सोनभद्र नरसंहार: बदलते रहे सियासी चेहरे, बढ़ता रहा विवाद, जानें खास बातें

सोनभद्र में आजादी से भी पहले का है जमीन विवाद

News18Hindi
Updated: July 21, 2019, 5:57 AM IST
सोनभद्र नरसंहार: बदलते रहे सियासी चेहरे, बढ़ता रहा विवाद, जानें खास बातें
क्या है सोनभद्र जमीन-विवाद का इतिहास
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Updated: July 21, 2019, 5:57 AM IST
ये कहानी सोनभद्र की है. इस कहानी की शुरूआत साल 1955 में हुई थी. वहां पर स्थित ज्यादातर लोग गरीब और अनपढ़ आदिवासी थे. समय के साथ गरीब आदिवासियों का शोषण की कहानी खत्म होने की जगह बढ़ती ही गई. जमीन हड़पने की इस कहानी में सरकारी अधिकारी या तो सीधे तौर शामिल रहें हैं या निर्दोष ग्रामीणों की दुर्दशा पर अपनी आंख मूंद ली.

सरकार और नौकरशाही की दशकों से चली आ रही उदासीनता के कारण अब सोनभद्र के ऊम्भा गांव में 'खून-खराबे' की स्थिति हो गई है. इस 'खून-खराबे' को स्थानीय लोगों के दो पक्षों के बीच झड़प कहना गलत होगा. यह गुंडों के द्वारा गरीब आदिवासियों पर एकतरफा हमला था, जिन्हें सत्ता पर आसिन लोगों का समर्थन प्राप्त है. ये भू-माफिया और सत्ता में बैठे लोगों की मिलीभगत थी, जिसकी वजह से 10 ग्रामीणों की हत्या कर दी गई और कई लोग घायल हो गए.

शुक्रवार को विधानसभा में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे को लेकर अपने राजनीतिक विरोधियों पर तंज कसते हुए भूमि विवाद की पटकथा लिखने के लिए पूर्व की कांग्रेस सरकारों को ज़िम्मेदार बताया, उनकी इन बातों से ऐसा लग रहा था कि शायद उन्हें अपनी सरकार के दौरान हुई गलतियों के बारे में पता ही न हो. इस मामले से संबंधित दो प्रमुख घटनाक्रम पिछले दो वर्षों में हुए हैं.

फैक्ट्स:

1. अक्टूबर 2017 में विवादित कृषि भूमि लगभग 630 बीघा मापी गई थी, जिसे स्थानीय ग्राम प्रधान के नाम पर हस्तांतरित करने के लिए एक समझौता किया गया था. IAS प्रभात मिश्रा, उनकी पत्नी, बेटी और दामाद ने इस समझौते में शामिल थे. इस कदम का ग्रामीणों ने विरोध किया था. लेकिन अभी भी ये सवाल बना हुआ है कि प्रशासन ने उस समय कोई कदम क्यों नहीं उठाए.

2. एक साल से भी ज्यादा समय के बाद, फरवरी 2019 में आदिवासी किसानों की आपत्तियों के बावजूद भूमि आधिकारिक तौर पर गांव के प्रधान के नाम पर दर्ज की गई. 'दखिल-खारिज' की प्रक्रिया को अंजाम दिया गया, और राजस्व रिकॉर्ड में आधिकारिक तौर पर जमीन प्रधान के नाम पर दर्ज की गई थी. जबकि 'दखिल-खारिज' की प्रक्रिया में सही ढंग से नियम का पालन भी नहीं किया गया था.

3. विडंबना ये है कि जब 2018 में जमीन आधिकारिक तौर पर गांव प्रधान के नाम पर पंजीकृत किया गया था, तब इसका विरोध करने वाले ग्रामीणों पर 'गुंडा अधिनियम' के तहत मामला दर्ज किया गया.
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सीएनएन न्यूज 18 के सूत्रों के मुताबिक जून 2018 में गोंड जनजाति के पांच लोगों पर सोनभद्र पुलिस ने गुंडा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था. ये वे लोग थे जो आईएएस और ग्राम प्रधान के बीच जमीन के सौदे का विरोध कर रहे थे. सवाल ये है कि किसानों की बात क्यों नहीं सुनी गई.

जब शुक्रवार को मुख्यमंत्री विधानसभा में इस मुद्दे पर बोल रहे थे तब इन फैक्ट्स को राज्य सरकार द्वारा साझा नहीं किया गया.

जिस दिन यूपी के सीएम ने एक मजबूत स्थिति बनाने की कोशिश की, उन्होंने जमीन पर अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा की और दो उच्च-स्तरीय जांच टीमों का गठन किया.
जो कहानी उभरकर सामने आई है वो अलग-अलग सरकारों के माध्यम से राजनीतिक-नौकरशाही और पुलिस की उदासीनता की है, नहीं कि किसी एक विशेष पार्टी के शासन के दौरान हुई घटनाओं की.

अब यह जांच का विषय है कि ये जमीन लगभग 66 साल पहले 'आदर्श सोसायटी' के नाम पर कैसे दर्ज हुई, और वहां से सभी को किस तरह से हस्तांतरित किया गया.

जमीन-विवाद का इतिहास:

आजादी से पहले और 1955 तक, यह जमीन एक राजसी संपत्ति थी. स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके पूर्वजों को 'बधल के राजा' से खेती करने का अधिकार मिला था. आजादी से पहले के समय में एक स्थानीय रियासत शासक ने इस जमीन को 'बधल के राजा' को उपहार में दिया था. राजा ने फिर इस जमीन को अपने आदमियों को खेती करने को दिया था. उनमें से अधिकांश आदिवासी और स्थानीय थे.

1950 के दशक की शुरुआत में जब भूमि सुधारों और जमींदारी उन्मूलन की मांग तेज हुई, तो कृषि और वन भूमि के इस विशाल टुकड़े को 17 दिसंबर, 1955 को रॉबर्ट्सगंज के तहसीलदार के आदेश से आदर्श सहकारी समिति नामक संस्था को हस्तांतरित कर दिया गया.

जब उस समय के किसानों और परिवारों को टाइटल-शिप के इस हस्तांतरण के बारे में पता चला तो उन्होंने इसपर अपनी चिंता जताई, लेकिन फिर उन्हें इस तर्क से आश्वस्त किया गया कि 'एक समाज की जमीन को बेचा नहीं जा सकता है, और इसलिए उनकी बुवाई और खेती के अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता'.

चीजें 1989 तक इस क्रम में चलती रहीं, जबतक कि जमीन के प्रश्न को समाज से व्यक्तिगत कब्जे के लिए स्थानांतरित कर दिया गया. जमीन तत्कालीन सेवारत आईएएस अधिकारी, उनकी पत्नी और परिवार के सदस्यों के नाम पर पंजीकृत थी.

इस जमीन के सौदे पर एक बार फिर लोगों की भौंहें तन गईं, लेकिन कुछ नहीं हुआ. किसानों का दावा है कि 90 के दशक की शुरुआत में जमीन के नए मालिक गांव के प्रमुख लोगों को प्रभावित करने लगे. और किसानों के अधिकार के खिलाफ जाकर 300-400 रुपये प्रति बीघा की दर से उगाही करने लगे.

यह शोषण 2017 तक जारी रहा, जब 'पोस्ट-डेमोलिशन' युग में भूमि-मालिक, नौकरशाह और उनके परिवार ने अचानक जमीन को गांव के प्रधान को बेचने का फैसला किया, जो कि उस समय जमीन की देख-रेख कर रहे थे.

यही वो निर्णय था जिसकी वजह से इस साल 16 जुलाई के दिन 10 ग्रामीणों का नरसंहार किया गया. विडंबना ये है कि घटना तब हुई है जब राज्य में बीजेपी की सरकार है.

 
First published: July 20, 2019, 10:40 PM IST
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