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जब एयर इंडिया TATA को सौंपी जा रही है, तो इसी मामले में देवास मल्टीमीडिया की चर्चा क्यों? आखिर हुआ क्या है?

जब एयर इंडिया TATA को सौंपी जा रही है, तो इसी मामले में देवास मल्टीमीडिया की चर्चा क्यों? आखिर हुआ क्या है?

सांकेतिक तस्वीर

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Devas Multimedia Entry in Tata-Air India Deal: ऐसी खबरें आई हैं कि देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) दुनिया के अन्य देशों में मौजूद भारत सरकार की संपत्तियों को जब्त कर रही है. कुछ कर चुकी है. कुछ अन्य संपत्तियों को जब्त करने की प्रक्रिया में है. इनमें एयर इंडिया (Air India) की संपत्तियां भी शामिल हैं. देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) को विदेशी मध्यस्थता अदालतों से ये संपत्तियां जब्त करने की इजाजत मिली हुई है, ताकि वह भारत सरकार से अपना पैसा वसूल सके.

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नई दिल्ली. देश की सरकारी एयरलाइंस एयर इंडिया (Air India) का मालिकाना हक सैद्धांतिक रूप से टाटा समूह (Tata Group) को दिया जा चुका है. टाटा समूह व्यावहारिक रूप से भी बस दो-चार दिनों के भीतर एयर इंडिया की कमान अपने हाथ में ले लेगा, ऐसा बताया जा रहा है. लेकिन इस प्रक्रिया के बीच ही एक विवादित कंपनी देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) में इसी मामले में सुर्खियों में आ गई है. जानते हैं, क्या है इसकी वजह? और क्या मामला है? दरअसल ऐसी खबरें आई हैं कि देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) दुनिया के अन्य देशों में मौजूद भारत सरकार की संपत्तियों को जब्त कर रही है. कुछ कर चुकी है. कुछ अन्य संपत्तियों को जब्त करने की प्रक्रिया में है. इनमें एयर इंडिया (Air India) की संपत्तियां भी शामिल हैं.

देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) को विदेशी मध्यस्थता अदालतों से ये संपत्तियां जब्त करने की इजाजत मिली हुई है, ताकि वह भारत सरकार से अपना पैसा वसूल सके. हालांकि भारत की शीर्ष अदालत (Supreme Court Of India) ने उस पर रोक लगाई है. लेकिन कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मना कर दिया है. ‘बेंगलुरु मिरर’ की खबर के अनुसार, भारत सरकार को यह उम्मीद नहीं थी कि देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) ऐसा कुछ करेगी. खास तौर पर तब जबकि एयर इंडिया (Air India) और उससे जुड़ीं अधिकांश संपत्तियां टाटा समूह (Tata Group) को सौंपे जाने की प्रक्रिया चल रही है.

देवास मल्टीमीडिया से जुड़ा विवाद, शुरुआत से संपत्तियों की जब्ती तक
विवाद की जड़ 2004-05 में हुए सौदे में निहित है. उस वक्त भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने एक योजना बनाई. इसके तहत पूरे देश में उपग्रह के जरिए वीडियो, मल्टीमीडिया और सूचना सेवा मोबाइल पर उपलब्ध कराई जानी थी. इसरो की एक पूरी तरह सरकारी कारोबारी शाखा है- एंट्रिक्स कॉरपोरेशन (Antrix Corporation). उसे इस काम को करने या कराने की जिम्मेदारी दी गई. एंट्रिक्स कॉरपोरेशन ने देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) के साथ रणनीतिक समझौता किया. इसके तहत उसे उस समय जल्द ही लॉन्च किए जाने वाले जी-सैट6 और जी-सैट6ए उपग्रहों के 90% स्पेस को इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी.

इतना ही नहीं, इसरो (ISRO) ने अपने अधिकार वाले बेशकीमती एस-बैंड स्पेक्ट्रम के 150 मेगाहर्ट्स हिस्से में 70 मेगाहर्ट्स के उपयोग की भी देवास मल्टीमीडिया को इजाजत दे दी. तय हुआ कि इस सबके बदले देवास मल्टीमीडिया अगले 12 साल में 30 करोड़ डॉलर (2,243 करोड़ रुपए लगभग) चुकाएगी. गौर करने लायक है कि इतने बड़े सौदे के लिए न नीलामी प्रक्रिया हुई और न ही अन्य नियम-प्रक्रियाओं का पालन किया गया. इस पर जब विवाद हुआ तो पता चला कि देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) की स्थापना दिसंबर-2004 में ही बेंगलुरू में महज 1 लाख रुपए की पूंजी पर हुई थी. इसके प्रबंधन इसरो (ISRO) के ही कुछ पूर्व वैज्ञानिक शामिल थे. और इससे भी बड़ी बात कि जिस समय इस कंपनी का एंट्रिक्स (Antrix Corporation) से सौदा हुआ, तब उसकी वे तीनों इकाईयां अस्तित्व में ही नहीं थीं, जिनके तहत उसे अपेक्षित सेवाएं देनी थीं.

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, इस समझौते के होते ही देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) का जो शेयर महज 10 रुपए का था, वह अचानक 1.26 लाख रुपए का हो गया. इस कीमत में कंपनी ने विदेशी निवेश के तौर पर 579 करोड़ रुपए हासिल किए. इसमें से 75 करोड़ रुपए अमेरिका भेजे गए, जहां इसके पूर्ण मालिकाने वाली एक सहायक कंपनी (Subsidiary) शुरू की गई. उस सहायक कंपनी के कारोबार के लिए 180 करोड़ रुपए जमा कराए गए. जबकि कानूनी मामलों के लिए 233 करोड़ रुपए रखे गए. इस तरह भारत में मूल कंपनी के पास कुल विदेशी निवेश में से अपने कामकाज के लिए महज 92 करोड़ रुपए ही बचे.

इसी बीच, पूरा मामला जब संदेह के घेरे में आया तो 2011 में भारत सरकार ने एंट्रिक्स-देवास समझौता (Antrix-Devas Deal) रद्द कर दिया. यही नहीं, 2014 में इस मामले की जांच सीबीआई (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को सौंप दी. जांच में साबित हुआ कि देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) सिर्फ धोखाधड़ी के इरादे से पंजीकृत कराई गई थी. लिहाजा, पिछले साल ही एंट्रिक्स ने कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में अपील दायर की. इसमें मांग की देवास मल्टीमीडिया को दिवालिया घोषित कर दिया जाए. ट्रिब्यूनल ने सितंबर-2021 में यह मांग स्वीकार भी कर ली. इसके खिलाफ देवास मल्टीमीडिया ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई. लेकिन शीर्ष अदालत ने बीते हफ्ते ही उसकी याचिका खारिज करते हुए एनसीएलटी के फैसले पर ही मुहर लगाई है.

उधर, देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) ने अन्य कई देशों की मध्यस्थता अदालतों में मामला दायर किया. इसमें तर्क दिया कि एंट्रिक्स के साथ सौदा रद्द होने से उसे बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है. इसकी भरपाई के लिए उसे भारत सरकार की संपत्तियां जब्त कर उन्हें बेचकर वसूली करने की इजाजत दी जाए. फ्रांस, कनाडा आदि में उसे इसकी इजाजत मिल भी गई है. और देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) ने भारत सरकार की संपत्तियों को कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. इनमें एयर इंडिया (Air India) की कुछ संपत्तियां भी शामिल हैं.

अब क्या चाहती है देवास और आगे क्या हो सकता है?
देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) के कई शेयरधारकों के कानूनी मामलों की पैरवी अमेरिका के जाने-माने वकील मैथ्यू डी मैकगिल कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘मोदी सरकार या भारत की अदालतें तथ्यों को दोबारा नहीं लिख सकतीं. देवास मल्टीमीडिया पर धोखाधड़ी के जो आरोप लगाए गए हैं, वे भारत के बाहर कहीं भी ठहर नहीं सकते. बेहतर यही होगा कि भारत सरकार बातचीत की मेज पर आए और बीच का रास्ता निकालते हुए सुलह करे.’ देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) के एक प्रवक्ता भी यही कहते हैं. ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के मुताबिक उन्होंने कहा है, ‘हम तब तक विदेश में भारतीय संपत्तियां जब्त करने की कार्यवाही नहीं रोकेंगे, जब तक भारत सरकार बातचीत की मेज पर नहीं आ जाती.’ वहीं केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitaraman) ने कहा है, ‘हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर विदेश में अपनी संपत्तियों का बचाव करेंगे.’

मतलब साफ है, भारत सरकार और देवास मल्टीमीडिया (Devas Multimedia) के बीच कानूनी दांव-पेंच और अदालत के बाहर सुलह-सफाई की प्रक्रिया अभी लंबी चलने वाली है. हालांकि, इसका एयर इंडिया (Air India) का मालिकाना पूरी तरह टाटा समूह (Tata Group) को सौंपे जाने की प्रक्रिया पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला है. हां, इसे कुछ गैरमामूली झटके जरूर लग सकते हैं.

Tags: Air india, Hindi news, ISRO, Tata

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