OPINION: एमएसपी को अनंत काल तक बढ़ाना कोई विकल्प नहीं है

भारत में हरित क्रांति के केंद्र रह चुके पंजाब के मालवा इलाके की स्थिति भयावह है, जहां ऐसा कोई गांव नहीं जिसमें कैंसर की वजह से मौत नहीं हुई हो.

भारत में हरित क्रांति के केंद्र रह चुके पंजाब के मालवा इलाके की स्थिति भयावह है, जहां ऐसा कोई गांव नहीं जिसमें कैंसर की वजह से मौत नहीं हुई हो.

भारत में हरित क्रांति के केंद्र रह चुके पंजाब के मालवा इलाके की स्थिति भयावह है, जहां ऐसा कोई गांव नहीं जिसमें कैंसर की वजह से मौत नहीं हुई हो. यह बात पंजाब का हर किसान जानता है कि वह जो अनाज पैदा कर रहा है उसमें कितना जहर है. पंजाब में किसान पूरे देश की तुलना में दस गुना ज़्यादा पेस्टिसाइड और रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 3, 2021, 3:58 PM IST
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(ब्रज मोहन सिंह )

पिछले पांच हफ्तों से किसानों और केंद्र सरकार के बीच एक अघोषित सा शीत युद्ध चल रहा है. लेकिन सच्चाई यह है कि जो किसान धरने पर बैठे हैं उन्हें पता होता है कि जिस फसल की वह बुआई करने वाला है उसे लोग बाजार में सही कीमत देंगे या नहीं.

फसल लगाने के दौरान मज़दूरों की सस्ती उपलब्धता रहेगी या नहीं, मौसम सहायक रहेगा या नहीं. इन कारकों में से किसान सिर्फ एक ही चीज तय कर सकता है कि वह कितने रकबे में फसल उगाये और कितना निवेश करेगा. इसके आगे की व्यवस्था काफी जटिल होती है. जहां तक केंद्र सरकार की बात है वो रबी और खरीफ फसल की तैयारी से पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करता है किसानों की फसल एक घोषित फ्लोर प्राइस से नीचे न बिके.

लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल का बिक जाना कोई सुखद स्थिति नहीं है. चिंता की बात यह है कि इस मिनिमम सपोर्ट प्राइस को ही किसानों ने मैक्सिमम सपोर्ट प्राइस मान लिया है. मौजूदा फार्म बिल आने के पहले कई बजट प्रावधानों में इस बात का जिक्र होता रहा कि किसानों को उत्पादन के लागत से कम से कम डेढ़ गुना ज़्यादा कीमत मिले लेकिन एमएसपी के जरिये ऐसा संभव नहीं हो पाया.
भारत में एमएसपी की शुरुआत 1960 के दशक में शुरू हुई लेकिन किसानों की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ. अगर ऐसा होता तो हजारों किसान हर वर्ष ख़ुदकुशी नहीं करते. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड के आंकड़ों के मुताबिक 2019 में ही 10,271 किसानों ने ख़ुदकुशी की.

नीति निर्माता वर्षों से माथापच्ची कर रहे हैं कि क्या एमएसपी को आगे भी जारी रखना चाहिए या इसे बाज़ार पर छोड़ देना चाहिए भारत की खेती कि तुलना उस मरीज से की जा सकती है जो वर्षों से वेंटीलेटर पर है और उससे उम्मीद की जाती है कि वो सेहतमंद होकर दौड़ना शुरू कर दे. एमएसपी का डोज़ उसे झटका दे सकता है लेकिन नई ज़िंदगी नहीं दे सकता.

पंजाब में अब न पानी बचा न ज़मीन बची ...



भारत में हरित क्रांति के केंद्र रह चुके पंजाब के मालवा इलाके की स्थिति भयावह है, जहां ऐसा कोई गांव नहीं जिसमें कैंसर की वजह से मौत नहीं हुई हो. यह बात पंजाब का हर किसान जानता है कि वह जो अनाज पैदा कर रहा है उसमें कितना जहर है. पंजाब में किसान पूरे देश की तुलना में दस गुना ज़्यादा पेस्टिसाइड और रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं.

पंजाब के मुक़ाबले पश्चिम बंगाल और बिहार में धान की खेती करना ज़्यादा आसान है, जहां जल की सहज उपलब्धता है. पंजाब के 22 में से 20 ज़िले डार्क जोन में आ गए हैं, लेकिन इसकी परवाह न तो किसानों को है और न ही सरकारें ही कुछ कर पाने की स्थिति में हैं. जल, जमीन और सेहत की कीमत पर यहां गेहूं और धान की खेती होती है.

जब पंजाब ने भारत को “शिप टू माउथ"स्थिति से निकाला बाहर...

भारत जब "शिप टू माउथ" वाली स्थिति से गुजरा रहा था उस वक़्त पंजाब और हरियाणा के किसानों ने भारत को अन्न उत्पादन की दिशा में आत्मनिर्भर बनाने का जिम्मा लिया लेकिन ऐसा 1960 के दशक में जरूरी था. आज नहीं, जब भारत के पास अनाज के स्टोरेज के लिए गोडाउन उपलब्ध नहीं है, ऐसी स्थिति में सबको नया सोचना पड़ेगा.

आज पंजाब गेंहूं के उत्पादन में तीसरे नंबर पर है. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में आज गेहूं की अच्छी उत्पादकता है, जहाँ खाद और कीटनाशकों का भी कम प्रयोग होता है. पंजाब और हरियाणा के किसानों को वर्षों से कहा जा रहा है की वो द्वि-फसली चक्र से बाहर निकल कुछ नए प्रयोग करें. पर किसान संगठनों को ये मंजूर नहीं है.

हरियाणा में तो सराकर धान नहीं लगाने के लिए प्रति एकड़ सात हज़ार रूपये देती है, लेकिन एमएसपी की उपलब्धता की वजह से किसान अलग नहीं सोचते.

एमएसपी की जगह बाज़ार बनाएं

ये सही है कि भारत को 1960-70 के दशक में पेट भरने की ज़रूरत थी लेकिन अब 2021 में किसानों को आमदनी बढ़ाने की ज़रूरत है. अगर सरकार किसानों के दवाब के नीचे एसएसपी जारी रखने की बात मान भी लेती है तो इसका बहुत ज़्यादा फ़ायदा नहीं होगा. एमएसपी यथास्थिति को बरकरार रख सकता है, इससे किसानो की आय दुगुनी नहीं होगी.

बेहतर तो ये हो कि सरकार एमएसपी पर अनंत कल तक खर्च करने की बजाय मार्केट डिवैलप करे, एपीएमसी कानून को सरल बनाए ताकि एग्री-कंपनियाँ किसानों को बेहतर मूल्य उपलब्ध करा सकें. किसानों से सीधे खरीद को बढ़ावा दे ताकि मंडी में वह बिचौलियों के चंगुल से आज़ाद हो सके.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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