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घोड़ी पर बिंदौरी निकालने में कामयाब हुई दलित दुल्हन, पुलिस पहरे में हुई शादी

Bhawani Singh | News18Hindi
Updated: July 3, 2017, 11:52 PM IST

पुलिस के पहरे में ही दलित दुल्हन लीला की बिंदौरी निकली.

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देश की आजादी के 67 साल बाद भी लोगों की सोच नहीं बदली. मानसिक गुलामी हिंदुस्तान में अब भी जिंदा है. दलितों को अब भी सम्मान से जीने के अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

ये घटना पाली के दुर्जन गांव की है. एक दलित दुल्हन लीला शादी से पहले गांव में घोड़ी पर अपनी बिंदौरी निकालना चाहती थी. दंबगों को दलित और वो भी लड़की का घोड़ी पर बैठना पसंद नहीं आया. दंबगों ने धमकाया. डरकर बिंदौरी निकालने का प्लान रद्द करने के बजाय पाली के एसपी से परिवार ने सुरक्षा मांगी.

पुलिस फोर्स गांव पहुंची और पुलिस के पहरे में ही दलित दुल्हन लीला की बिंदौरी निकली. बिंदौरी उन दबंगों के घर के सामने से भी निकली जिन्होंने बिंदौरी नहीं निकालने की धमकी दी थी. परिवार खुशी से घोड़ी के आगे जमकर झूमा. जमकर ठुमके लगाए. सोमवार को लीला के सात फेर हुए. बारात आई. गांव में पुलिस तैनात हुई. पुलिस पहरे में ही शादी हुई.

लीला और उसके परिवार का घोड़ी पर बिंदौरी निकालने का मकसद शक्ति प्रदर्शन नहीं था. लीला भी वही करने जा रही थी जो गांव में अगड़ी जातियों की शादी में होता है. फिर लीला को दंबग क्यों रोक रहे थे. वजह इतनी सी कि वो दलित थी. गांव को दलितों को ये हक 67 साल बाद क्यों मिला. वो भी पुलिस की मदद से.

सवाल ये कि धर्म की ठेकेदारी करने वालों ने कभी दलितों के बराबरी का ये हक दिलाने की कोशिश ही नहीं की. राजस्थान में कई इलाके ऐसे भी हैं, जहां दबंग अब भी दलितों को समाज में बराबरी का हक देने को तैयार नहीं.

कभी उन्हें मंदिर में घुसने से रोका जाता है, कभी घोड़ी से उतारा जाता है तो कभी उनको सार्वजनिक पंप से पानी लेने से रोका जाता है. हैरानी की बात ये है कि ऐसा तब होता है जब राजस्थान में दलित आबादी के मामले में दूसरी जातियों से अधिक या उनके बराबर है. जनप्रतिनिधियों को चुनने में उसकी भागीदारी कहीं ज्यादा है. बावजूद संविधान के अनुच्छेद 25 के उन्हें सम्मान से जीने के अधिकार को हासिल करने में आज भी पुलिस की मदद लेनी पड़ रही है. ये पूरे समाज के लिए शर्म से कम नहीं है.

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First published: July 3, 2017, 11:32 PM IST
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