EXPLAINED: आखिर कैसे जम्मू कश्मीर में बढ़ सकती है विधानसभा की 7 सीटें? समझिए परिसीमन का पूरा गणित

संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक के पारित होने के बाद फरवरी 2020 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया था. फाइल फोटो

Jammu Kashmir Delimitation: परिसीमन के दौरान इस बात का ध्यान रखा जाता है कि राज्य के सभी चुनावी क्षेत्रों में विधानसभा सीटों की संख्या और क्षेत्र की जनसंख्या का अनुपात समान रहे.

  • Share this:
    नई दिल्ली. आज हर किसी की निगाहें जम्मू कश्मीर को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) की बैठक पर टिकी हैं. इस मीटिंग में वहां के क्षेत्रीय दल के लगभग सारे बड़े नेता पहुंचने वाले हैं. कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्र सरकार राज्य का दर्जा बहाल करने को लेकर चर्चा कर सकती है. बता दें कि 5 अगस्त 2019 को आर्टिकल 370 को हटा कर जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म कर दिया गया था. साथ ही इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने का ऐलान किया गया था.

    संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक के पारित होने के बाद फरवरी 2020 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया था. इस आयोग को रिपोर्ट सौंपने के लिए एक साल का एक्सटेंशन दिया गया था.  आइए  समझते हैं कि क्या है परिसीमन और जम्मू कश्मीर के लिए क्या हैं इसके मायने...

    क्या है परिसीमन?
    सीधे शब्दों में कहा जाए तो परिसीमन का मतलब होता है सीमा का निर्धारण करना. यानी किसी भी राज्य की लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को तय करने की व्यवस्था को परिसीमन कहते हैं. मुख्ततौर पर ये प्रक्रिया वोटिंग के लिए होती है. लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिये निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के निर्धारण के लिए संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत केंद्र सरकार द्वारा हर जनगणना के बाद परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है.

    परिसीमन में इन बातों का रखा जाता है ध्यान
    परिसीमन के दौरान इस बात का ध्यान रखा जाता है कि राज्य के सभी चुनावी क्षेत्रों में विधानसभा सीटों की संख्या और क्षेत्र की जनसंख्या का अनुपात समान रहे. इसके साथ ही ये भी सुनिश्चित किया जाता है कि एक विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में सामन्य तौर पर एक से अधिक ज़िलें न हो.

    परिसीमन आयोग का इतिहास
    परिसीमन आयोग अधिनियम, 1952 के तहत पहले परिसीमन आयोग का गठन साल 1952 में किया गया था. इसके बाद इसका गठन 1963, 1973 और फिर 2002 किया गया. साल 2002 में संविधान के 84वें संशोधन के साथ इस प्रतिबंध को वर्ष 2026 तक के लिये बढ़ा दिया गया. परिसीमन की प्रक्रिया को बैन करने के पीछे सरकार का तर्क ये था कि साल 2026 तक सभी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि का औसत समान हो जाएगा.

    क्या जम्मू कश्मीर में अलग से होता है परिसीमन?
    जहां तक ​​लोकसभा सीटों का सवाल है, जम्मू-कश्मीर के लिए परिसीमन अन्य राज्यों के साथ हुआ, लेकिन विधानसभा सीटों का सीमांकन उस अलग संविधान के अनुसार किया गया, जो जम्मू-कश्मीर को अपनी विशेष स्थिति के आधार पर मिला था. लेकिन अनुच्छेद 370, जिसने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था, अब निरस्त हो गया है.

    वास्तव में, जम्मू-कश्मीर में विधानसभा सीटों में कोई परिसीमन नहीं हुआ था, जब 2002 और 2008 के बीच देश भर में अंतिम परिसीमन हुआ था. जम्मू-कश्मीर का अपना विशेष दर्जा खोने और केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद, संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से बनाने के लिए एक परिसीमन आयोग का गठन किया गया था.

    ये भी पढ़ें:- निजी अस्‍पतालों में सुस्त पड़ी टीकाकरण की रफ्तार, 2 महीने में लगाए 88.9 लाख डोज

    क्या परिसीमन के बाद सीटों की संख्या में होगा बदलाव
    2019 से पहले केंद्र ने कहा था कि जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा में सीटों की संख्या 107 से बढ़ाकर 114 की जाएगी. विधानसभा की प्रभावी ताकत 87 थी, जिसमें लद्दाख में आने वाली चार सीटें शामिल थीं. क्षेत्र, जो अब एक विधायिका के बिना एक अलग केंद्र शासित प्रदेश है.

    विधानसभा की चौबीस सीटें खाली रह गई हैं, क्योंकि वे PoK में है. सीटों में वृद्धि को कश्मीर और जम्मू के दो क्षेत्रों के बीच चुनावी समानता सुनिश्चित करने के लिए एक कदम के रूप में देखा जाता है, जिसमें 2019 से पहले की योजना में क्रमशः 46 और 37 सीटें थीं.

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.