UP Election: यूपी चुनाव से पहले तेजी से बिखर रही है बसपा, जानें 2022 के चुनाव के लिए इसके मायने

मायावती ने लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद गठबंधन को एकतरफा तोड़ दिया था. (फाइल फोटो)

UP Politics Update: उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव (2022 Assembly Elections) से पहले मायावती (Mayawati) के दल का बिखरना बसपा के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी करता नजर आ रहा है. वहीं, मयावती खुद लगातार कई नेताओं को बर्खास्त करती जा रही हैं.

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    लखनऊ. बहुजन समाज पार्टी के बागी विधायकों और समाजवादी पार्टी (SP) प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) की मुलाकात के बाद उत्तर प्रदेश में सियासी उठापटक जारी है. बसपा से निष्कासित 9 विधायक जहां मंगलवार को अखिलेश यादव से मिलने समाजवादी पार्टी के मुख्यालय पहुंचे तो वहीं कुछ बागियों ने अलग पार्टी बनाने की बात रखी.

    ऐसे में 2022 के विधानसभा चुनाव (2022 Assembly Elections) से पहले मायावती (Mayawati) के दल का बिखरना बसपा के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी करता नजर आ रहा है. वहीं, मयावती खुद लगातार कई नेताओं को बर्खास्त करती जा रही हैं. हालांकि, बसपा में बड़े स्तर पर दल बदलने का कार्यक्रम कोई नया नहीं है.

    शुरू से शुरुआत करते हैं
    1984 में कांशीराम ने पार्टी की नींव रखी. उसके बाद से ही कई बार दल में फूट पड़ी. नेताओं ने आरोप लगाए कि नेतृत्व पर अभिमानी होने और जुड़ाव की कमी होने के आरोप लगाए. इस बार भी कई मामलों में यह बात सामने आ रही है. उस समय नेताओं ने सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी या समाजवादी पार्टी का समर्थन किया. वहीं, कई नेताओं ने अपनी खुद की पार्टी तैयार कर ली.

    1995 का गेस्टहाउस कांड: उस दौरान कथित रूप से वोट प्रभावित करने के चलते बसपा विधायकों को बंधक बना लिया गया था. इसके चलते पार्टी के नेताओं ने दल बदल दिया. बसपा के संस्थापक सदस्य राज बहादुर कुछ विधायकों के साथ अपनी पार्टी बनाने निकल पड़े. महासचिव सोने लाल पटेल ने अपना दल बनाया. अपना दल फिलहाल बीजेपी के साथ गठबंधन में है. इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष जंग बहादुर पटेल भी कई विधायकों के साथ पार्टी से अलग हो गए थे. 1997 में विधायकों के एक समूह ने कल्याण सिंह की बीजेपी सरकार का दामन थामा. वहीं, 2003 में फिर कुछ विधायकों ने सपा प्रमुख मुलायम सिंह के साथ जाना चुना.

    बसपा से क्यों रूठे नेता
    2016 से पार्टी छोड़ने वाले कई प्रमुख नेताओं ने पार्टी नेतृत्व पर जबरन वसूली और अहंकार के आरोप लगाए थे. अब वे कह रहे हैं कि पार्टी लीडरशिप तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया है. ये शिकायतें 2019 सपा-बसपा गठबंधन टूटने के बाद और भी बढ़ीं. नाराजगी तब और ज्यादा बढ़ी जब 2019 में मायावती ने खुले तौर पर कह दिया कि उनके पार्टी के नेता सपा उम्मीदवारों की हार सुनिश्चित करने के लिए बीजेपी का समर्थन करेंगे.

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    2017 विधानसभा चुनाव से पहले नेताओं ने बड़े स्तर पर बीजेपी का रुख किया, लेकिन बाद में और खासतौर से 2019 के बाद वे सपा में आ गए. 2015 के बाद कई बड़े नेताओं बसपा से अलग हो गए. इनमें बर्खास्त किए गए दारा सिंह चौहान, राज्यसभा सांसद जुगल किशोर और पूर्व मंत्री फतेह बहादुर सिंह का नाम शामिल है. 2016 में स्वामी प्रसाद मौर्य भी पार्टी पर घूस लेने और दलितों के साथ धोखा करने के आरोप लगाकर पार्टी से अलग हो गए. इसके बाद बसपा के ब्राह्म्ण चेहरे ब्रजेश पाठक को भी निकाल दिया गया.

    2017 के चुनाव से पहले पार्टी के दिग्ज और 'पासी' चेहरा आरके चौधरी सपा में शामिल हो गए. कहा जाता है कि वे बसपा से इतने नाराज थे कि जब सपा ने बसपा के साथ गठबंधन करने का फैसला किया, तो उन्होंने सपा भी छोड़ दी थी. इसके बाद वे कांग्रेस गए और फिर बाद में सपा की ओर लौट आए. 2017 में बीजेपी की जीत के बाद मायावती के करीबी कहे जाने वाले इंद्रजीत सरोज सपा में आ गए. वहीं, मायावती ने एक और करीबी नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी से बाहर कर दिया. सिद्दीकी को बड़ी मुस्लिम नेता माना जाता है. वे बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए.

    ऐसे शुरू हुआ बसपा का पतन
    2007 में बसपा ने 30 फीसदी वोट शेयर के साथ 403 में से 206 सीटें जीतकर राज्य में सरकार बनाई थी. 2012 में यह आंकड़ा गिरकर 80 और 2017 में 19 सीटों पर पहुंच गया. कई नेताओं को गंवाने के बाद भी मायावती को भरोसा था कि पार्टी का 18-20 फीसदी जनाधार रहेगा. उन्होंने पुराने नेताओं की तरफ से तैयार किए गए नियमों के बजाए नए नेताओं को आगे लाना चुना.



    अब आगे क्या
    बसपा के सामने आई इन मुश्किलों से एक सवाल खड़ा हुआ है कि पार्टी की हार से किसे फायदा होगा. 2012 में बसपा की हार से सपा को फायदा हुआ. कहा जा रहा है कि अब बीजेपी भी बसपा के दलित नेताओं को लुभाने की कोशिश करेगी. हालांकि, अभी भी कई जानकारों का मानना है कि चुनाव के बाद बसपा अहम भूमिका निभाएगी.

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