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प्रकाश आंबेडकर- महाराष्ट्र में दलितों के प्रतिनिधित्व का उभरता चेहरा

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Updated: October 14, 2019, 6:37 PM IST
प्रकाश आंबेडकर- महाराष्ट्र में दलितों के प्रतिनिधित्व का उभरता चेहरा
दलितों के प्रतिनिधित्व के उभरते चेहरे, प्रकाश आंबेडकर

प्रकाश आंबेडकर को महाराष्ट्र में दलितों के प्रतिनिधित्व के उभरते चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है. पिछले एक दशक से महाराष्ट्र की दलित राजनीति उनके ईर्द-गिर्द घूमती मानी जाती है.

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  • Last Updated: October 14, 2019, 6:37 PM IST
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बालासाहब आंबेडकर नाम से लोकप्रिय प्रकाश यशवंत आंबेडकर संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर  के पोते हैं. पिछले एक दशक से महाराष्ट्र की दलित राजनीति उनके ईर्द-गिर्द घूमती मानी जाती है. प्रकाश आंबेडकर को महाराष्ट्र में दलितों के प्रतिनिधित्व के उभरते चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है. भीमा कोरेगांव हिंसा और SC/ST एक्ट को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों ने प्रकाश आंबेडकर को दलितों के अधिकार की राजनीति में उभार का नए सिरे से मौका दिया.

प्रकाश आंबेडकर का जन्म 10 मई 1954 को हुआ और मुंबई के सेंट स्टेनिसलाओस से हाई स्कूल और सिद्धार्थ कॉलेज से शिक्षा हासिल की. वो न सिर्फ एक राजनीतिज्ञ बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता और वकील भी हैं. प्रकाश आंबेडकर संसद के दोनों सदन राज्यसभा और लोकसभा के सांसद रह चुके हैं.

वामपंथी समाजवादी धारा की सियासत के चलते 80 के दशक के मध्य में वो देश की दलित राजनीति और दलित संगठनों के केंद्र में आ गए. 4 जुलाई 1994 को उन्होंने भारतीय रिपब्लिकन पक्ष (भारिप) बहुजन महासंघ की स्थापना की. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया से अलग हुए धड़ों को मिलाकर ये संगठन तैयार हुआ. इसके ज़रिए प्रकाश आंबेडकर ने दलित संगठनों में एकता बनाने की कोशिश की.

साल 1990 से 1996 तक वो राज्यसभा सांसद रहे. साल 1998 में अकोला लोकसभा सीट से वो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के उम्मीदवार के रूप में सांसद का चुनाव जीते. दूसरी बार साल 1999 में भारिप बहुजन महासंघ के उम्मीदवार के तौर पर अकोला से सांसद चुने गए.

साल 2018 में उन्होंने समाज के वंचित और शोषित वर्ग के अधिकारों को अपनी राजनीति की प्रयोगशाला का कामयाब टेस्ट मानते हुए वंचित बहुजन अघाड़ी नाम की पार्टी का गठन किया. पुराने फॉर्मूले में ‘अकोला प्रयोग’ की सोशल इंजीनियरिंग कर उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति में कम समय में ही बड़े सियासी समीकरण साधने का काम किया. उनकी पार्टी का प्रभाव विदर्भ इलाके के अकोला जिले के आसपास ही केंद्रित माना जाता है.

लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में दलित-मुस्लिम समीकरण के जरिए उन्होंने एक तीसरा मोर्चा तैयार किया था. प्रकाश आंबेडकर ने अपनी पार्टी वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) पार्टी का असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM पार्टी के साथ गठबंधन किया था. लेकिन इस गठबंधन को जीत हासिल नहीं हुई. यहां तक कि खुद प्रकाश आंबेडकर ही दो जगह से चुनाव हार गए. वो महाराष्ट्र के शोलापुर और विदर्भ के अकोला से चुनाव लड़े लेकिन जीत नहीं सके.

लेकिन इस गठबंधन ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे और स्वाभिमानी शेतकरी के राजू शेट्टी जैसे दिग्गज नेताओं को हराने का पक्का बंदोबस्त जरूर कर डाला. माना जाता है कि इस गठबंधन की वजह से कांग्रेस और एनसीपी को 2019 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में 12 सीटों पर खासा नुकसान पहुंचा.
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असदउद्दीन ओवैसी और प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के गठबंधन ने कांग्रेस और एनसीपी के दलित और मुस्लिम वोट बैंक में जोरदार सेंधमारी की. जिस वजह से इस गठबंधन को वोट-कटवा नाम भी मिला. महाराष्ट्र में एनसीपी को 4 और कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली.

राजनीति में किसी पार्टी की बड़ी जीत की वजह से उसका सियासी कद आंका जाता है. लेकिन महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर की पार्टी ऐसी है जिसकी हार के बावजूद सियासी कद में ऊंचाई महसूस की गई है. हालांकि प्रकाश आंबेडकर के लिए राहत की बात ये है कि विदर्भ, पश्चिम महाराष्ट्र, उत्तर महाराष्ट्र और मराठावाडा में उनके उम्मीदवारों को अच्छे वोट मिले. ऐसे में इस बार विधानसभा चुनाव में प्रकाश आंबेडकर दूसरी पार्टियों का खेल बिगाड़ने के साथ अपनी पार्टी के लिए नई ज़मीन के लिए भी तैयार हैं.

लेकिन इस बार चुनाव से पहले ही प्रकाश आंबेडकर को उनके सहयोगी असदुद्दीन ओवैसी से झटका मिला है.  असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर बहुजन अगाड़ी से नाता तोड़ लिया है और वो अकेले ही चुनाव लड़ना चाहती है. जबकि साल 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में AIMIM  25 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 2 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. अब जबकि AIMIM अपनी सीटों को बढ़ाना चाहती है तो प्रकाश आंबेडकर उन्हें केवल 8 सीटें देना चाहती है. हालांकि प्रकाश आंबेडकर को उम्मीद है कि शायद ओवैसी से गठबंधन हो जाए.

पिछले 25 साल से वामपंथी और समाजवादी विचारधारा के साथ दलितों की राजनीति करने वाले प्रकाश आंबेडकर ने सत्ता के लिए कभी कांग्रेस या बीजेपी से समझौता नहीं किया. हालांकि कई दलित नेता समय के साथ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के साथ हो लिए. जबकि प्रकाश आंबेडकर वामपंथी, समाजवादी और सभी दलित पार्टियों को साथ लेकर चलने की कोशिश करते रहे.

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First published: October 14, 2019, 6:37 PM IST
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