फ्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप पारुलकर की कहानी जल्‍द सिने पर्दे पर आएगी नजर

भाषा
Updated: August 13, 2017, 10:22 PM IST
फ्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप पारुलकर की कहानी जल्‍द सिने पर्दे पर आएगी नजर
फ्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप पारुलकर (Source: Twitter)
भाषा
Updated: August 13, 2017, 10:22 PM IST
फ्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप पारुलकर की जाबांजी से भरी कहानी को अब बड़े परदे पर उतरा जाएगा. 1971 में भारत-पाक की लड़ाई के दौरान पारुलकर उनके 11 अन्य साथियों के साथ बंदी बनाया गया था.

फ्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप पारुलकर ने 1968 की एक खुशनुमा शाम को अपने कमांडिंग अधिकारी एम एस बावा के साथ रात का खाना खाते समय कहा था, 'हम दुश्मन के क्षेत्र में अंदर तक लड़ते हैं और एक गोली हमारे विमान को नष्ट कर सकती है. अगर मुझे कभी युद्धबंदी बनाया जाएगा तो मैं बच निकलूंगा.'

इस घटना के तीन साल बाद 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब पारुलकर को भारतीय वायुसेना के 11 अन्य पायलटों जब बंदी बनाया गए तो पारुलकर ने वह कर दिखाया जिसका उन्होंने वादा किया था.

इस साहसिक कारनामे में पारुलकर का साथ फ्लाइट लेफ्टिनेंट एमएस ग्रेवाल और फ्लाइट लेफ्टिनेंट हरीश सिंहजी ने दिया. वे तीनों रावलपिंडी के पास जेल शिविर से भाग गये और पाकिस्तान के पश्चिम में पाक-अफगान सीमा पर जमरूद पहुंचे, जहां उन्हें फिर से बंदी बना लिया गया और पेशावर ले जाया गया.

एक साल बाद उन्हें औपचारिक रूप से छोड़ा गया. इस पूरे ऐतिहासिक घटनाक्रम पर अब फिल्म बनाई गयी है.

तरणजीत सिंह द्वारा निर्देशित 'द ग्रेट इंडियन एस्केप' का प्रदर्शन पिछले सप्ताह यहां वायु सेना के ऑडिटोरियम में किया गया. इसमें पारुलकर की भूमिका में राघव रिषी, ग्रेवाल के किरदार में राज सिंह अरोड़ा और सिंह जी के किरदार में आशीष कपूर दिखाई देंगे. जल्द ही फिल्म भारत में रिलीज होगी.

इस घटनाक्रम के समय 29 साल के पारुलकर ने 1971 की सर्दियों को याद करते हुए कहा, 'मैं भाग निकलने के बारे में पूरी तरह सुनिश्चित था. वायु सेना की हमारी ड्यूटी में यह तय होता है कि युद्धबंदी बनने की स्थिति में आपको बच निकलने का प्रयास करना होगा और यथासंभव जल्द अपने मूल बल में लौटना होगा.'

जब 74 वर्षीय पारुलकर से पूछा गया कि क्या यह सब करने के नतीजे खतरनाक नहीं हो सकते, उन्होंने कहा, 'जो भी सामने आए, उससे निपटना होता है. चाहे कुछ भी हो.'

पारुलकर के सुखोई-7 विमान को 10 दिसंबर, 1971 को मार गिराया गया था. उस समय पारुलकर लाहौर के पूर्व में एक रडार स्टेशन पर बमबारी में व्यस्त थे. इस घटना के छह दिन बाद भारत-पाक युद्ध समाप्त हुआ था.
First published: August 13, 2017
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