आजादी के बाद जब देश में कांग्रेस का वर्चस्व था, तब किसने निभाई विपक्ष की भूमिका?

क्या देश के सांसदों को दल बदलने के लिए क़ानून के तहत हो सकती है सज़ा? आज हम आपको हिन्दुस्तान की राजनीति के ऐसे ही कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में बताएंगे.

News18India
Updated: June 18, 2019, 5:43 PM IST
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स्वतंत्रता के बाद जब देश के सिर्फ कांग्रेस का वर्चस्व था, तब किसने निभाई विपक्ष की भूमिका? भारत के पहले और आखिरी गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने क्यों दिया 'व्हिप' सिस्टम? और क्या देश के सांसदों को दल बदलने के लिए क़ानून के तहत हो सकती है सज़ा? आज हम आपको हिन्दुस्तान की राजनीति के ऐसे ही कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में बताएंगे.

संविधान लागू होने के 10 साल के अंदर सच साबित हुई  ये बात

दरअसल संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ भीमराव आंबेडकर और दूसरे सदस्यों को देश में संसदीय लोकतंत्र का तरीका तय करते वक़्त एक ही चिंता थी कि सांसद जनता की बजाय पार्टी के होकर न रह जाएं. आखिरकार सर्व सहमति से जवाहर लाल नेहरू की बात मानी गई, जिन्हें उम्मीद थी कि सांसद अपने क्षेत्र की जनता के प्रति जवाबदेह रहेंगे. लेकिन सांसदों के रवैये के बारे में जो आशंका संविधान सभा में जताई गई थी, वो संविधान लागू होने के 10 साल से भी कम समय में सच साबित हुई. सांसदों के लिए जनता की बजाय पार्टी महत्वपूर्ण हो गई और इसी वजह से पहले भारतीय और देश के आखिरी गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने 1959 में स्वतंत्र पार्टी बनाई थी.

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी


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1960 में राजगोपालाचारी ने "WHY SWATANTRA" शीर्षक से लिखे गए आर्टिकल में बताया था कि नई पार्टी बनाने की ज़रूरत क्यों पड़ी. उन्होंने लिखा था कि संसद में विपक्ष नाम की चीज़ नहीं है, जिससे लोकतंत्र को ख़तरा है. कांग्रेस की सरकार बहुमत में होने की वजह से अपने विचार देश पर थोप रही है. संसद में व्हिप के जरिए सांसदों से जबरन वोटिंग कराई जा रही है और इसीलिए चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र पार्टी के सांसदों के लिए नियम लागू कर दिया था.

स्वतंत्र पार्टी के सांसदों को दी गई खुली छूट 
राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र पार्टी के सांसदों को संसद में अपनी बात कहने के लिए पूरी तरह आज़ाद छोड़ दिया था. सांसदों के लिए किसी भी मुद्दे पर व्हिप जारी नहीं किया जाता था. स्वतंत्र पार्टी के सांसदों को जनता के मुद्दे पर सरकार की बुराई या तारीफ़ करने की खुली छूट थी, जिसका असर ये हुआ कि अपनी स्थापना के तीसरे साल में ही स्वतंत्र पार्टी ने 1962 में 18 सीटें जीतीं थीं और CPI के बाद दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन गई थी.

डॉ भीमराव आंबेडकर


महगठबंधन के नाम पर ठगी गई स्वतंत्र पार्टी 

इसके बाद 1967 में स्वतंत्र पार्टी ने 44 सीटों पर जीत दर्ज की और लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन गई थी. लेकिन, 1971 में इंदिरा गाँधी को हराने के नाम पर स्वतंत्र पार्टी विपक्ष के महागठबंधन में शामिल हो गई थी, ये प्रयोग फेल रहा और स्वतंत्र पार्टी सिर्फ़ 8 सीटों पर सिमट गई थी.

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