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Exclusive: 'हर 5 सेकेंड में हम खो रहे फुटबॉल मैदान जितनी मिट्टी'; सदगुरु ने मिट्टी की सेहत के लिए सुझाए तरीके

सद्गुरु ने कहा- हर 5 सेकेंड में कम हो रही फुटबॉल मैदान जितनी उपजाऊ जमीन (फाइल फोटो)

सद्गुरु ने कहा- हर 5 सेकेंड में कम हो रही फुटबॉल मैदान जितनी उपजाऊ जमीन (फाइल फोटो)

Sadhguru News: सदगुरु ने न्यूज 18 से बातचीत में कहा कि आज हम हर समस्या की जड़ों को मिट्टी में तलाश सकते हैं, यही वह बात ...अधिक पढ़ें

नई दिल्ली: मिट्टी के एक-एक कण में जीवन होता है और उसे पोसने, संजोने और संवारने की जरूरत होती है. न्यूज18 के साथ खास बातचीत में ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु ने जोर देकर कहा कि मिट्टी बचाओ अभियान हमारे जीवन में मिट्टी को पुनर्जीवित करने का प्रयास है. मिट्टी बचाओ अभियान पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था के बीच एक अच्छा संतुलन लाने का एक प्रयास है. दुनियाभर में इन दिनों फुटबॉल विश्व कप का खुमार चढ़ा हुआ है, ऐसे में अपनी बात को फुटबॉल से जोड़त हुए सद्गुरु ने कहा कि हर पांच सेकेंड में एक फुटबॉल के मैदान के बराबर की मिट्टी हम खो देते हैं. पिछले 25 सालों में हमने अपनी धरती की 10 फीसद मिट्टी को खो दिया है.

सदगुरु ने न्यूज 18 से बातचीत में कहा कि आज हम हर समस्या की जड़ों को मिट्टी में तलाश सकते हैं, यही वह बात है जो इसे बचाने के लिए जरूरी हो जाती है. किसानों के रासायनिक खाद की जगह प्राकृतिक खाद अपनाए जाने के सवाल पर उन्होंनें कहा कि फसलों की अच्छी सेहत और उत्पादन के लिए प्राकृतिक पोषक तत्व के साथ-साथ रासायनिक खाद का संतुलन बेहद जरूरी है. उन्होंनें विस्तार से कहा कि अगर हम रासायनिक खाद और पेस्टिसाइड के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा देंगे तो हमारी दुनिया का खाद उत्पादन 25 फीसद तक घट जाएगा.

सदगुरू ने कहा कि यह अपनी मौत की सजा पर हस्ताक्षर करने जैसा है. इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जैसे यह कहना कि मैं बगैर दवाई टीके के प्राकृतिक रूप से ठीक हो जाउंगा और अगर ऐसा होता तो फिर देखिए कितने लोग जीवित रह जाते हैं. यही हमारी मिट्टी के साथ भी होगा. बढ़ती आबादी के लिए और अधिक भोजन उगाने की हमारी उत्सुकता में हम ऐसा कर सकते हैं. मैं इस नुकसान को एक पुल की तरह देखता हूं, जिसे किसी समस्या को पार करने के लिए बनाया गया है. एक बार समस्या से पार पा लेने के बाद हमें पुल से नीचे उतर जाना चाहिए, क्योंकि पार हो जाने के बाद पुल पर चढ़े रहने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है.

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने 1940 और 50 के दशक में कई अकाल देखे. रासायनिक खाद ने हरित क्रांति में अहम भूमिका निभाई. लेकिन 1960 के बाद अकाल एक भी नहीं पड़ा लेकिन किसानी के लिए बुरे साल सामने आए. सीमित मात्रा में केमिकल फर्टिलाइजर्स का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. सीमित मात्रा में रासायनिक खाद, मिट्टी के लिए ठीक वैसा ही काम करेगी, जिस तरह वैक्सीन काम करती है.

इस सवाल पर कि क्या किसान आज मिट्टी को फिर से ऊर्जावान बनाने और माइक्रोबियल जीवन के विकास को प्रोत्साहित करने के प्राकृतिक तरीकों को अपनाने के लिए तैयार हैं, जो उनकी उपज में मदद साबित होगा, सद्गुरु ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि किसानों का जमीन के साथ हमेशा मिडास टच रहा है. उन्होंने कहा कि वे अपने हाथों में कुछ मिट्टी लेकर महसूस कर सकते हैं कि उसमें जीवन है या नहीं. किसानों में यह जागरूकता आज भी मौजूद है, हालांकि पिछले 3-4 दशकों में इसमें कमी ज़रूर आई है. किसानों को अपने खेतों को ज्यादा से ज्यादा हरी खाद और पानी से ढंकना चाहिए. यह सोचना कि एक पैकेट यूरिया का डाल दिया तो बात बन जाएगी, यह सरासर गलत है.

भारत को खाद्य उत्पादन के मामले में संपन्न राष्ट्र बताते हुए सदगुरु ने सलाह दी कि लोगों को मिट्टी को निष्क्रिय तत्व नहीं बल्कि जीवित तंत्र की तरह देखना चाहिए. उन्होंनें रासायनिक खाद का विवेकपूर्ण तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर जोर दिया. न्यूज 18 से उन्होंनें कहा कि हमारी मिट्टी समृद्ध है यह सुनिश्चित करते हुए हमें उचित मात्रा में खाद का इस्तेमाल करना चाहिए. इस तरह हम यह भी पक्का कर सकते हैं कि जमीन के एक तिहाई हिस्से का इस्तेमाल करके हम हमारी जरूरत का भोजन पैदा कर सकते हैं.

किसानों को अपनी जमीन पर जो मिलता है, उसे सरकार को देने के बजाए उसका मालिक बनाने की जरूरत पर सदगुरु ने कहा कि अभी भी देश में औपनिवेशिक कानून ही चल रहे हैं, जिसका मतलब है कि अपनी जमीन पर उगाई कुछ चीजों को सरकार को देना ही होगा. उन्होंनें कहा कि अगर किसान को अपनी जमीन पर सोना या तेल मिलता है, तो उस पर उसका ही अधिकार होना चाहिए. सरकार उस पर टैक्स ले सकती है लेकिन वह उसकी संपत्ति होनी चाहिए. उन्होंनें चंदन का उदाहरण देते हुए कहा कि किसानों को इसे अपनी जमीन पर उगाने की अनुमति नहीं है, जिसकी वजह से चंदन की लकड़ी की कमी है.

उन्होंने कहा कि चंदन सोने के समान है. यह हमारे लिए शर्मनाक है कि हमें चंदन ऑस्ट्रेलिया से मंगाना पड़ता है, जबकि वह हमारी ज़मीन पर पैदा होता था. अभी भी हमारे देश में कई औपनिवेशिक कानून हैं, जो किसान को चंदन जैसी अपनी उपज सरकार को देने के लिए मजबूर करते हैं. हमारे प्राचीन ग्रंथ चंदन और उसके इत्र के बारे में बहुत कुछ कहते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से हमें इसे आयात करना पड़ता है. अच्छी बात यह है कि सरकार अब इस दिशा में सकारात्मक कदम उठा रही है. अगर हम अपनी जमीन पर कीमती पेड़ लगाएंगे तो इससे किसान ही खुशहाल होगा और उसका आजीविका के लिए शहर की तरफ रुख करना भी कम होगा. देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में यह एक अहम पहल हो सकती है.

जलवायु परिवर्तन और भारत के 2023 में जी20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने पर सदगुरु ने एक उदाहरण के साथ अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत में 80 फीसद जमीन पर जुताई की जाती है. दुनियाभर में यह आंकड़ा 54 फीसद है. दुनियाभर में अन्य 25 फीसद आंशिक रूप से जोता जाता है जो कुल मिलाकर इसे 79 फीसद बना देता है. जब आप जमीन की जुताई करते हो तो यह ठीक वैसा ही है, जैसे अपनी त्वचा को कुरेद कर बाहर निकालना और फिर सूरज के सामने खड़े हो जाना. ऐसा ही हमारी जमीनों के साथ हो रहा है. वह मदद के लिए चिल्ला रही है लेकिन कोई सुनना ही नहीं चाहता है. लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता है कि क्या चल रहा है. वह तो अपने मोबाईल फोन में व्यस्त है और उसने उसे हद से अधिक असंवेदनशील बना दिया है.

जी20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत को मिलने से सदगुरु को लगता है कि भारत को धरती से खराब भूमि को कम करने के उद्देश्य को पूरा करने की दिशा में पहला कदम उठाने का एक सुनहरा अवसर मिला है. पिछले 70 सालों में धरती के कितने जीवों का हिस्सा कम हुआ, इस पर बात करते हुए उन्होंनें कहा कि दुनिया के 67 फीसद वर्टीब्रेट (केशरुकी यानी हड्डीवाले जीव) गायब हो चुके हैं. 82 फीसद बायोमास कीड़े भी खत्म हो चुके हैं. हर विलुप्त होता जीवन चीख रहा है लेकिन बहरे हो चुके कानों में यह आवाज नहीं जा रही है.

Tags: Climate Change, India news

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