही बुआई होगी, तो बारिश से पानी की ज़रूरत पूरी हो जाएगी.

कानून न मानने पर जुर्माना
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अगर किसान ने सरकार के बताए वक़्त से पहले ही फ़सल की बुआई कर दी, तो 10 हज़ार रुपए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जुर्माना देना पड़ता है. एक से ज़्यादा बार अगर क़ानून का उल्लंघन हुआ तो किसान का बिजली का कनेक्शन भी काटा जा सकता है. पंजाब में इस क़ानून को जब बनाया गया, तो इसका भारी विरोध किसानों ने किया, लेकिन सरकार ने क़दम वापस नहीं खींचा बल्कि पंजाब की देखा देखी हरियाणा की सरकार ने भी ऐसा ही क़ानून पास कर दिया.

पराली को अगर हाथ से हटाया जाए या मशीनों से हटा कर बाज़ार में पहुंचाया जाए, तो उसमें पैसा ही नहीं, वक़्त भी ख़र्च होगा.


सरकार की मजबूरी
दूसरी अहम बात ये भी है कि पंजाब में किसानों को बिजली का बिल नहीं देना पड़ता. राज्य सरकार ने किसानों के लिए बिजली मुफ़्त की हुई है. इसलिए सरकार धड़ल्ले से ट्यूबवैल और सबमरसिबल पम्प चला कर ज़मीन के नीचे का पानी खींचते हैं. लेकिन अंडर ग्राउंड वॉटर को बचाने के लिए सरकार ने क़ानून बना दिया. फ़सल की बुआई का वक़्त एक महीना आगे बढ़ गया और यही एक महीना फ़सल काटने में भी आगे बढ़ गया. यानी जो फ़सल पहले सितम्बर के आख़िर में और अक्टूबर की शुरुआत में काटी जाती थी, वो फ़सल अब अक्टूबर के आख़िर में और नवम्बर की शुरुआत में काटी जाने लगी है. ये वक़्त इसलिए भी किसानों के लिए नाज़ुक होता है, क्योंकि ठंड के बढ़ने से पहले किसान खेत में अगली फ़सल लगाने के लिए मजबूर है.

किसानों की दिक्कत
ज़्यादातर किसान धान के बाद गेहूं की बुआई करते हैं. इसलिए धान की फ़सल को जल्द से जल्द हटा कर गेहूं की बुआई करना किसानों की बड़ी चिंता है. पराली को अगर हाथ से हटाया जाए या मशीनों से हटा कर बाज़ार में पहुंचाया जाए, तो उसमें पैसा ही नहीं, वक़्त भी ख़र्च होगा. लेकिन किसानों के पास वक़्त काफ़ी कम बचा होता है.

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हरियाणा में खेत में किसानों के पराली जलाने पर रोक लागू है (प्रतीकात्मक तस्वीर)


किसानों की मजबूरी
सरकार अंडरग्राउंड वॉटर का स्तर ऊपर उठाने के अपने मकसद में तो कामयाब हो गई. लेकिन बीते कुछ सालों में शायद इसी का असर ये हुआ कि पराली देश के लिए बड़ी समस्या बन गई. क्योंकि धान की कटाई के बाद अगली फ़सल लगाने के लिए किसानों के पास वक़्त काफ़ी कम बच जाता है और वो पराली को आग लगाने के अलावा कुछ नहीं कर पाते. दूसरी तरफ़ यही वक़्त दिल्ली के लिए प्रदूषण के लिहाज़ से सबसे नाज़ुक भी होता है, क्योंकि इसी दौरान हवा चलनी बंद हो जाती है और ठंड दस्तक दे चुकी होती है. यानी फ़सल की कटाई का वक़्त आगे खिसकना, किसानों की बड़ी मात्रा में पराली जलाना और दिल्ली में मौसम का मिज़ाज बदलना... सबकुछ एक साथ मिलकर लोगों को ज़हरीली हवा में सांस लेने को मजबूर कर देते हैं. लेकिन पंजाब की सरकार इस दलील को बिलकुल नहीं मानती कि उसके क़ानून का प्रदूषण से कोई संबंध है.

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First published: November 5, 2019, 1:24 PM IST
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