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Punjab Election 2022: रविदास जयंती के कारण टला चुनाव पर कितना प्रभावी है रविदासिया समुदाय, जानिए हर पहलू

Punjab Election 2022: रविदास जयंती के कारण टला चुनाव पर कितना प्रभावी है रविदासिया समुदाय, जानिए हर पहलू

पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखते हैं. उन्होंने भी चुनाव तारीख आगे बढ़ाने की मांग की थी. (फाइल फोटो)

पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखते हैं. उन्होंने भी चुनाव तारीख आगे बढ़ाने की मांग की थी. (फाइल फोटो)

Ravidassia Community Punjab Assembly Election : रविदासिया समुदाय (Ravidassiya Community) अपने ‘सतगुरु’ की जयंती को पूरे धूमधाम से 7 दिनों तक मनाता है. बनारस (Benaras) में गुरु रविदास की जन्मस्थली पर सबसे बड़ा आयोजन होता है. इसके लिए सिर्फ जालंधर के ‘डेरा सचखंड बल्लां’ (Dera Sachkhand Ballan) से ही एक पूरी ट्रेन भरकर बनारस पहुंचती है. इस बार आयोजन की 7 दिनों की अवधि 10 से 16 फरवरी के बीच है.

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नई दिल्ली. पंजाब विधानसभा चुनाव (Punjab Assembly Election) के लिए मतदान अब 14 फरवरी को नहीं होगा. बल्कि इसकी तारीख बदलकर चुनाव आयोग (Election Commission) ने 20 फरवरी तय कर दी है. पंजाब (Punjab) से लगभग सभी पार्टियों ने आयोग से इसका आग्रह किया था क्योंकि 16 फरवरी को संत रविदास (Sant Ravidas) की जयंती है और यह दिन में पंजाब (Punjab) में एक वर्ग के लिए बहुत मायने रखता है, जिसे ‘रविदासिया समुदाय’ (Ravidassia Community) कहते हैं. अब सवाल हो सकता है कि इस ‘रविदासिया समुदाय’ (Ravidassia Community) की पंजाब (Punjab) में इतनी अहमियत क्यों है कि चुनाव की तारीख बदलनी पड़ गई? इससे जुड़े जवाब के कुछ पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं…

कैसा है रविदासिया समुदाय?
जैसा कि नाम से जाहिर है, रविदासिया समुदाय (Ravidassia Community) संत रविदास (Sant Ravidas) से जुड़ा समूह. सिखों के गुरु रविदास (Guru Ravidas) ने जिस पंथ को प्रचारित और प्रसारित किया, रविदासिया समुदाय (Ravidassia Community) उसी को मानता है. उसी पर चलता है. यह पंथ 20वीं सदी में भारत पर अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान अस्तित्व में आया. लेकिन आजादी के बाद ये लगातार समृद्ध हुआ. विस्तारित हुआ और इस पंथ को मानने वालों की आबादी करीब 20 से 50 लाख के करीब तक बताई जाती है.

इस समुदाय में गुरु रविदास (Guru Ravidas) को ‘सतगुरु’ और मौजूदा डेरा प्रमुखों को ‘गुरु’ और पंथ को मानने वालों को ‘भगत’ कहा जाता है. पहले यह समुदाय सिख धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब को ही अपना पवित्र प्रतीक मानता था. लेकिन साल 2009 में ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में तत्कालीन रविदासिया गुरु संत निरंजन दास (Guru Niranjan das) और उनके नायब संत रामानंद दास पर जानलेवा हमला हुआ था. कहते हैं कि सिख आतंकियों ने यह हमला किया था, जिसमें संत रामानंद दास का निधन हो गया. इसके बाद यह पंथ सिखों से अलग हो गया.

पंजाब में कितना प्रभावशाली है रविदासिया समुदाय?
इसका जवाब दो हिस्सों में है. पहला- रविदासिया समुदाय का सबसे बड़ा ठिकाना ‘डेरा सचखंड बल्लां’ (Dera Sachkhand Ballan) का मुख्यालय जालंधर, पंजाब में है. इस डेरे के प्रमुख वही गुरु निरंजन दास हैं, जिन्होंने 2009 में विएना में हुए हमले के बाद अपना रास्ता सिखों से अलग कर लिया था. दूसरा पहलू ये है कि पंजाब ही नहीं अधिकांश स्थलों पर रविदासिया समुदाय (Ravidassiya Community) के बहुतायत सदस्य अनुसूचित जाति (SC) से ताल्लुक रखते हैं. और 2011 में हुई जनगणना के अनुसार पंजाब में करीब 32% आबादी एससी यानी दलितों की है. इसमें से सिर्फ ‘डेरा सचखंड बल्लां’ (Dera Sachkhand Ballan) के समर्थकों की तादाद ही 15 लाख से कुछ अधिक बताई जाती है.

पंजाब में दलितों के 39 उपवर्ग, इनमें दूसरे सबसे बड़े रविदासी?
‘द पायनियर’ ने हाल ही केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय (Central Social Justice and Empowerment Ministry) की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि पंजाब (Punjab) दलितों (SC) में 39 उपवर्ग हैं. इनमें भी 5 उपवर्ग ऐसे हैं, जिनमें 80% दलित आबादी (SC Population) आ जाती है. इनमें 5 उपवर्गों में भी 30% मजहबी सिखों के बाद दूसरे सबसे बड़े रविदासिया (Ravidassiya) हैं, 24% के करीब. अधिकांश रविदासिया (Ravidassiya) पंजाब (Punjab) के दोआबा क्षेत्र में पाए जाते हैं. इस क्षेत्र में जालंधर, होशियारपुर, नवांशहर, कपूरथला जैसे जिले आते हैं.

चुनाव तारीख से दिक्कत क्या थी?
अब बात आती है चुनाव तारीख की, जो कि पहले 14 फरवरी थी. इसमें सवाल हो सकता है कि गुरु रविदास की जयंती तो 16 फरवरी को है. तो फिर दिक्कत क्यों? इसका जवाब ये है कि रविदासिया समुदाय (Ravidassiya Community) अपने ‘सतगुरु’ की जयंती को पूरे धूमधाम से 7 दिनों तक मनाता है. बनारस (Benaras) में गुरु रविदास की जन्मस्थली पर सबसे बड़ा आयोजन होता है. इसके लिए सिर्फ जालंधर के ‘डेरा सचखंड बल्लां’ (Dera Sachkhand Ballan) से ही एक पूरी ट्रेन भरकर बनारस पहुंचती है. इस बार आयोजन की 7 दिनों की अवधि 10 से 16 फरवरी के बीच है. यानी इस अवधि में करीब 80% तक रविदासी समुदाय पंजाब से बाहर रहता. जाहिर तौर पर इसका असर मतदान पर पड़ना था. इसीलिए चुनाव आयोग ने भी तारीख बदलना उचित समझा.

Tags: Assembly Elections 2022, Caste politics, Punjab Assembly Elections 2022

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