दम तोड़ता पर्यावरण और धूमिल होती प्रकृति

हम पर्यावरण को खुद से बहुत दूर करते जा रहे हैं.

वायु की गुणवत्ता पर इतना प्रभाव पड़ा है कि हम अनेकानेक बीमारियों का गढ़ बनते जा रहे हैं. प्रकृति अगर इसी गति से नष्ट होती गयी और हमने सही कदम उठाने में देर की, तो हम कभी भी अपने परिवेश को सुरक्षित नहीं कर पाएंगे और इसका प्रतिकूल प्रभाव जन-जीवन में तेज़ी से दिखाई देगा.

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नई दिल्‍ली. जीवों में मनुष्य को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है. संभवतः इसलिए क्योंकि मनुष्य सभी प्रजातियों में सबसे बुद्धिमान और रचनात्मक माना गया है. वह अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुओं का निर्माण करता है और निरंतर जीवन को आसान बनाने हेतु नवीन अविष्कार करता रहता है. मगर आसान हुए जीवन और सुविधाओं के मद में खोकर शायद हम यह भूल गए हैं कि हम इस प्रकृति का एक छोटा सा हिस्सा मात्र हैं, जिसका हम धड़ल्ले से शोषण कर रहे हैं. हम अपनी जरूरतों के हिसाब से वनों का नाश किये जा रहे हैं और कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहे हैं.


कम होते पेड़-पौधों की वजह से गैसियस एक्सचेंज में असर पड़ता है और परसेंटेज ऑक्सीजन में कमी आती है. वनों की छटाई के कारण जल-चक्र की प्रक्रिया को बहुत नुकसान पहुंचता है और समय पर बारिश न होने के कारण सूखा पड़ने जैसी स्थिति निर्मित हो जाती है. ग्लोबल वार्मिंग की समस्या कोई नई नहीं है. प्राइमरी शिक्षा प्राप्त किये हर व्यक्ति को ग्लोबल वार्मिंग के बारे में पता होता है और जिन्हें नहीं पता उन्होंने समय के साथ पृथ्वी के बढ़ते तापमान को महसूस किया है. ग्रीनहाउस गैसों (मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड) के अत्यधिक रिसाव के कारण वायुमंडल में इनके जमा होने की वजह से ग्लोबल वार्मिंग होती है.


बिना हिचक हो रहा है प्‍लास्टिक का इस्‍तेमाल
इस प्रकार की गैसों की उत्पत्ति नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरा जैसे प्लास्टिक जलने, अनेकों विस्फोट, पटाखों, हवा में छोड़ा गया इंडस्ट्रियल वेस्टेज, गाड़ियों से निकलने वाले धुंए के कारण वायुमंडल में जमा होने लगती हैं. पॉलिथीन या प्लास्टिक बैग मानव की अप्रतिम कृति मानी गयी है, जिसे रोज़मर्रा के जीवन में हर जगह देखा जा सकता है. लगभग सभी लोग जानते हैं कि प्लास्टिक कचरा कभी भी डीग्रेड नहीं होता, यानी यह अनेकों वर्षों तक उसी अवस्था में पड़ा रह सकता है. मगर इसका इस्तेमाल प्रत्येक व्यक्ति बिना हिचक के करता है.


यह कचरा आने वाले समय में मनुष्य के लिए एक और आपदा के समान खड़ा हो जाएगा पर शायद हम सीख भी चोट खाने के बाद ही लेते हैं. मगर इस गलती को सुधारा नहीं जा सकेगा
. पृथ्वी पर केवल सीमित संसाधन ही हैं, पर जनसंख्या में वृद्धि इस प्रकार है कि जिसका कोई पार नहीं. भारत देश में हर व्यक्ति पर 103-120 वर्ग फ़ीट की जमीन है. जनसंख्‍या विस्फोट से प्राकृतिक संसाधनों का अनियन्त्रित शोषण हो रहा है.


वायु की गुणवत्ता पर इतना प्रभाव पड़ा है की हम अनेकानेक बीमारियों का गढ़ बनते जा रहे हैं . प्रकृति अगर इसी गति से नष्ट होती गयी और हमने सही कदम उठाने में देर की तो हम कभी भी अपने परिवेश को सुरक्षित नहीं कर पाएंगे और इसका प्रतिकूल प्रभाव जन-जीवन में तेज़ी से दिखाई देगा .


प्रकृति को खुद से कर रहे हैं दूर
मनुष्य का जन्म प्रकृति की गोद में हुआ, लेकिन हम इसी पर्यावरण से खुद को दूर, अति दूर करते जा रहे हैं. क्या यह विचार-योग्य नहीं? क्या किसी ने पर्यावरण के बारे में नहीं सोचा? क्या पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम नहीं उठाये गए? इसका जवाब है कि जिस प्रकार पुस्तकों में पर्यावरण प्रदूषण के बारे में पढ़ा कर, जानकारी देकर, उस जानकारी का उद्देश्य मात्र परीक्षा पास करवाना रह गया है. उसी प्रकार, पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के उत्थान के लिए कई तरह के आयोजन और संरचनाएं बनाई गई हैं, मगर इसका प्रभाव कितना है यह तो जग जाहिर ही है.


तो दिक्कत कहाँ है? दिक्कत है हमारे जीवन जीने के तरीकों में. दिक्कत है जानकारी होते हुए भी उसका उपयोग ना करने में. दिक्कत है जलवायु का जिम्मा सिर्फ कुछ लोगों के हाथ ही होने में. आखिर पर्यावरण तो सभी का है ना? इसका भोग तो सब कर रहे हैं? इसे गंदा करने में भी सभी का हाथ है तो फिर इसकी सुरक्षा करना कुछ व्यक्तियों या या संघटन का कार्य कैसे हो सकता है?


हम प्रकृति के प्राणी हैं. इस से मिले फल फूल, उपज, अनाज, जल, मिटटी, पेड़, पहाड़ों और नदियों ने हमारा सदियों से पोषण किया है. अतः इसको दीर्घकाल तक सुचारु रूप से चलित रखने हेतु हमें इस जैविक तंत्र का इस प्रकार उपयोग करना होगा कि इसकी विविधिता बनी रहे और यह स्वस्थ रूप से उत्पादन करता रहे. हमें संधारणीयता का उपयोग कर इन सीमित संसाधनों को बचाये रखते हुए वृद्धि और विकास की ओर चलना है(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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