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Explained: 'पहली बार दलित मुख्यमंत्री', पंजाब की राजनीति में इसके क्या हैं मायने?

चरणजीत सिंह चन्नी को कांग्रेस शासित पंजाब की कमान दी गई है. (फाइल फोटो)

चरणजीत सिंह चन्नी को कांग्रेस शासित पंजाब की कमान दी गई है. (फाइल फोटो)

Punjab Politics: विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे कांग्रेस (Congress) को ज्यादा वोट नहीं मिल सकते हैं, लेकिन अगर नए मुख्यमंत्री कुछ हद तक कामयाब होते हैं तो 5-7 फीसदी फ्लोटिंग दलित वोट कांग्रेस की झोली में जा सकते हैं.

  • News18Hindi
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    चंडीगढ़. जब पंजाब में सभी राजनीतिक दल 2022 के विधानसभा चुनावों (2022 assembly elections) से पहले दलितों को लुभा रहे थे और सत्ता में आने पर उन्हें बड़े पद देने का वादा कर रहे थे, ठीक उस समय सत्तारूढ़ कांग्रेस ने राज्य का पहला दलित मुख्यमंत्री (First Dalit chief minister) नियुक्त किया. पंजाब की राजनीति के इन घटनाक्रमों के कई खास मायने हैं, क्योंकि राज्य की आबादी का एक तिहाई होने के बावजूद दलितों की अब तक राजनीतिक में केवल एक सीमित उपस्थिति रही है.

    क्या कहते हैं विशेषज्ञ
    इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञों का कहना है कि एक सम्राट (कैप्टन अमरिंदर सिंह) से एक दलित मुख्यमंत्री तक कांग्रेस ने इतिहास और एक शक्तिशाली प्रतीकवाद बनाया है। यह वोट की राजनीति के लिए एक कदम हो सकता है, लेकिन रविदासिया, रामदसिया, वाल्मीकि, आद-धर्मी, मजहबी सिख आदि सहित हर दलित समुदाय इस कदम से उत्साहित है. विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे कांग्रेस को ज्यादा वोट नहीं मिल सकते हैं, लेकिन अगर नए मुख्यमंत्री कुछ हद तक कामयाब होते हैं तो 5-7 फीसदी फ्लोटिंग दलित वोट कांग्रेस की झोली में जा सकते हैं.

    पंजाब में जाति और धर्म इंटरफेस के विषय पर शोध और प्रकाशन करने वाले समाजशास्त्री प्रो संतोष के सिंह कहते हैं कि जो कोई भी पंजाब के जाति इतिहास को जानता है, वह इस बात से सहमत होगा कि यह एक ऐसा ऐतिहासिक क्षण है जो अत्यधिक प्रतीकात्मकता भरा हुआ है। वह कहते हैं कि संख्या होने के बावजूद क्षेत्र के दलितों ने बहुत लंबा इंतजार किया। इसलिए इसे किसी भी तरह से देखा जाए, यह स्पष्ट रूप से समावेशी लोकतंत्र की ओर एक भव्य प्रस्थान है।

    पंजाब की राजनीति में इसके संभावित निहितार्थ क्या हैं?
    प्रो सिंह कहते हैं कि केवल पंजाब ही नहीं बहुत से लोग इस बारे में बात नहीं कर रहे हैं कि यूपी की राजनीति में इस कदम का क्या प्रभाव पड़ेगा. पंजाब में दलित राजनीति रणनीतिक और ऐतिहासिक रूप से यूपी से जुड़ी हुई है. उत्तर प्रदेश के चुनाव भी नजदीक हैं, ऐसे में यह कदम पंजाब के बाहर एक बड़ा संदेश देने के इरादे से उठाया गया प्रतीत होता है.

    जेएनयू, दिल्ली में समाजशास्त्र के प्रोफेसर सुरिंदर सिंह जोधका कहते हैं कि यह कदम लोकतांत्रिक राजनीति के नए रास्ते खोल रहा है. अब जाटों (उच्च जाति) को अन्य पिछड़े वर्गों की तरह अन्य समुदायों को समायोजित करना होगा, जिनका राजनीति में बहुत कम प्रतिनिधित्व है. वह कहते हैं कि इस कदम के पीछे एक बड़ा और चतुर राजनीतिक मकसद हो सकता है लेकिन कांग्रेस ने पंजाब जैसे राज्य में हिम्मत और साहस दिखाया है. यह कदम अब जमीनी हकीकत को बदल देगा कि दलित अब श्रोता नहीं हैं. प्रो जोधका ने कहा कि यह जाति के आधार पर पहचान की राजनीति को भी तेज करेगा.

    आद-धर्म और रविदासिया दोनों आंदोलनों के विशेषज्ञ एवं डीएवी कॉलेज जालंधर के प्रो जीसी कौल कहते हैं कि जाट सिख भले ही एक दलित सीएम को अपने दिल से स्वीकार न करें, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के कारण सभी को उनकी बात सुननी होगी, जो दलितों से संबंधित लंबे समय से लंबित मुद्दों को हल कर सकते हैं. जैसे 85 वें संशोधन (अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के लिए परिणामी वरिष्ठता) का कार्यान्वयन करवाना.

    राज्य की कुल दलित आबादी कैसे करती है मतदान ?
    2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब की आबादी 2.77 करोड़ है. पंजाब में अनुसूचित जाति की 31.9 प्रतिशत है. जिसमें 19.4 प्रतिशत अनुसूचित जाति सिख, 12.4 प्रतिशत अनुसूचित जाति हिंदू और .098 प्रतिशत बौद्ध अनुसूचित जाति शामिल हैं. इन अनुसूचित जाति समुदायों में 26.33 प्रतिशत मजहबी सिंह, 20.7 प्रतिशत रविदासिया और रामदसिया, 10 प्रतिशत आद-धर्मी और 8.6 प्रतिशत बाल्मीकि हैं. प्रो कौल कहते हैं कि इसलिए दलित सिख और दलित हिंदू पंजाब में एक ही पार्टी को वोट नहीं देते हैं, वे अपनी पुरानी पार्टी संबद्धता और प्रतिबद्धताओं से चलते हैं. एक दलित सीएम पार्टी के पक्ष में 5 से 7 फीसदी फ्लोटिंग वोट हासिल कर सकता है, अगर वह अच्छा प्रदर्शन करता है.

    पंजाब में क्या हैं बसपा की क्या संभावनाएं ?
    इस तथ्य के बावजूद कि बसपा दलितों का पर्याय है, यह पंजाब में लोकप्रियता हासिल नहीं कर सकी. भले ही इसके संस्थापक कांशीराम एक पंजाबी थे और दलित पंजाब की आबादी का एक तिहाई हिस्सा हैं.

    विशेषज्ञों ने कहा कि पार्टी राज्य की राजनीति में खुद को स्थापित नहीं कर सकी क्योंकि इसके संस्थापक कांशीराम ने उत्तर प्रदेश (यूपी) को अपनी मुख्य कर्मभूमि बनाया और 2000 की शुरुआत में उनके खराब स्वास्थ्य के कारण मायावती ने सारी सत्ता अपने हाथ में ले ली. मायावती का मुख्य फोकस यूपी था, वह चुनाव के दौरान ही पंजाब में एक-दो दौरे करती थीं.

    राज्य के एक वरिष्ठ बसपा नेता ने कहा कि अनुशासन और मजबूत संगठनात्मक ढांचे की कमी के कारण मायावती राज्य के दलित समुदायों के बीच लोकप्रियता हासिल नहीं कर सकीं. इसके प्रतिबद्ध मतदाताओं को छोड़कर अन्य दलित मतदाता यहां पार्टी को गंभीरता से नहीं लेते हैं. 1984 में इसके गठन के बाद एक दशक से अधिक समय तक इसे कुछ आधार मिला, लेकिन फिर इसका पतन शुरू हो गया, जो पिछले विधानसभा चुनाव तक जारी रहा.

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